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क्यों अंतिम सांसें लेता किसान आंदोलन !

पंजाब में भूमि के नीचे का जलस्तर बहुत ही नीचे जा चुका है। हालात वहां पर लगातार खराब हो रहे हैं। इस स्थिति से बेपरवाह किसान राज्य में धान और गेहूं की खेती करने के अलावा कुछ और बदलाव करने से बाज नहीं आ रहे।

By इंडिया वॉइस 
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तीन कृषि कानूनों के निरस्त होने तक अपना आंदोलन जारी रखने का फैसला करने वाले ढाई राज्यों के किसान अब पूरी तरह से पस्त और थके लग रहे हैं। इनके धरना स्थलों पर किसानों की उपस्थिति लगातार घट रही है। पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश के किसान नेताओं की लाख कोशिशों के बावजूद अपने आंदोलन को अखिल भारतीय चरित्र तो एक दिन के लिए भी नहीं दे सके। इस आंदोलन को उत्तर प्रदेश के कुछ जिलों को छोड़कर अन्य किसानों तक का समर्थन नहीं मिला है। 75 जिलों में मात्र चार-पांच जिलों के किसान ही इसमें सक्रिय दिखे इसलिए इस आंदोलन को सवा दो राज्यों का आंदोलन कहना पड़ रहा है। महाराष्ट्र और गुजरात का किसान आंदोलन भी बहुत सशक्त है लेकिन वहां के किसान इन सवा दो राज्यों के किसानों के साथ नहीं जुड़े।

इन किसानों की फिलहाल सरकार से कहीं कोई बात नहीं हो रही है। इसके लिए जिम्मेदार किसान नेता स्वयं हैं। आप कह सकते हैं कि विगत 21 जनवरी के बाद किसान और सरकार के बीच बातचीत के रास्ते पूरी तरह बंद हो गए हैं। यह स्थिति अपने आप में गंभीर है। किसान सरकार से कह रहे हैं कि तीनों किसान कानून वापस लो तभी कोई बात होगी। वापस नहीं लोगे तो आंदोलन जारी रहेगा। सरकार का कहना है कि ये शर्त नहीं मानी जा सकती है। सरकार किसानों से बातचीत के लिए तैयार अवश्य है। सरकार किसानों से पूछ रही है कि वह यह बताए तो सही कि आखिर इन कानूनों में खराबी कहां है। सरकार के इस सवाल का जवाब देने के लिए ये आंदोलनजीवी तैयार नहीं हैं। क्या यह अब किसी को बताने की जरूरत है कि किसान आंदोलन से जुड़े लोग अपनी जिद और हठधर्मिता पर उतरे हुए हैं।

पहले पंजाब के किसानों की ही बात कर लेते हैं। पंजाब में भूमि के नीचे का जलस्तर बहुत ही नीचे जा चुका है। हालात वहां पर लगातार खराब हो रहे हैं। इस स्थिति से बेपरवाह किसान राज्य में धान और गेहूं की खेती करने के अलावा कुछ और बदलाव करने से बाज नहीं आ रहे। इन दोनों फसलों की खेती के लिए जल की खूब मांग होती है। पर ये सुनने के तैयार नहीं हैं। इन्हें पता है कि इन्हें इनकी फसलों पर न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) तो मिलेगा ही। इन्हें बिजली और पानी मुफ्त मिलती ही है। खाद पर भी सब्सिडी मिलती है। पंजाब का किसान अपनी फसलों पर तमाम तरह के कीटनाशक भी भरपूर डालता है। इस कारण जो इनके द्वारा पैदा अनाज का सेवन करते हैं, उन्हें कैंसर जैसा असाध्य रोग अपनी चपेट में ले रहा है। पंजाब में धरती बंजर हो रही है, क्योंकि वहां के बड़े किसानों का एक वर्ग समझ ही नहीं रहा है कि उनके राज्य में जमीन तबाह हो गई है। फिर इन्हें पराली जलाकर दूसरों की सेहत खराब करने में भी शर्म नहीं आती है। पर इन्हें समझाए कौन। नए कानूनों से इनके हित सुरक्षित हैं, पर ये मान नहीं रहे क्योंकि इन्हें देश विरोधी शक्तियों का समर्थन और संरक्षण मिला हुआ है।

यह शीशे की तरह से साफ हो गया है कि किसानों का यह कथित आंदोलन कुछ वामपंथी ताकतों, देश विरोधी एनजीओ, खालिस्तान समर्थकों वगैरह के कारण ही पैसे के बल पर चल रहा है। यही लोग कभी नागरिकता संशोधन कानून (सीएए) और प्रस्तावित राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (एनआरसी) के विरोध में सड़कों पर आ जाते हैं। बस इनके चेहरे बदलते हैं। ये सड़कों और हाईवे पर बैठ जाते हैं। फिर आम जन को इनके धरने के कारण कितना भी नुकसान हो, इसकी यह परवाह नहीं करते। यह देश ने शाहीन बाग में भी देखा था।

अब हरियाणा के किसानों की बात कर लें। इससे राज्य के जाट मुख्य रूप से जुड़े हुए हैं। इनकी मोदी सरकार से नाराजगी की वजह बिल्कुल अलग है। इन्हें गुस्सा इस कारण से है कि राज्य में लगातार दो बार इनके समर्थन के बिना राज्य में भाजपा की सरकार बन गई। पहली बार पूर्ण बहुमत के साथ और दूसरी बार भाजपा को पूर्ण बहुमत से कुछ कम सीटें मिलीं। इन किसानों को लगता है कि भाजपा ने उनकी ताकत छीन ली है। उन्हें सियासत की दुनिया में हाशिए पर डाल दिया। इसलिए इन्होंने राज्य में जाटों को आरक्षण की मांग पर तगड़ा बवाल भी काटा था। यह तब हुआ था जब मनोहर लाल खट्टर पहली बार सत्ता पर काबिज हुए ही थे। यह 2014 की बात है। तब जाटों को आरक्षण देने की आड़ में राज्य में कसकर हिंसा हुई थी और सरकारी संपत्ति को नष्ट किया गया था।

अगर बात पश्चिम उत्तर प्रदेश के किसानों की करें तो वे तो शुरू में इस आंदोलन के साथ ही नहीं थे। ये तो मुख्य रूप से गन्ना किसान हैं और इनकी उपज चीनी मिलें खरीद ही लेती हैं। हां, चीनी मिलें इन्हें गन्ना की कीमत देने में कुछ देरी कर देती हैं। अपने को राजनीति की दुनिया में स्थापित करने के लिए राकेश टिकैत इस आंदोलन का हिस्सा बन गए। पर अब किसानों का आंदोलन लंबा खिंचने के कारण किसान आंदोलन से दूर हो रहे हैं। आखिर किसी भी आंदोलन की कोई सीमा होती है।

दरअसल किसान नेता यह बता नहीं पा रहे हैं कि कृषि कानूनों से किसानों को नुकसान कहां होगा। क्या यह किसानों के लिए खराब स्थिति होगी कि वे अपनी उपज देश में कहीं भी, किसी भी व्यक्ति या संस्था को अपनी मर्जी की कीमत पर बेचें ? सरकार किसानों से धान-गेहूं की खरीद तो पहले की ही तरह करती रहेगी और किसानों को एमएसपी का लाभ भी पहले की तरह देती रहेगी। अब किसान मंडी के साथ-साथ मंडी से बाहर भी अपनी उपज बिना रोकटोक के बेच सकेंगे। एक बात और। जिस प्रकार आर्थिक सुधारों के बाद आशंका जताई जा रही थी कि सेवा क्षेत्र तबाह हो जाएगा, लेकिन आज तीन दशकों बाद सेवा क्षेत्र में जबरदस्त बढ़ोतरी हुई है। भारत की 20 फीसदी आबादी सेवा क्षेत्र से जुड़ गई है।

देखिए, किसानों के धरने टिकरी, सिंघू बार्डर और गाजीपुर बार्डर पर चल रहे हैं। दूसरी तरफ, इनसे राजधानी का किसान या इन बार्डरों के आसपास का किसान तक नदारद है। वह इस आंदोलन का हिस्सा नहीं है। वह अपने खेतों में पूरी मेहनत से काम कर रहा है। किसान नेता आखिर क्यों नहीं बताते इसकी वजह ? लोकतंत्र में अहिंसक आंदोलन करने का सबको अधिकार है। किसानों को भी है। पर इसबार किसानों के नाम पर कुछ संदिग्ध शक्तियां ही आंदोलन का हिस्सा बन कर रह गई हैं।

आर.के. सिन्हा (लेखक वरिष्ठ संपादक, स्तंभकार और पूर्व सांसद हैं।)

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