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बैसाखी से नववर्ष तक: भारत में रंगों, स्वाद और परंपराओं का भव्य संगम

By HO BUREAU 

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अप्रैल का महीना भारत में नए उत्साह और उमंग का संदेश लेकर आता है। इस समय देश के विभिन्न हिस्सों में पारंपरिक नववर्ष मनाया जाता है, जिसे अलग-अलग राज्यों में अलग नामों से जाना जाता है। प्रथम बैसाख या बैसाखी केवल एक पर्व नहीं, बल्कि भारत की सांस्कृतिक विविधता और एकता का अद्भुत प्रतीक है।

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उत्तर भारत, खासकर पंजाब में बैसाखी बड़े धूमधाम से मनाई जाती है। यह रबी फसल की कटाई का समय होता है, इसलिए किसान इस दिन भगवान का धन्यवाद करते हैं। ढोल-नगाड़ों की थाप पर भांगड़ा और गिद्धा जैसे लोकनृत्य किए जाते हैं। इस अवसर पर सरसों का साग और मक्की की रोटी जैसे पारंपरिक व्यंजन खास तौर पर बनाए जाते हैं।

पूर्वी भारत में, पश्चिम बंगाल में इसे पोइला बोइशाख के रूप में मनाया जाता है। लोग नए कपड़े पहनते हैं, सांस्कृतिक कार्यक्रमों में भाग लेते हैं और मंदिरों में पूजा-अर्चना करते हैं। व्यापारी इस दिन हाल खाता की परंपरा निभाते हैं। खाने में हिलसा मछली और मिठाइयों में रसगुल्ला का विशेष महत्व होता है।

असम में यह पर्व बोहाग बिहू के नाम से जाना जाता है। यहां लोग पारंपरिक नृत्य और गीतों के साथ नववर्ष का स्वागत करते हैं। घरों में पीठा और लारू बनाए जाते हैं, जो इस त्योहार की मिठास को बढ़ाते हैं।

दक्षिण भारत में भी इसी समय नववर्ष अलग-अलग नामों से मनाया जाता है। तमिलनाडु में इसे पुथांडु, केरल में विशु और कर्नाटक-आंध्र प्रदेश में उगादी कहा जाता है। इन त्योहारों में घरों की सजावट, पूजा-पाठ और विशेष व्यंजन जैसे पायसम और उगादी पचड़ी बनाए जाते हैं, जो जीवन के विभिन्न रसों का प्रतीक हैं।

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महाराष्ट्र में यह पर्व गुड़ी पड़वा के रूप में मनाया जाता है। घरों के बाहर ‘गुड़ी’ फहराई जाती है, जो विजय और समृद्धि का प्रतीक है। इस दिन पुरण पोली का विशेष महत्व होता है।

भारत में नववर्ष के इन विविध रूपों के बावजूद एक बात समान है नई शुरुआत की उम्मीद, खुशहाली की कामना और परिवार के साथ खुशियां बांटना। लोग अपने घरों की सफाई करते हैं, नए वस्त्र पहनते हैं और आने वाले साल के लिए प्रार्थना करते हैं।

इस प्रकार, बैसाख के आगमन के साथ मनाया जाने वाला यह नववर्ष भारत की “अनेकता में एकता” की भावना को जीवंत करता है, जहां हर राज्य अपनी अलग पहचान के साथ एक ही खुशी—नए साल के स्वागत—को मनाता है।

सपन दास

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