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बिहार : देश भर में है ‘छठ महापर्व’ की धूम, जानें छठ पूजा से जुड़ी सभी रोचक बातें !

मुग्दल ऋषि के आश्रम में 'माँ सीता' ने सबसे पहले की थी छठ व्रत, मुंगेर के सीताचरण में छठ पर्व का छुपा हैं रहस्य.

By इंडिया वॉइस 
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बिहार, 8 नवंबर। चार दिवसीय छठ बिहार का महापर्व है। जिसका रहस्य अंग प्रदेश के मुग्दल (मुंगेर) जिला से जुड़ा हैं। पुराणिक कथाओं में उल्लेखित है कि माता सीता ने सर्वप्रथम छठ बिहार के मुंगेर गंगा कष्टहरणी तट के उस पार पर सूर्य को अर्घ्य अर्पित की। जहां पर सीता चरण पादुका चिन्ह आज भी देखा जा सकता है। यूँ तो मुंगेर जिला महाभारत काल से ही धार्मिक अनुष्ठान एवं आध्यात्मिकता का केंद्र रहा है। इसलिए यहां छठ पर्व पूजा अनुष्ठान के साथ मनाया जाता है और दिन प्रतिदिन छठ व्रती महिला श्रद्धालुओं की संख्या लाखों लाख होती जा रही है।

मुद्गल ऋषि ने सीता माँ का छठ व्रत का दिया था सलाह 

बाल्मीकि रामायण एवं आनंद रामायण उल्लेखित है कि जब मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम पिता की आज्ञा पाकर बनवास प्रस्थान कर रहे थे। तब सीता और लक्ष्मण के साथ मुद्गल ऋषि के आश्रम पहुंचकर माता सीता ने मां गंगा से बनवास की अवधि सकुशल बीत जाने की प्रार्थना की थी। वहीं दूसरी और रावण संहार कर जब राम अयोध्या पहुंचे तब मुद्गल ऋषि ने राजसूय यज्ञ की सलाह दिया और मुद्गल ऋषि नेको छठ व्रत करने की सलाह दी। मुद्गल ऋषि की सलाह पर माता सीता ने मुंगेर स्थित गंगा नदी के एक टिले पर सूर्य को अर्घ्य अर्पित कर पुत्र प्राप्ति की कामना की थी। कालांतर में सीता चरण में आज भी छठ पूजा को लेकर हजारों की संख्या में छठ वर्ती महिलाएं सीता चरण पादुका के निकट सूर्य को अर्घ्य अर्पित करती है।

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यूं तो सीताचरण मंदिर का गर्भ गृह साल में छह महीने गंगा के गर्भ में समाया रहता है तथा गंगा का जलस्तर घटने पर छह महीने ऊपर आज जाता है । मंदिर के पुरोहित राम बाबा ने कहा कि पूर्व में श्रद्धालु शिलापट्ट पर बने निशान की पूजा करते थे । सन 1972 में जब सीताचरण में संतों का सम्मेलन के पश्चात लोगों के आग्रह पर सीताचारण मंदिर बनाने का फैसला लिया गया था । जो 1974 में बनकर तैयार हुआ । इंग्लैंड के प्रसिद्ध यात्री सह शोधकर्ता गियर्सन जब भारत भ्रमण दौरान सीता के चरणों के निशान एवं भारत के अन्य मंदिरों में मौजूद पद चिन्ह में समानता का जिक्र किया था।

पैरों के निशान आज भी हैं मौजूद 

उन्होंने इस मंदिर के पदचिन्हों का मिलान माता सीता के जनकपुर मंदिर , चित्रकूट मंदिर , मिथिला मंदिरों में मौजूद पदचिन्हों से करवाया तो सभी पैरों के निशान एक जैसा पाया । उन्होंने अपनी पुस्तक में भी इसका उल्लेख की है । एक कथा और है कि भगवान राम जब मुंगेर के कष्टहरणी घाट के समक्ष गंगा स्नान कर रहे थे। तभी भगवान राम के स्नान के छींटे वहां मौजूद कुछ कुष्ठ रोगियों को पड़ा।

जिससे उन कुष्ठ रोगियों की काया सुंदर हो गई। तभी से इस स्थान का नाम कष्टहरणी घाट रखा गया। आध्यात्मिकता से साराबोर नगर में बबुआ घाट,जहाज घाट ,जमालपुर अवस्थित काली पहाड़,बीएमपी -9,मसोमतिया तालाब सहित सैकड़ों जगहों पर छठ पर्व मनाया जाता है। जहां सीता ने स्नान की थी। वह आज भी गर्म जल प्रवाहित हो रहा है। जिसे सीता कुंड के नाम से जाना जाता है।

मुंगेर का इतिहास है साक्षी

मुंगेर का इतिहास साक्षी है। भगवान शिव के समय से ही यह नगर बसा हुआ है। मुंगेर का चंडिका स्थान सिद्ध शक्तिपीठ है कालिका पुराण के अनुसार माता चंडी का उल्लेख मिलता है भगवान शिव अपनी पत्नी का मृत्यु का समाचार सुनकर विचलित हो गए और दक्ष के यज्ञ को विध्वंस करने के बाद उन्होंने सती के शव को कंधे पर उठा लिया और विक्षिप्त अवस्था में तांडव नृत्य करने लगे शिव से सती को मुक्त करने के लिए ब्रह्मा विष्णु और सनी सती के मृत शरीर में योग बल से प्रवेश कर मनाने लगे।

लाखों छठ व्रती महिला व पुरुष श्रद्धा भाव से मनाते हैं छठ पर्व

सती के पार्थिव शरीर के अंग काटकर जहां गिरे वह सिद्ध पीठ बन गया। जहां पर भी छठ पर्व मनाया जाता है और भारी संख्या में लोग एकत्रित होकर सूर्य को अर्घ्य देते हैं। एक ओर मुंगेर का योग विश्वविद्यालय पूरे संसार में प्रसिद्ध है। वहीं दूसरी ओर राजाधिराज योग साधना और आनंद मार्ग आश्रम के प्रवर्तक एवं संस्थापक श्री श्री आनंदमूर्ति जी ने जमालपुर नगर को पूरे संसार में स्थापित कर मान बढाया। साधना स्थल गोल्फ मैदान स्थित व्य्राग कब्र, मृत्यु की घाटी तथा बाबा आनंद मूर्ति का जन्म स्थली विदेशी पर्यटकों को आकर्षित करती है।

यह नगर जहां बाबा देर रात्रि तक माता काली के परम भक्त परमहंस जी महाराज के आध्यात्मिक गुरु तोतापुरी और क्रांतिकारी नेता सुभाष चंद्र बोस से अपने दिव्य प्रकाश से बातें करते थे। जिसका जिक्र आनंदमूर्ति जी अपनी रचना में की है। पौराणिक कथा के अनुसार पांडवों के अज्ञातवास के दौरान जमालपुर के काली पहाड़ी पर अर्जुन ने स्वयं काली की स्थापना की ओर सिद्ध हुए जहां आज भी अर्जुनयमला काली स्थापित है। पहाड़ के नीचे नदी अवस्थित है जहां लाखों छठ व्रती महिला व पुरुष श्रद्धा भाव के साथ छठ पूजा मनाते हैं। इधर बीएमपी पुलिस के निर्देशन में एक भव्य सूर्य मंदिर बनाया गया है। यहाँ भी हजारों की संख्या में श्रद्धालु की भीड़ जुटती है।

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