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एलपीजी गैस की किल्लत से आम जनता, पीजी और रेस्टोरेंट संचालक परेशान

By HO BUREAU 

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देश के कई हिस्सों में इन दिनों एलपीजी गैस की किल्लत ने लोगों की रोजमर्रा की जिंदगी को प्रभावित कर दिया है। रसोई गैस सिलेंडर की समय पर आपूर्ति न होने से जहां आम परिवारों को दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है, वहीं पीजी (पेइंग गेस्ट) और रेस्टोरेंट संचालकों की परेशानियां और भी बढ़ गई हैं।

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कई शहरों में गैस एजेंसियों के बाहर लंबी कतारें देखी जा रही हैं। लोगों का कहना है कि बुकिंग के कई दिनों बाद भी सिलेंडर की डिलीवरी नहीं हो रही है। गैस एजेंसियों का तर्क है कि सप्लाई में कमी और परिवहन संबंधी समस्याओं के कारण वितरण प्रभावित हुआ है। इस स्थिति ने घरों के बजट और दिनचर्या दोनों को बिगाड़ दिया है।

सबसे ज्यादा असर पीजी में रहने वाले छात्रों और नौकरीपेशा युवाओं पर पड़ा है। कई पीजी संचालकों को समय पर सिलेंडर न मिलने के कारण भोजन की व्यवस्था बनाए रखना मुश्किल हो रहा है। कुछ जगहों पर पीजी मालिकों को अतिरिक्त सिलेंडर ऊंचे दामों पर खरीदने पड़ रहे हैं, जिसका सीधा बोझ वहां रहने वाले लोगों पर पड़ रहा है। कई छात्रों ने शिकायत की है कि उन्हें समय पर खाना नहीं मिल पा रहा या फिर भोजन की गुणवत्ता में गिरावट आ गई है।

रेस्टोरेंट उद्योग भी इस संकट से अछूता नहीं है। छोटे और मध्यम स्तर के रेस्टोरेंट गैस की कमी के कारण अपने संचालन में कटौती करने को मजबूर हो गए हैं। कई रेस्टोरेंट मालिकों का कहना है कि उन्हें सीमित समय के लिए ही खाना बनाना पड़ रहा है या फिर मेन्यू में बदलाव करना पड़ रहा है। कुछ प्रतिष्ठानों ने तो ग्राहकों को संभालने के लिए अस्थायी रूप से अपना समय भी कम कर दिया है, जिससे उनके व्यवसाय पर सीधा असर पड़ रहा है।

विशेषज्ञों का मानना है कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में एलपीजी की कीमतों में उतार-चढ़ाव, आपूर्ति श्रृंखला में बाधाएं और बढ़ती मांग इस किल्लत के प्रमुख कारण हैं। यदि समय रहते आपूर्ति व्यवस्था को सामान्य नहीं किया गया, तो आने वाले दिनों में यह संकट और गहरा सकता है।

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सरकार और तेल कंपनियों ने स्थिति को जल्द सामान्य करने का आश्वासन दिया है। अतिरिक्त सिलेंडर की आपूर्ति और वितरण प्रक्रिया को तेज करने के प्रयास किए जा रहे हैं। हालांकि, जब तक जमीनी स्तर पर स्थिति में सुधार नहीं होता, तब तक आम जनता, पीजी संचालक और रेस्टोरेंट मालिकों को मुश्किलों का सामना करना पड़ता रहेगा।

सपन दास

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