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बिहार में NDA के 27 विधायकों ने CM और डिप्टी CM बनने की कामना से कराया विशेष अनुष्ठान

By HO BUREAU 

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Faith or Political Drama?

पटना। बिहार की सियासत में इन दिनों एक अलग ही तरह की हलचल देखने को मिल रही है। राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) के करीब 27 विधायकों द्वारा मुख्यमंत्री और उपमुख्यमंत्री बनने की इच्छा के साथ विशेष पूजा-पाठ और अनुष्ठान कराने की खबर ने राजनीतिक गलियारों में नई चर्चा छेड़ दी है। इस धार्मिक आयोजन को लेकर जहां समर्थकों में उत्साह है, वहीं विपक्ष ने इसे राजनीतिक अवसरवाद करार दिया है।

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सूत्रों के अनुसार, राजधानी पटना और कुछ अन्य जिलों में इन विधायकों ने मंदिरों में हवन, यज्ञ और विशेष पूजा का आयोजन कराया। इन अनुष्ठानों का उद्देश्य सत्ता में उच्च पद प्राप्त करने के लिए देवी-देवताओं का आशीर्वाद लेना बताया जा रहा है। कई विधायकों ने सार्वजनिक रूप से इस बात को स्वीकार भी किया कि उन्होंने अपने राजनीतिक भविष्य और नेतृत्व की जिम्मेदारी के लिए प्रार्थना की है।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि बिहार में NDA के भीतर नेतृत्व को लेकर अंदरूनी खींचतान जारी है और ऐसे धार्मिक आयोजनों को उसी का एक प्रतीक माना जा रहा है। हालांकि गठबंधन के शीर्ष नेताओं ने इसे व्यक्तिगत आस्था से जुड़ा मामला बताते हुए किसी भी तरह के राजनीतिक विवाद से इनकार किया है। उनका कहना है कि पूजा-पाठ भारतीय संस्कृति का हिस्सा है और इसे राजनीति से जोड़कर नहीं देखा जाना चाहिए।

वहीं विपक्षी दलों ने इस घटनाक्रम पर तीखी प्रतिक्रिया दी है। उन्होंने आरोप लगाया कि जनता की समस्याओं से ध्यान हटाने के लिए सत्ताधारी नेता धार्मिक आयोजनों का सहारा ले रहे हैं। विपक्ष का कहना है कि राज्य में बेरोजगारी, महंगाई और बुनियादी सुविधाओं जैसे मुद्दे ज्यादा महत्वपूर्ण हैं, लेकिन नेता सत्ता की दौड़ में व्यस्त दिखाई दे रहे हैं।

राजनीतिक हलकों में यह भी चर्चा है कि आगामी चुनावों और संभावित नेतृत्व परिवर्तन की अटकलों के बीच कई विधायक खुद को मुख्यमंत्री या उपमुख्यमंत्री पद के दावेदार के रूप में स्थापित करने की कोशिश कर रहे हैं। ऐसे में धार्मिक अनुष्ठान को शक्ति प्रदर्शन और राजनीतिक संदेश के रूप में भी देखा जा रहा है।

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जनता के बीच इस खबर को लेकर मिली-जुली प्रतिक्रिया देखने को मिल रही है। कुछ लोग इसे आस्था का विषय मान रहे हैं, जबकि कई लोग इसे राजनीतिक दिखावा बता रहे हैं। सोशल मीडिया पर भी इस मुद्दे पर बहस तेज हो गई है, जहां समर्थक और विरोधी दोनों अपनी-अपनी राय खुलकर रख रहे हैं।

कुल मिलाकर, बिहार की राजनीति में यह घटनाक्रम एक बार फिर यह दिखाता है कि यहां सत्ता की दौड़ केवल राजनीतिक रणनीति तक सीमित नहीं रहती, बल्कि सामाजिक और धार्मिक पहलुओं से भी जुड़ जाती है। आने वाले समय में यह देखना दिलचस्प होगा कि इन अनुष्ठानों का राजनीतिक समीकरणों पर कोई असर पड़ता है या नहीं।

सपन दास

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