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कौन थे शायर फैज़ अहमद फैज़, जिनको अटल बिहारी ने पाकिस्तान में उनकी ही नज़्म सुनाई थी

फैज़ को जानने और सुनने वाले उनसे जुड़े तमाम किस्से और कहानियां सुनाते हैं, जो उनके शानदार शख्सियत की गवाही देती हैं।

By इंडिया वॉइस 
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गाहे बगाहे ये दो मशहूर लाइनें सुनने को पढने को मिल ही जाती हैं। ये पंक्तियाँ उर्दू के मशहूर शायर  फैज़ अहमद फैज़ की हैं, फैज़ हिंदुस्तान और पाकिस्तान के मशहूर शायरों में शुमार हैं, फैज़ को आज एक ऐसे क्रांतिकारी के रूप में याद किया जाता है। जिसने हमेशा ही साहित्य के बने हुए हुए दायरों को तोड़ने की कोशिश की। फैज़ की तमाम नज्मे उस वक़्त भी सत्ता की आँख में आँख डाल कर सवाल करती थी और आज भी दोनों ही मुल्कों में फैज़ की नज्मों को क्रांति के स्वर में सुना और सुनाया जाता है। फैज़ को जानने और सुनने वाले उनसे जुड़े तमाम किस्से और कहानियां सुनाते हैं, जो उनके शानदार शख्सियत की गवाही देती हैं।

फैज़ अहमद फैज़ का जन्म 13 फरवरी, 1911 में पंजाब के सियालकोट में हुआ था।  जो कि अब पाकिस्तान में है। फैज़ एक अकादमिक परिवार से थे जो साहित्यिक हलकों में जाना जाता था, उनके घर में अक्सर स्थानीय कवियों और लेखकों की सभा हुआ करती थी। इन सब चीजों का फ़ैज़ के जीवन पर काफ़ी असर पड़ा उन्होंने सियालकोट में एक ब्रिटिश परिवार द्वारा संचालित एक स्कूल में पढ़ाई की। उन्हें बचपन से ही भाषा का अच्छा ज्ञान था 15 साल की उम्र में लाहौर के प्रतिष्ठित सरकारी कॉलेज में दाखिला लिया।

31 साल की उम्र में फ़ैज़ भारतीय ब्रिटिश सेना में शामिल हो गए  वहां उन्होंने प्रचार विभाग में काम किया फिर लेफ्टिनेंट कर्नल बन गए 36  वर्ष की उम्र में  विभाजन के बाद उनकी कविताओं ने लोगों की पीड़ा व्यक्त की। फ़ैज़ ने पाकिस्तान की कम्युनिस्ट पार्टी की स्थापना में मदद की।

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फैज़ कि एक मशहूर कहानी भारत के पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी बाजपेयी के साथ है, विदेश मंत्री रहते हुए ही एक बार अटल जी पाकिस्तान के दौरे पर गए थे, वहां जा कर अटल जी ने फैज़ से मिलने की इच्छा ज़ाहिर की। तो वहां उन्हें बताया गया कि ये आपके प्रोटोकॉल में शामिल नहीं है अटल जी को फैज़ से मिलना था सो उन्होंने प्रोटोकॉल तोडा और फैज़ से मिले। फैज़ से मिलने के बाद उन्होंने कहा कि मुझे आपकी ग़ज़ल का एक शेर बेहद पसंद है मैं उसी के लिए आपसे मिला चाहता था फैज़ ने कहा सुनाइए, अटल जी ने फैज़ का ये शेर  पढ़ा।

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वर्त्तमान समय में इस ग़ज़ल की सबसे मशहूर मौजूदगी आपको हैदर फिल्म में अरिजीत सिंह के गाये हुये गाने के रूप में मिल जायेगी।

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यह नज़्म फैज़ ने पाकिस्तान की जेल में लिखी थी, 1951-55 तक फैज़ जेल में रहे फ़ैज अहमद फ़ैज को 1963 में लेनिन शांति पुरस्कार मिला था और उन्हें 1984 में नोबेल पुरस्कार के लिए नामित गया था। फैज़ कि कुछ मशहूर नज्में जिनपर हिंदुस्तान में भी बवाल ही चुका है उनमे से उनकी कुछ मुख्य नज्में “हम देखेंगे” और “बोल की लैब आज़ाद हैं तेरे” शामिल हैं, फैज़ को नहीं समझने वाले इसे हिन्दुतान में हिन्दू विरोधी बताते हैं, जबकि यह नज़्म क्रांति के स्वर को उठाती है पाकिस्तान में दमनकारी सत्ता के विरुद्ध में फैज़ ने ये नज़्म लिखी थी।

 

– आकाश सिंह

 

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