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गीता किसी भाषा, प्रांत या धर्म की नहीं, संपूर्ण मानवता की ग्रंथ है- लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला

हमें चुनौतीपूर्ण और संघर्षपूर्ण जीवन जीना है तो पवित्र ग्रंथ गीता पढ़नी चाहिए। महाभारत में भी जब अर्जुन संशय में थे तो भगवान श्रीकृष्ण ने गीता का संदेश दिया था। 5 हजार साल बाद भी गीता का सार प्रासंगिक है।

By इंडिया वॉइस 
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चंडीगढ़, 11 दिसंबर। गीता किसी भाषा, प्रांत, धर्म की नहीं, बल्कि संपूर्ण मानवता की ग्रंथ है। ये ग्रंथ हमारे जीवन की पाठशाला है। हम इसे पढ़कर अपने जीवन की सही राह पर बढ़ सकते हैं। ये हमें जीवन जीने का रास्ता बताती है। ये कहना है लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला का। ओम बिरला शनिवार को कुरुक्षेत्र में आयोजित अंतरराष्ट्रीय गीता महोत्सव को संबोधित कर रहे थे। इस दौरान हरियाणा के मुख्यमंत्री मनोहर लाल भी मौजूद रहे।

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जीयो गीता सभागार का लोकार्पण

लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला और मुख्यमंत्री मनोहर लाल ने सबसे पहले गीता ज्ञान संस्थानम में पहुंचकर जीयो गीता सभागार का लोकार्पण किया। इसके बाद गीता ज्ञान संस्थानम और कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय में आयोजित छठी अंतरराष्ट्रीय विचार गोष्ठी को संबोधित किया। इस मौके पर ओम बिरला ने कहा कि हरियाणा की ऐतिहासिक भूमि कुरुक्षेत्र पूरे विश्व को जीवन जीने का मार्गदर्शन कर रही है। खुद महात्मा गांधी मानते थे कि जैसे हमें मां पालती है, उसी तरह पवित्र ग्रंथ गीता हमें नई प्रेरणा देती है। व्यक्ति के जीवन में अंधकार या कठिनाई होती है तो गीता हमें राह दिखाती है। गीता के छोटे से सार को पढ़ने के बाद जीवन के हर संशय को दूर किया जा सकता है।

चुनौतीपूर्ण और संघर्षपूर्ण जीवन जीना है तो पवित्र ग्रंथ गीता पढ़नी चाहिए

लोकसभा अध्यक्ष बिरला ने कहा कि हमें चुनौतीपूर्ण और संघर्षपूर्ण जीवन जीना है तो पवित्र ग्रंथ गीता पढ़नी चाहिए। महाभारत में भी जब अर्जुन संशय में थे तो भगवान श्रीकृष्ण ने गीता का संदेश दिया था। 5 हजार साल बाद भी गीता का सार प्रासंगिक है। व्यक्ति सामाजिक जीवन में कठिनाई में उलझता है तो गीता से राह मिलती है। कर्मयोग में लिखा है कि मनुष्य को कर्म करना चाहिए। अगर व्यक्ति कर्म को कर्तव्य मानकर चलेगा तो लक्ष्य हासिल होगा। कई बार लक्ष्य की प्राप्ति ना होने पर निराशा भी होगी, लेकिन पवित्र ग्रंथ गीता हमारी निराशा को खत्म करने का काम करती है।

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