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जानें तीनों कृषि कानूनों के बारे में और क्यों हो रहा था इनका विरोध

कृषि उत्पादन और वाणिज्य विधेयक 2020 के अंतर्गत किसान अपनी फसल को देश के किसी भी जगह बेच सकते थे। जानें तीनों कृषि कानूनों के बारे में।

By इंडिया वॉइस 
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नई दिल्ली : प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आज सुबह देश को संबोधित करते हुए भाषण दिया। इस भाषण में मोदी जी ने ऐलान किया कि किसानों के लंबे विरोध के चलते और उनको समझाने के प्रयास में विफल रहने के बाद सरकार तीनों कृषि कानूनों को वापस ले रही है। इस निर्णय के बाद आंदोलन पर बैठे किसानों में खुशी की लहर दौड़ गई। करीब 15 महीनों से किसान तीनों ही कृषि कानूनों को वापस लेने की मांग पर दिल्ली के सीमाओं पर आंदोलन कर रहें थे। लेकिन आज आपको एक बार फिर से जानना चाहिए कि वो तीनों कृषि कानून कौन से थे जिनका किसान कर रहे थे विरोध?

 

जानें तीनों कृषि कानूनों के बारे में 

 

कृषि उत्पादन और वाणिज्य (संवर्धन और सुविधा) विधेयक 2020- 

इस कानून के अनुसार किसान अपनी फसल को देश के किसी भी कौने पर बेच सकते थे। इसका सीधा मतलब ये था कि किसानों दूसरे राज्यों में जाकर भी अपनी फसल को अच्छे दामों पर बेच सकते थे। इसके साथ ही कोई भी व्यापारी (लाइसेसंधारी) किसानों से उनकी फसल खरीद सकता था। इस कानून के तहत किसान पर एक राज्य से दूसरे राज्य में फसल को बेचने पर किसी प्रकार का मंडी कर भी नहीं देना पड़ता।

कानून में प्रावधानों से किसानों को निजी खरीददारों से अच्छी व बेहतर रकम मिलने की उम्मीद अधिक थी। जबकि किसानों का आरोप था कि इस कानून से कॉरपोरेट खरीददारों को फसल के दाम तय करने की छूट दी गई थी। वह बिना किसी पंजीकरण के बिना किसी कानूनी दायरे में आते हुए फसल को खरीद या बेच सकते थे। किसानों का कहना था कि इस कानूनों से एपीएमसी मंडियों को एक सीमा में बांध दिया था।

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किसान (सशक्तिकरण और संरक्षण) मूल्य आश्वासन और कृषि सेवा अधिनियम 2020-

आवश्यक वस्तु (संशोधन) अधिनियम-

इस कानून के अंतर्गत व्यापार के लिए कई आवश्यक वस्तुओं को जैसे दाल, खाद्य तेल और प्याज को स्टॉक लिमिट से हटा दिया जाता। ऐसे में बाजार पर प्रभाव पड़ता।

दरअसल इस कानून के तहत यदि कुछ जरूरी चीजों को स्टॉक लिमिट हटा दिया जाता तो सरकार को किसी भी खद्दान के सही स्टॉक का पता नहीं चल पाता। इससे कालाबाजारी को बढ़ावा मिलने की आशंका बेहद अधिक थी।

वर्ष 2020 में तीन कृषि कानून बनाए गए थे। हालांकि तभी से किसान इन तीनों ही कानूनों का विरोध कर रहे थे। इसी विषय पर किसान संगठनों व सरकार के बीच कई बार बैठक व बातचीत हुई, लेकिन इन पर कोई सहमति नहीं बन पाई और किसानों ने आंदोलन को तेज कर दिया।

 

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