भारतीय खेल जगत में एक मामूली सा सवाल बड़ा विवाद बन गया, जब ओलंपिक पदक विजेता निशानेबाज़ Manu Bhaker से युवा क्रिकेटर Vaibhav Suryavanshi को लेकर एक सवाल पूछा गया। यह घटना एक सार्वजनिक कार्यक्रम के दौरान हुई, जहां मीडिया ने अलग-अलग खेलों से जुड़े सवाल उठाए। लेकिन जिस तरह से यह सवाल पूछा गया और उसके बाद जो प्रतिक्रिया सामने आई, उसने सोशल मीडिया पर बहस छेड़ दी।
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दरअसल, एक पत्रकार ने मनु भाकर से वैभव सूर्यवंशी के प्रदर्शन और उनके खेल को लेकर राय जाननी चाही। इस पर मनु ने हल्की मुस्कान के साथ जवाब दिया कि वह मुख्य रूप से शूटिंग पर फोकस करती हैं और क्रिकेट के बारे में ज्यादा जानकारी नहीं रखतीं। उनका यह जवाब सामान्य और ईमानदार माना जा सकता था, लेकिन सोशल मीडिया पर इसे अलग नजरिए से देखा गया।
कुछ यूजर्स ने इसे खेलों के बीच असंतुलन और “क्रिकेट-केंद्रित सोच” का उदाहरण बताया। वहीं, कई लोगों ने पत्रकार के सवाल पर ही सवाल उठाए कि आखिर एक शूटिंग खिलाड़ी से क्रिकेटर के बारे में क्यों पूछा गया। फैंस का कहना था कि इस तरह के सवाल अन्य खेलों के प्रति गंभीरता की कमी को दर्शाते हैं। ट्विटर (अब X) और इंस्टाग्राम पर “स्पोर्टिंग नेशन” शब्द ट्रेंड करने लगा, जहां यूजर्स ने लिखा कि अगर भारत को एक सच्चा खेल-प्रधान देश बनना है, तो हर खेल और खिलाड़ी को बराबर सम्मान देना होगा।
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कुछ खेल विशेषज्ञों ने भी इस मुद्दे पर प्रतिक्रिया दी। उनका मानना है कि भारत में अभी भी क्रिकेट का वर्चस्व इतना अधिक है कि अन्य खेलों के खिलाड़ी अक्सर हाशिए पर चले जाते हैं। ऐसे में जब उनसे क्रिकेट से जुड़े सवाल पूछे जाते हैं, तो यह उनके अपने खेल के प्रति सम्मान को कम करने जैसा लगता है।
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हालांकि, कई लोगों ने मनु भाकर का समर्थन भी किया और कहा कि उन्होंने बिल्कुल सही और ईमानदार जवाब दिया। उनका कहना था कि हर खिलाड़ी अपने खेल में विशेषज्ञ होता है और उससे हर दूसरे खेल के बारे में जानकारी की उम्मीद करना उचित नहीं है।
यह विवाद भले ही छोटा लगे, लेकिन इसने भारतीय खेल संस्कृति पर एक बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है—क्या हम सच में “स्पोर्टिंग नेशन” बनने की दिशा में बढ़ रहे हैं? या फिर हम अब भी एक ही खेल के इर्द-गिर्द सीमित हैं?
विशेषज्ञों का मानना है कि सरकार और खेल संगठनों को अन्य खेलों को भी उतना ही प्रमोट करना चाहिए जितना क्रिकेट को मिलता है। साथ ही मीडिया की भी जिम्मेदारी है कि वह सभी खेलों को समान महत्व दे और खिलाड़ियों से उनके क्षेत्र से जुड़े सवाल ही पूछे।
कुल मिलाकर, यह घटना एक आईना है जो दिखाती है कि भारत में खेलों को लेकर सोच अभी भी बदलने की जरूरत है। यदि देश को एक संतुलित और समृद्ध खेल संस्कृति विकसित करनी है, तो हर खिलाड़ी और हर खेल को बराबरी का मंच देना होगा। तभी “स्पोर्टिंग नेशन” का सपना सच हो पाएगा।
सपन दास
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