22 अप्रैल की वह सुबह, जब पहलगाम की वादियों में आम दिनों की तरह शांति पसरी हुई थी, अचानक चीखों और गोलियों की आवाज़ों से कांप उठी। बर्फ से ढकी पहाड़ियों और हरे-भरे मैदानों के बीच घटित हुआ यह हमला इतना भयावह था कि आज भी उसका खौफनाक मंजर लोगों की रूह तक हिला देता है।
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प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार, सब कुछ कुछ ही मिनटों में बदल गया। पर्यटक और स्थानीय लोग अपने-अपने काम में व्यस्त थे, तभी अचानक गोलियों की तड़तड़ाहट गूंज उठी। लोग समझ ही नहीं पाए कि आखिर हो क्या रहा है। चारों ओर अफरा-तफरी मच गई। कोई इधर भाग रहा था, कोई उधर छिपने की कोशिश कर रहा था। बच्चों की चीखें, महिलाओं का रोना और घायल लोगों की कराह हर आवाज़ उस खौफनाक सन्नाटे को और गहरा कर रही थी।
एक चश्मदीद ने बताया, “ऐसा लग रहा था जैसे मौत हर दिशा से हमारे करीब आ रही हो। हम जमीन पर लेटकर खुद को बचाने की कोशिश कर रहे थे, लेकिन गोलियों की आवाज़ दिल को चीर रही थी।” कुछ लोगों ने अपने परिजनों को अपनी आंखों के सामने गिरते देखा, तो कुछ घायल होकर भी दूसरों को बचाने की कोशिश करते रहे।
हमले के बाद का दृश्य और भी भयावह था। जमीन पर खून के धब्बे, बिखरे हुए सामान और हर ओर पसरा हुआ डर—यह सब किसी डरावनी फिल्म के दृश्य जैसा प्रतीत हो रहा था, लेकिन यह हकीकत थी। राहत और बचाव दल जब मौके पर पहुंचे, तो उन्होंने घायल लोगों को अस्पताल पहुंचाने का काम शुरू किया, लेकिन कई जिंदगियां तब तक बुझ चुकी थीं।
इस घटना ने न सिर्फ स्थानीय लोगों को, बल्कि पूरे देश को झकझोर कर रख दिया। जहां एक ओर लोग इस कायराना हरकत की कड़ी निंदा कर रहे हैं, वहीं दूसरी ओर सुरक्षा व्यवस्था को लेकर भी सवाल उठने लगे हैं। आखिर इतनी संवेदनशील जगह पर ऐसी घटना कैसे हो गई?
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आज, जब उस हमले को याद किया जाता है, तो लोगों की आंखों के सामने वही खौफनाक मंजर तैर उठता है भागते लोग, गूंजती गोलियां और हर ओर फैला डर। पहलगाम की खूबसूरती पर उस दिन जो खून के छींटे पड़े, उन्होंने इस शांत वादी को लंबे समय तक दर्द और दहशत की यादों में कैद कर दिया।