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लेख : जिनके पार्थिव शरीर को कन्धा देते समय फूट फूट कर रोए थे पाक राष्ट्रपति

वर्तमान राजनीतिक परिवेश में जरूरत है देश की आजादी के पश्चात के जनप्रतिनिधियों के राजनीतिक व्यक्तित्व और कृतित्व को समझने की।

By इंडिया वॉइस 
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राजनीति कल भी थी, आज भी है और इसका सिलसिला आगे भी जारी रहेगा। लेकिन समय के इस बदलते परिवेश में छल-कपट, अपराध, आक्रोश, आतंक और भ्रष्टाचार के चमक-दमक वाले कलेवर में दिखने वाली वर्तमान राजनीति का जो उद्देश्य हैं उन उद्देश्यों के बल पर राजनीति के मंच पर भारत देश विश्व गुरु बनने से कोसो दूर रह जाएगा। वर्तमान राजनीतिक परिवेश में जरूरत है देश की आजादी के पश्चात के जनप्रतिनिधियों के राजनीतिक व्यक्तित्व और कृतित्व को समझने की।

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देश की आजादी के पश्चात की राजनीति का अध्ययन करते समय आप पाएंगे कि भारत में आजादी के पश्चात अनेको ऐसे नेता हुए जिनकी राजनीतिक सूझ-बूझ मानवीय मूल्यों और राष्ट्रीय परम्पराओ पर आधारित थी। उस दौर के उन नेताओं में एक नाम लाल बहादुर शास्त्री का भी आता है। जिन्होंने गरीबी में भी रहते हुए अपने राजनीतिक जीवन में अपनी ईमानदारी, सरलता, सहजता और नेतृत्व क्षमता से कभी समझौता नहीं किया।

उस दौर की राजनीति में अपनी ईमानदारी, सादगी और कठोर नेतृत्व क्षमता के लिए देश भर में विख्यात लाल बहादुर शास्त्री के राजनीतिक जीवन के कई ऐसे प्रेरक प्रसंग आपको मिलेंगे जो उन्हें भारत ही नही बल्कि विश्व स्तरीय महान नेताओ में ले जाकर खड़ा करते हैं। जिस समय भारत-पाक युद्ध चरम पर था, 16 सितम्बर 1965 को बतौर प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री ने अमेरिकी राष्ट्रपति लिंडन जॉनसन को पत्र लिख बताया कि भारत बिना किसी शर्त के संघर्ष विराम को राजी है।

लेकिन पाकिस्तान की जनमत संग्रह वाली मांग किसी भी हालत में भारत सरकार द्वारा नहीं मानी जाएगी। कश्मीर में जनमत संग्रह से जुड़ा 1948 का संयुक्त राष्ट्र का प्रस्ताव भी अब हमें किसी भी हाल में स्वीकार्य नहीं है। पहले तो विश्व के शक्तिशाली देश अमेरिका ने भारत को आँखे दिखाने का दुस्साहस किया लेकिन समय रहते उसे एहसास हो गया कि भारत के प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री के कुशल और कठोर नेतृत्व क्षमता के आगे अमेरिका की एक नही चलेगी। थकहार कर अमेरिका ने पाकिस्तान के तत्कालीन राष्ट्रपति अयूब खान को ही नसीहत देना बेहतर समझा।

1965 के भारत-पाक युद्ध में विश्व के लगभग सभी देशों को यह समझ आ चुका था कि समय रहते दोनों देशों को बातचीत के लिए नही मनाया गया तो लाल बहादुर शास्त्री के कुशल नेतृत्व में भारत पाकिस्तान के एक बड़े हिस्से पर अपना आधिपत्य स्थापित कर पाकिस्तान को तहस-नहस कर देगा। आखिरकार दोनों देशों को बातचीत के लिए सोवियत संघ के तत्कालीन प्रधानमंत्री अलेक्सेई कोसिगिन ने मना ही लिया और ताशकन्द में भारत के प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री और पाकिस्तान के राष्ट्रपति अयूब खान के बीच 3 जनवरी 1966 से 10 जनवरी 1966 तक कई दौर की बातचीत के बाद दोनों देशों को अपने युद्ध से पहले वाले स्थान पर पहुँचने पर बात बन ही गई।

इस दौरान भारत के प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री अपने कुशल व्यक्तित्व और नेतृत्व क्षमता से सोवियत संघ के तत्कालीन प्रधानमंत्री अलेक्सेई कोसिगिन सहित पाकिस्तान के राष्ट्रपति अयूब खान के नेतृत्व वाली पाकिस्तानी दल को भी बहुत प्रभावित किया। हालांकि ताशकन्द समझौते में भारत ने अपने देश के एक महान राजनीतिक व्यक्ति और देश के प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री को खो दिया लेकिन यह लाल बहादुर शास्त्री की राजनीतिक सुचिता और प्रासंगिकता ही थी कि भारत पाक के कटु रिश्ते के बावजूद पाकिस्तान के तत्कालीन राष्ट्रपति अयूब खान उनके पार्थिव शरीर को भारत विदा करते समय ताशकन्द हवाई अड्डे पर ही कन्धा देते समय फूट-फूट कर रोने लगे।

भले ही भारत की राजनीति से लाल बहादुर शास्त्री नामक सूर्य 11 जनवरी 1966 को अस्त हो गया। लेकिन उनकी राजनीतिक सुचिता और प्रासंगिकता आज भी भारत के ईमानदार और स्वच्छ छवि वाले युवाओ को एक नया आयाम देती हैं।

लेखक:कृपा शंकर यादव

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