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नवरात्र : बिहार के कामाख्या में जुटते हैं कई राज्यों के श्रद्धालु, मिलती है तंत्र साधना की सिद्धि

-पूरी नवरात्रि चलते रहता है तंत्र साधना को सिद्ध करने का खेल

By इंडिया वॉइस 
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शक्ति स्वरूपा मां भगवती दुर्गा की भक्ति का महापर्व शारदीय नवरात्रि में तंत्र साधना पौराणिक काल से चलता आ रहा है। नवरात्रि में सभी प्रकार के तंत्र-मंत्र साधक अपने साधना कि सिद्धि करते हैं।

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देश दुनिया में लोग जानते हैं कि आसाम का कामाख्या शक्तिपीठ तंत्र साधकों का सबसे बड़ा केंद्र है। लेकिन इसके बाद साधना की सिद्धि का सबसे बड़ा केंद्र बिहार का बखरी पुरानी दुर्गा स्थान है। यहां के शक्ति की चर्चा ही नहीं होती है, बल्कि हजारों लोग सिद्घ हो चुके हैं। अब एक बार फिर नवरात्र आ गया है तो यहां तंत्र-मंत्र सिद्ध करने की तैयारी हो गई है।

प्रख्यात साबर मंत्र साधिका बहुरा मामा की धरती और तंत्र साधकों के बीच बिहार के कामाख्या नाम से प्रसिद्ध बखरी में नवरात्रा के पहले दिन से ही स्थानीय लोगों के अलावा बिहार के विभिन्न जिलों के साथ-साथ पश्चिम बंगाल, उत्तर प्रदेश और नेपाल से बड़ी संख्या में तंत्र साधकों की भी जुटने लगती है। रात में आरती पूजा के बाद तंत्र साधकों की विशेष पूजा शुरु होती है और अष्टमी की रात साधकों की भारी भीड़ जुट जाती है।

विभिन्न राज्यों से आए दर्जनों सिद्धिकामी माता की पूजा-अर्चना के बाद साधना को सिद्धि में बदलने के लिए लीन रहते हैं। इनमें महिलाएं और जवान के अलावे बुढ़े लोग भी शामिल रहते हैं, जो वर्षों की तंत्र साधना को यहां सिद्वी में बदलने के लिए जमा होकर पूरी रात अपने अपने तंत्र साधना की सिद्धी करते हैं। अष्टमी की रात पुरानी दुर्गा मंदिर के आगे स्थित बलि प्रदान स्थल पर विशेष पूजा के बाद चाटी चलाया जाता है, जिसकी चाटी प्रतिमा तक पहुंच गई वह सिद्ध हो गया और ऐसा नहीं हुआ तो उसकी तंत्र साधना अधूरी रह गई।

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इतिहास कहता है कि मुगल काल में परमार वंश के राजाओं ने आकर दुर्गा मंदिर की स्थापना की थी और यहां योग पिशाचनी और कर्णमई जैसी दुर्लभ तंत्र शक्तियों की साधना और सिद्धि होती है। बखरी के सबंध मे मान्यता है की यहां कि बकरी और लकड़ी भी डायन हुआ करती थी। आधुनिक युग में भी तंत्र-मंत्र का आलम यह है की लोग इसमें गहरा विश्वास व्यक्त करते हैं और सिद्वि के लिए आते हैं।

बखरी की चर्चा बहुरा मामा नामक प्रसिद्ध तंत्र साधिका को लेकर होती है, जो कभी तंत्र साधना की बदौलत पेड़ के सहारे हवा में उड़ा करती थी, कार्यक्षेत्र बखरी से बांग्लादेश तक था। अपने तंत्र साधना के सहारे देश भर के तांत्रिकों को परास्त करने वाली बहुरा मामा का वह चौघटिया इनार (कुआं) आज भी मौजूद है। जिससे होकर कभी चारों दिशा में जाने का रास्ता था, इसी के माध्यम से बहुरा मामा सोने की नाव पर सवार होकर कुंआ से कमला के रास्ते अन्य जगहों पर जाया करती थी। बहुरा मामा के संबध में कहा जाता है कि सामंतियों को खत्म करने के लिए उन्होंने तंत्र साधना की थी, जो बाद में इलाके की पहचान बन गई। उस जमाने में बहुरा मामा एक स्कुल चलाया करती थी जो देश भर में तंत्र साधकों का एक प्रमुख केन्द्र था। स्थानीय निवासी कौशल किशोर क्रांति बताते हैं कि ऐसी ही कई मान्यताओं के बीच बखरी प्रसिद्व है। बहुरा मामा अपना जप, योग और यज्ञ ठूठी पाकड़ के तले करती थी। वह पाकड़ बहुरा मामा के इच्छानुसार वाहन एवं अन्य मनोकामना सिद्धि का कार्य करने वाला था। ठूठी पाकड़ के पास ही चौघटिया इनार का विशाल जलागार था और इसके चार घाटों का पानी चार प्रकार के स्वाद वाला था। ममतामयी मां एवं कर्मपक्ष पर दृढ़ रहने वाली साधिकाओं की गुरूआइन बहुरा आदिशक्ति दुर्गा की परम आराधिका, शावर-मंत्र सिद्ध साधिका थी। सैकड़ों महिलाओं ने अपने स्वजनों को त्यागकर या खोकर ही उससे मंत्रसिद्धि प्राप्त की थी। उन्हें अपनी सिद्धि के लिए कठिन परीक्षा के दौर से गुजरना पड़ता था। कहा जाता है कि बहुरा मामा ने अपने साधना के बल पर मुसीबत के समय फैसला मां दुर्गा पर छोड़ देती थी, हमेशा उसे न्याय मिलता था और अपने पक्ष में मिलता था। प्रो. रविंद्र राकेश के शब्दों में निश्चित रूप से बखरी तंत्र, मंत्र, योग, साधना एवं ज्ञान की भूमि रही है। पतंजलि कृत महाभाष्य के अनुसार वाणी के चार पद होते हैं, जिन्हें शब्द रूपी वृषभ के चार सींग के रूप में नाम, आख्यात, उपसर्ग और निपात (परा, पश्यन्ती, मध्यमा और वैखरी) अभिहित किया गया है। यानि ”बखरी” वाणी और योग-साधना की भूमि से प्रसारित होकर कालक्रम में ”बखरी” नाम से अभिहित हुआ होगा

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