Supreme Court : दिल्ली-NCR में हाल में हुए रेप और यौन उत्पीड़न की घटनाओं से संबंधित स्वत: संज्ञान की कार्यवाही में सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को दिल्ली पुलिस और केंद्रीय गृह मंत्रालय (MHA) को चार सप्ताह के भीतर अपने जवाब रिकॉर्ड पर रखने का निर्देश दिया। अदालत ने मौखिक रूप से कहा कि अपराध होने के बाद कार्रवाई करने के बजाय अपराधों को रोकना महत्वपूर्ण है। न्यायमूर्ति जे.बी. पारदीवाला और न्यायमूर्ति के. विनोद चंद्रन की पीठ ने महिलाओं और बच्चों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए प्रभावी निवारक उपायों और संवेदनशील सार्वजनिक स्थानों की लगातार निगरानी की आवश्यकता पर जोर दिया।
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शीर्ष अदालत ने मौखिक रूप से कहा कि केवल कागजों पर उपाय करना पर्याप्त नहीं होगा और अधिकारियों को अपराधों को रोकने के लिए ठोस कार्रवाई करनी होगी। न्यायमूर्ति पारदीवाला की अध्यक्षता वाली पीठ ने कहा, “हमें मिलकर काम करना होगा। हमें यह सुनिश्चित करना होगा कि दिल्ली-NCR की हर महिला रात 11 बजे भी सड़कों या मेट्रो में यात्रा करते समय सुरक्षित महसूस करे।” इसने आगे कहा कि ध्यान अपराध को रोकने पर होना चाहिए, न कि केवल अपराध होने के बाद कार्रवाई करने पर।
शीर्ष अदालत ने कहा, “महत्वपूर्ण यह है कि अपराध को रोका जाए, न कि अपराध किए जाने के बाद आप क्या करते हैं।” अदालत ने जोर देते हुए कहा कि पुलिस को ऐसे “गुंडों और असामाजिक तत्वों” के मन में डर पैदा करना होगा, जो इस तरह के अपराध करने की प्रवृत्ति रखते हैं।
सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली पुलिस से लगातार निगरानी के अभाव में CCTV निगरानी की प्रभावशीलता पर भी सवाल किया और पूछा कि क्या संवेदनशील इलाकों की लगातार निगरानी के लिए कोई तंत्र मौजूद है। अदालत ने घटनाओं की निगरानी और उन पर प्रतिक्रिया देने के लिए एक समर्पित “वार रूम” की अनुपस्थिति पर भी सवाल उठाया और पूछा कि ऐसे तंत्र के बिना अपराध को कैसे रोका जा सकता है।
पीठ ने कहा, “आपको उस व्यक्ति के मन में डर पैदा करना होगा, जो अपराध करने के लिए तैयार है।” पीठ ने कहा कि पुलिस को यह डर पैदा करना होगा कि इस तरह के अपराध करने के गंभीर परिणाम होंगे। यह कार्यवाही दिल्ली-NCR में रेप और यौन उत्पीड़न की कई परेशान करने वाली रिपोर्टों पर सुप्रीम कोर्ट द्वारा स्वत: संज्ञान लेने के बाद शुरू हुई है।
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28 सितंबर को पारित अपने आदेश में शीर्ष अदालत ने पार्क, सड़कों, बसों, मेट्रो स्टेशनों, सबवे और फुटब्रिज सहित सार्वजनिक स्थानों की सुरक्षा को लेकर गंभीर चिंता व्यक्त की थी। अदालत ने कहा था कि अपर्याप्त रोशनी, खराब निगरानी या ढीली गश्त के कारण ऐसे स्थानों को हाई-रिस्क जोन बनने की अनुमति नहीं दी जा सकती।
पीठ ने सार्वजनिक स्थानों पर सुरक्षा व्यवस्था, नेशनल डेटाबेस ऑन सेक्सुअल ऑफेंडर्स (NDSO), इन्वेस्टिगेशन ट्रैकिंग सिस्टम फॉर सेक्सुअल ऑफेंसेज (ITSSO), मिशन शक्ति कार्यक्रम, आपातकालीन प्रतिक्रिया प्रणाली, महिला हेल्पलाइन, CCTV कवरेज, महिला हेल्प डेस्क और वन स्टॉप सेंटर के इस्तेमाल पर व्यापक स्टेटस रिपोर्ट भी मांगी थी।
इसने दिल्ली पुलिस को प्रत्येक पुलिस जिले के लिए समर्पित टीमें गठित करने का निर्देश दिया था, ताकि संवेदनशील स्थानों की पहचान की जा सके और जिलेवार संवेदनशीलता मानचित्र तैयार किए जा सकें। इसने आगे संवेदनशील क्षेत्रों में रोशनी और CCTV बुनियादी ढांचे का ऑडिट करने और गश्त बढ़ाने का आदेश दिया था।
यह कार्यवाही कई रिपोर्ट किए गए यौन अपराधों की पृष्ठभूमि में हुई, जिनमें आस्था कुंज पार्क में 17 वर्षीय लड़की के साथ कथित सामूहिक रेप और ग्रेटर नोएडा से दिल्ली जा रही चलती स्लीपर बस के अंदर नाबालिग के कथित यौन उत्पीड़न का मामला शामिल है। शीर्ष अदालत ने कहा था कि बाद की घटना 2012 के निर्भया मामले की दर्दनाक समानताएं सामने लाती है। मामले को अब आगे की सुनवाई के लिए अस्थायी रूप से 16 नवंबर को सूचीबद्ध किया गया है। (आईएएनएस)
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