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Uttarakhand : बद्रीनाथ मंदिर से जुड़ी यह रोचक बातें आपको कर देंगी हैरान !

बद्रीनाथ मंदिर से जुड़ी बहुत सी बातें आप भले ही जानते हों पर मंदिर से जुड़ी इस रोचक बैटन को आप बिल्कुल भी नहीं जानते होंगे.

By इंडिया वॉइस 
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उत्तराखंड,16 नवंबर (उज्ज्वल मिश्रा ) :  उत्तराखंड को देवभूमि यूं ही नहीं कहा जाता है। आपको बता दें कि यहां पर हमेशा से ही देवी देवताओं की सत्ता चलती चली आ रही है। देवभूमि में स्थित चार धाम से जुड़ी ऐसी अनेक रोचक बातें हैं जो आप सभी को जरुर जाननी चाहिए। इस आर्टिकल के माध्यम से हम आपको बताएंगे कि आखिरकार देवभूमि में स्थित चारों धामों से जुड़ी वो रोचक बातें कौन सी हैं।

 

बद्रीनाथ धाम में स्थापित मूर्ति से जुड़े रोचक तथ्य

आप में से बहुत से कम लोगों को यह पता होगा कि बद्रीनाथ धाम में स्थापित प्रतिमा किस तरह से स्थापित की गई थी। सिर्फ इतना ही नहीं मंदिर में स्थापित मूर्ति की पूजा अर्चना किस तरह से की जाती है इस पर भी हम चर्चा करेंगे।

ऐसा कहा जाता है क‌ि बद्रीनाथ धाम की मूर्ति शालिग्राम शिला से बनी हुई है। यह मूर्त‌ि ‘चतुर्भुज ध्यानमुद्रा’ में स्थापित है। आपको बता दें कि सिद्ध ऋषि-मुनि इसके प्रधान अर्चक थे। ऐसा कहते हैं कि जब बौद्धों का प्राबल्य हुआ तब उन्होंने इसे भगवान बुद्ध की मूर्ति मानकर पूजा-अर्चना आरम्भ कर दी थी।

आदि देव शंकराचार्य की प्रचार-यात्रा के समय बौद्ध धर्म से जुड़े लोगों ने बद्रीनाथ धाम में स्थापित भगवान विष्णु की मूर्ति को वहाँ स्थित अलकनन्दा नदी में फेंक कर तिब्बत भाग गए। तब आदि देव शंकराचार्य ने भगवान विष्णु की उस प्रतिमा को अलकनन्दा नदी से बाहर निकालकर मूर्ति की स्थापना की। हालाँकि इसके बाद मूर्ति पुन: स्थानान्तरित हो गयी और तीसरी बार भगवान विष्णु के उस प्रतिमा को तप्तकुण्ड से निकालकर रामानुजाचार्य ने बद्रीनाथ धाम में इसकी स्थापना की।

 

बद्रीनाथ धाम है हिन्दुओं का मुख्य यात्रा-धाम 

उत्तर दिशा में हिमालय की घाटी में स्थित बद्रीनाथ धाम को हिन्दुओं का मुख्य यात्रा-धाम माना जाता है। वहीं आपको बता दें कि इस मंदिर नर-नारायण विग्रह की पूजा होती है और 24 घंटे मंदिर में भगवान विष्णु के समक्ष अखण्ड दीप जलता रहता है, जिसे ‘अचल ज्ञानज्योति’ का प्रतीक माना जाता है। आपको यह जान कर हैरानी होगी कि बद्रीनाथ मंदिर के जिस दिन कपाट खुलते हैं उस दिन ऐसी मान्यता है कि ‘रावल’ साड़ी पहन कर पार्वती का श्रृंगार करने के बाद ही मंदिर के गर्भगृह में प्रवेश करते हैं।

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मंदिर के गर्भगृह में जाने के बाद पूरे विधि-विधान से पूजा अर्चना की जाती है तब जाके मंदिर का कपाट खुलता है। मंदिर से जुड़ी ऐसी मान्यता के ही कारण पहाड़ी लोग रावल को भगवान के रूप में पूजते हैं। सिर्फ इतना ही नहीं वह लोग उन्हें पार्वती का रूप भी मानते हैं। ऐसा मना जाता है कि पहाड़ों में जो लोग रावल को नहीं पूजते वह अच्छे नहीं हैं ना ही उन्हें धार्मिक समझा जाता है।

 

बद्रीनाथ के हैं दो और नाम 

भगवान बद्रीनाथ के दो और नाम दिए गए हैं। पहला बद्रीनाथ तो वहीं दूसरा बद्रीविशाल। बद्री को बैर कहा जाता है ऐसे में जानकरों की मानें  तो बद्रीनाथ क्षेत्र में बैर के जंगल हुआ करते थे यही कारण है कि इस क्षेत्र में स्थित भगवान विष्णु के विग्रह अर्थात (आकृति) को बद्रीनाथ की संज्ञा परदान की गई।

 

बद्रीनाथ धाम में सिर्फ रावल को ही है पूजा का अधिकार 

आप में से बहुत कम लोगों को यह पता होगा कि बद्रीनाथ धाम में रहने वाले ‘रावल’ अर्थात पुजारी पुजारी से ताल्लुक रखते हैं. मंदिर के पुजारी केरल के ब्राह्मण होते हैं। सिर्फ इतना ही नहीं कहा जाता है कि मंदिर में पूजा पाठ करने का अधिकार सिर्फ़ और सिर्फ इन्हीं को प्राप्त होता है। आपको बता दें कि हिमालय की घाटी में स्थित इस मंदिर सुदूर दक्षिण के पुजारी को नियुक्त करने के इस परम्परा को आदि देव शंकराचार्य ने शुरू की थी। जो आज तक उसी रूप में चलती चली आ रही है।

आपको बता दें कि केरल के नंबूदरीपाद ब्राह्मणों में से ‘रावल’ का चयन बद्रीनाथ मंदिर से जुड़ी समिति ही करती है। वहीं इनकी न्यूनतम योग्यता भी निर्धारित की गई है। आपको बता दें कि मंदिर से जुड़े रावल अर्थात पुजारी की न्यूनतम योग्यता यह है कि उन्हें वहां के ‘वेद-वेदांग’ के साथ साथ विद्यालय का स्नातक और कम से कम उनके पास शास्त्री की उपाधि होनी आवश्यक है। इसके अलावा मंदिर में पूजा अर्चना करने वाला ‘रावल’ ब्रह्मचारी भी होना चाहिए।

 

हिमपात के दौरान रावल वापस चले जाते हैं केरल 

भारी हिमपात के कारण जब हर वर्ष साल के छह महीने तक जब मंदिर के कपाट बंद कर दिये जाते हैं तब मंदिर के ‘रावल’ वापस अपने घर केरल चले जाते हैं और कपाट खुलने के वक्त वापस बद्रीनाथ धाम आ जाते हैं। आपको बता दें कि यहां एक कुंड है ज‌िसमें हर वक्त गर्म पानी आता रहता है। चाहे कोई सा भी मौसम हो यह पानी हमेशा गर्म ही रहता है. हालाँकि आपको बता दें कि देखने में खौलता हुआ द‌िखाई देने वाला कुंड का पानी छूने पर बहुत ही कम गर्म महसूस होता है। लोग इसमें स्नान करने के बाद ही बद्रीनारायण की पूजा-अर्चना करते हैं।

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