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बाबा साहेब आंबेडकर जयंती: क्या शिक्षित दलित समाज निभा रहा है जिम्मेदारी या बढ़ रही है निराशा?

By HO BUREAU 

Updated Date

ambedkar jayanti 2026

हर वर्ष 14 अप्रैल को Bhimrao Ramji Ambedkar की जयंती पूरे देश में बड़े सम्मान और उत्साह के साथ मनाई जाती है। वे केवल भारतीय संविधान के निर्माता ही नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय, समानता और शिक्षा के सबसे बड़े समर्थक भी थे। उन्होंने दलित समाज को शिक्षा के माध्यम से सशक्त बनने का संदेश दिया था “शिक्षित बनो, संगठित रहो, संघर्ष करो” उनका मूल मंत्र था।

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लेकिन आज के परिप्रेक्ष्य में यह सवाल उठता है कि क्या शिक्षित दलित वर्ग बाबा साहेब के सपनों पर खरा उतर रहा है? कई सामाजिक चिंतकों का मानना है कि जिस तरह से शिक्षा प्राप्त करने के बाद समाज के प्रति जिम्मेदारी निभाई जानी चाहिए थी, वह अपेक्षित स्तर पर नहीं दिखती। बाबा साहेब की सोच केवल व्यक्तिगत उन्नति तक सीमित नहीं थी, बल्कि सामूहिक विकास पर आधारित थी।

तुलनात्मक रूप से देखा जाए तो पहले के दौर में शिक्षा एक संघर्ष थी, लेकिन आज के समय में अवसरों की संख्या बढ़ी है। इसके बावजूद समाज के कमजोर वर्गों के लिए जमीनी स्तर पर बदलाव की गति धीमी दिखाई देती है। उदाहरण के तौर पर, गांवों और छोटे शहरों में आज भी शिक्षा, स्वास्थ्य और सामाजिक समानता की स्थिति में अपेक्षित सुधार नहीं हुआ है। ऐसे में यह अपेक्षा की जाती है कि शिक्षित वर्ग आगे आकर नेतृत्व करे और समाज को दिशा दे।

हालांकि यह भी ध्यान रखना जरूरी है कि यह पूरी तरह से एकतरफा तस्वीर नहीं है। कई शिक्षित दलित युवा आज विभिन्न क्षेत्रों में उत्कृष्ट कार्य कर रहे हैं और समाज के उत्थान के लिए सक्रिय रूप से काम कर रहे हैं। लेकिन व्यापक स्तर पर जागरूकता और सामाजिक जिम्मेदारी का भाव और अधिक मजबूत होना चाहिए।

बाबा साहेब आंबेडकर की जयंती केवल एक उत्सव नहीं, बल्कि आत्ममंथन का अवसर भी है। यह दिन हमें याद दिलाता है कि शिक्षा का वास्तविक उद्देश्य केवल नौकरी पाना नहीं, बल्कि समाज में समानता और न्याय की स्थापना करना है।

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अंततः, यह कहना उचित होगा कि यदि शिक्षित वर्ग बाबा साहेब के आदर्शों को अपने जीवन में उतारे और समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारी को समझे, तो उनका सपना एक सशक्त और समतामूलक भारत अवश्य साकार हो सकता है।

सपन दास

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