दो दिनों तक चले फैक्ट्री मजदूरों के जोरदार विरोध प्रदर्शन के बाद नोएडा प्रशासन आखिरकार हरकत में आया है। न्यूनतम वेतन को लेकर बढ़ते असंतोष के बीच प्रशासन ने रविवार को श्रमिकों के हित में कई महत्वपूर्ण फैसलों का ऐलान किया, जिससे औद्योगिक क्षेत्रों में तनाव कम करने की कोशिश की गई है।
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नोएडा: दो दिनों तक चले फैक्ट्री मजदूरों के जोरदार विरोध प्रदर्शन के बाद नोएडा प्रशासन आखिरकार हरकत में आया है। न्यूनतम वेतन को लेकर बढ़ते असंतोष के बीच प्रशासन ने रविवार को श्रमिकों के हित में कई महत्वपूर्ण फैसलों का ऐलान किया, जिससे औद्योगिक क्षेत्रों में तनाव कम करने की कोशिश की गई है।
सेक्टर-6 स्थित नोएडा अथॉरिटी कार्यालय में हुई एक उच्चस्तरीय बैठक में जिला प्रशासन, पुलिस और श्रम विभाग के वरिष्ठ अधिकारियों ने मिलकर ये निर्णय लिए।
प्रशासन ने साफ कहा कि श्रमिकों के साथ सम्मानजनक व्यवहार सुनिश्चित करना सभी औद्योगिक इकाइयों की जिम्मेदारी होगी।
यह विरोध प्रदर्शन नोएडा के फेज-2 क्षेत्र में तेज हुआ, जब हाल ही में हरियाणा सरकार ने न्यूनतम वेतन को ₹14,000 से बढ़ाकर ₹19,000 कर दिया।
इसके विपरीत, उत्तर प्रदेश में अभी भी न्यूनतम वेतन करीब ₹13,000 है।
यही अंतर मजदूरों के असंतोष की सबसे बड़ी वजह बना।
एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि उत्तर प्रदेश सरकार श्रम कानूनों में संशोधन की प्रक्रिया में है। इसमें:
EPF और ESI जैसी सामाजिक सुरक्षा सुविधाओं को मजबूत करने पर काम किया जा रहा है
मजदूरों की समस्याओं के समाधान के लिए प्रशासन ने एक कंट्रोल रूम भी स्थापित किया है, जहां चार हेल्पलाइन नंबर जारी किए गए हैं। साथ ही, औद्योगिक इकाइयों में नियमित निरीक्षण और श्रमिक-प्रबंधन के बीच संवाद बनाए रखने के निर्देश दिए गए हैं, ताकि विवाद समय रहते सुलझाए जा सकें।
नोएडा एंटरप्रेन्योर्स एसोसिएशन के एक प्रतिनिधि ने कहा कि मजदूरों का गुस्सा हरियाणा में वेतन वृद्धि से जुड़ा हुआ है। हालांकि उन्होंने यह भी चेतावनी दी कि अचानक वेतन में भारी बढ़ोतरी से उद्योगों पर आर्थिक दबाव बढ़ सकता है, खासकर कोविड के नुकसान और अंतरराष्ट्रीय हालात के चलते।
फिर भी, उन्होंने भरोसा दिलाया कि उद्योग जगत सरकार के नियमों का पालन करेगा।
10 लाख से ज्यादा लोगों की रोजी-रोटी दांव पर
नोएडा और ग्रेटर नोएडा देश के प्रमुख औद्योगिक केंद्र हैं, जहां इलेक्ट्रॉनिक्स, आईटी, कपड़ा, ऑटोमोबाइल और मोबाइल निर्माण जैसे क्षेत्रों में 10 लाख से अधिक लोग काम करते हैं।
मजदूरों के विरोध ने एक बार फिर यह दिखा दिया है कि
वेतन और सम्मानदोनों ही श्रमिकों के लिए बराबर जरूरी हैं।
अब देखना होगा कि प्रशासन के ये फैसले जमीन पर कितने प्रभावी साबित होते हैं और क्या इससे मजदूरों का भरोसा फिर से बहाल हो पाता है या नहीं।