Sitapur : जनपद में हाल ही में हुई मूसलाधार बारिश और उसके चलते निचले इलाकों में आई बाढ़ ने जहां एक तरफ जनजीवन और खेती-किसानी को बुरी तरह प्रभावित किया, वहीं दूसरी तरफ इस प्राकृतिक घटना ने सीतापुर के पर्यावरण और जल तंत्र को एक अभूतपूर्व जीवनदान दिया है। तात्कालिक रूप से फसलों के जलमग्न होने और ग्रामीणों को पलायन का दंश झेलने के बावजूद, इस वर्षा ने जिले के गहरे होते जल संकट को दूर करने में ऐतिहासिक भूमिका निभाई है।
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अंधाधुंध दोहन से गहरा रहा था जल संकट
सीतापुर जनपद में मुख्य रूप से धान और गन्ने जैसी फसलों की खेती बहुतायत में की जाती है। इन फसलों की अधिक सिंचाई आवश्यकताओं के कारण विगत कई दशकों से भूजल (Groundwater) का भारी पैमाने पर दोहन किया जा रहा था। मानसूनी बारिश की कमी और कैचमेंट (जलग्रहण) क्षेत्रों के सूखने की वजह से जिले का वाटर टेबल प्रतिवर्ष तेजी से नीचे गिर रहा था। किसान ट्यूबवेल के बढ़ते संकट से चिंतित थे और आने वाले समय के लिए एक भीषण सूखा व जल संकट का अंदेशा जताया जा रहा था।
‘नाला’ बन चुकी नदियों की प्राकृतिक सफाई और पुनरुद्धार
वर्षों की उपेक्षा और सूखे कैचमेंट के कारण जिले की मैदानी नदियां सरायन, पिरई, उल्ल और चौका अस्तित्व की लड़ाई लड़ रही थीं और सिमटकर महज एक ‘नाले’ जैसी नजर आने लगी थीं। हालिया भारी वर्षा के बाद नदियों में आए जबरदस्त जलप्रवाह और दबाव ने इनकी प्राकृतिक सफाई कर दी है। बरसों से जमा सिल्ट और रुकावटें बह जाने से इन नदियों का खोया हुआ स्वाभाविक प्रवाह (Stream Flow) फिर से बहाल हो गया है। नदियाँ एक बार फिर अपने भव्य और प्राकृतिक स्वरूप में कल-कल करती बह रही हैं।
भूमिगत जलस्रोतों (Aquifers) का व्यापक रिचार्ज
मूसलाधार बारिश के बाद कछार की कच्ची जमीन, खेत-खलिहानों, ताल-तलैयों और नदियों के कैचमेंट क्षेत्रों में कई दिनों तक जलभराव रहा। यह संचित पानी धीरे-धीरे जमीन के भीतर रिसाव (Infiltration) के जरिए गहरे जलस्रोतों तक पहुँचा। भू-गर्भ शास्त्रियों और पर्यावरणविदों के अनुसार, इस जलभराव से जिले के ‘एक्विफर्स’ का व्यापक स्तर पर पुनर्भरण (Recharge) हुआ है। इससे न केवल सीतापुर का भूजल स्तर ऊपर उठेगा, बल्कि कृषि क्षेत्र में किसानों के ट्यूबवेलों को भी भरपूर पानी मिलेगा।
गोमती नदी के ‘लीन सीजन’ के लिए बनी संजीवनी
सीतापुर में तैनात सिंचाई विभाग के अधिशासी अभियंता विशाल पोरवाल का कहना है कि सीतापुर और इसके आस-पास के कैचमेंट में हुआ यह जल संचयन राज्य की प्रमुख नदी ‘गोमती’ के लिए भी किसी संजीवनी से कम नहीं है। आमतौर पर गर्मियों और शुष्क महीनों (लीन सीजन) में गोमती नदी का जलस्तर काफी गिर जाता था और प्रवाह थम सा जाता था।
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अब सरायन और पिरई जैसी सहायक नदियों का जलप्रवाह मेंटेन रहने तथा सब-सर्फेस वाटर (भूजल बेसफ्लो) मजबूत होने से मार्च-अप्रैल की भीषण गर्मी में भी गोमती नदी में निरंतर और पर्याप्त जल बना रहने की उम्मीद है। बाढ़ और जलभराव तात्कालिक रूप से निश्चित ही ग्रामीणों और किसानों के लिए भारी मुश्किलें लेकर आए हैं, लेकिन अगर दूरगामी और पर्यावरणीय दृष्टिकोण से देखा जाए, तो इस बारिश ने सीतापुर और पूरे गोमती बेसिन को जल-समृद्धि का एक बड़ा तोहफा दिया है।
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