जब सूर्य करवट लेता है और जीवन में नई शुरुआत होती है
मकर संक्रांति केवल एक पर्व नहीं, बल्कि प्रकृति के साथ मनुष्य के गहरे रिश्ते का उत्सव है। इस दिन सूर्य धनु राशि से निकलकर मकर राशि में प्रवेश करता है और उत्तरायण की यात्रा शुरू करता है। इसे प्रकाश, ऊर्जा और सकारात्मकता के आगमन का संकेत माना जाता है। दिन बड़े होने लगते हैं, ठंड धीरे-धीरे ढलान पर आती है और जीवन में नई गति का संचार होता है।
पढ़ें :- BREAKING: अमेरिका ने भारत के लिए टैरिफ दर 50% से घटाकर 18% कर दी- बड़े व्यापार समझौते ने चीन को भी पीछे छोड़ा
यह पर्व सौर गणना पर आधारित है, इसलिए हर साल लगभग एक ही तारीख़ 14 या 15 जनवरी को मनाया जाता है, जो इसे अन्य त्योहारों से अलग बनाता है।
इतिहास और धार्मिक महत्व
भारतीय परंपरा में मकर संक्रांति को अत्यंत शुभ माना गया है। शास्त्रों में उत्तरायण काल को देवताओं का दिन कहा गया है, ऐसा समय जब किए गए दान और पुण्य कई गुना फल देते हैं। यही कारण है कि इस दिन स्नान, जप, दान और सूर्योपासना का विशेष महत्व है।
पवित्र नदियों में स्नान को आत्मशुद्धि का प्रतीक माना गया है। यह पर्व हमें प्रकृति के नियमों के अनुसार जीवन जीने की प्रेरणा देता है जहाँ हर बदलाव को स्वीकार किया जाता है, न कि उससे लड़ा जाता है।
भारत के अलग-अलग रंगों में मकर संक्रांति
भारत में यह त्योहार हर क्षेत्र में अलग नाम और रूप में मनाया जाता है, लेकिन भावना एक ही रहती है, कृतज्ञता और उल्लास।
पढ़ें :- Budget 2026 का गहराई से विश्लेषण: टैक्स से लेकर विकास तक, किसे मिला क्या?
उत्तर प्रदेश और बिहार में मकर संक्रांति को खिचड़ी पर्व कहा जाता है। इस दिन खिचड़ी पकाई जाती है और दान के माध्यम से समाज के साथ बाँटी जाती है।
गुजरात में यह पर्व पतंग उत्सव के रूप में प्रसिद्ध है, जहाँ आसमान रंगीन पतंगों से भर जाता है और पूरा शहर उत्सव में डूब जाता है।
दक्षिण भारत में इसे पोंगल कहा जाता है, जो फसल और प्रकृति के प्रति आभार प्रकट करने का पर्व है।
असम में माघ बिहू के दौरान सामूहिक भोज, पारंपरिक खेल और मिलन की परंपरा निभाई जाती है।
यहाँ बच्चों द्वारा कौओं को पकवान खिलाने की परंपरा है, जो लोककथाओं और प्रकृति से जुड़ाव का प्रतीक है।
पढ़ें :- ₹728 करोड़ से बदलेगा यमुनापार का भविष्य: विकास को मिली नई रफ्तार
तिल-गुड़ से खिचड़ी तक: स्वाद में छिपा विज्ञान
मकर संक्रांति के पकवान सिर्फ़ स्वाद के लिए नहीं, बल्कि शरीर की ज़रूरतों को ध्यान में रखकर बनाए जाते हैं।
दान-पुण्य और सामाजिक चेतना
इस दिन दान को विशेष महत्व दिया जाता है। तिल, गुड़, अन्न और वस्त्र का दान समाज में संतुलन और संवेदनशीलता को मज़बूत करता है। यह पर्व हमें याद दिलाता है कि उत्सव केवल अपने लिए नहीं, दूसरों के साथ साझा करने के लिए होते हैं।
स्वास्थ्य और ऋतुचक्र का संतुलन
सर्दियों के अंत में शरीर को अधिक ऊर्जा की आवश्यकता होती है। मकर संक्रांति के भोजन और दिनचर्या इसी प्राकृतिक ज़रूरत के अनुसार तय की गई है। यह पर्व भारतीय जीवनशैली में छिपे वैज्ञानिक दृष्टिकोण का सुंदर उदाहरण है।