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वीर सावरकर पुरस्कार विवाद: राजनीति, इतिहास और सम्मान की बहस

By HO BUREAU 

Updated Date

Veer Savarkar Award controversy

सावरकर अवॉर्ड विवाद: नामांकन से इंकार तक का नाटकीय मोड़

हाल के दिनों में “वीर सावरकर” नाम के पुरस्कार को लेकर देश की राजनीति में एक गहरा विवाद उभरता जा रहा है। मामला तब शुरू हुआ जब कांग्रेस सांसद शशि थरूर समेत कई नाम इस पुरस्कार के लिए घोषित किए गए, लेकिन बिना उनसे अनुमति लिए नाम सार्वजनिक कर दिया गया, जिससे सियासी हलचल तेज़ हो गई।

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शशि थरूर ने स्पष्ट रूप से कहा कि वे पूरी तरह सम्मान लेने के लिए तैयार नहीं हैं क्योंकि उन्हें पुरस्कार के बारे में पहले से जानकारी नहीं दी गई थी। उन्होंने इसे आयोजकों की गैरज़िम्मेदाराना हरकत करार दिया।

 

विवाद की जड़: बिना सहमति नाम घोषित करना

इस पुरस्कार को HRDS इंडिया नामक एक संगठन ने “वीर सावरकर इंटरनेशनल इम्पैक्ट अवॉर्ड 2025” के रूप में पेश किया। कुल छह नामों में थरूर सहित अन्य को भी शामिल किया गया, लेकिन थरूर ने कहा कि उन्हें मीडिया रिपोर्टों के ज़रिए ही पता चला कि उनका नाम सूची में है। उन्होंने कोई स्वीकृति नहीं दी और इसलिए उन्होंने पुरस्कार को स्वीकार करने से इनकार कर दिया।

थरूर के इस फैसले ने राजनीतिक वर्ग के बीच बहस को और तेज़ कर दिया है, कि क्या किसी को सम्मान देना है तो पहले उसकी सहमति क्यों नहीं ली गई?

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सावरकर को लेकर राजनीतिक विभाजन

वीर सावरकर जैसे ऐतिहासिक व्यक्तित्व को लेकर भारत की राजनीति पहले से ही विभाजित रही है। कुछ राजनीतिक दल और समूह उन्हें राष्ट्रीय नायक मानते हैं, जबकि दूसरों का तर्क है कि उनके जीवन के विवादित पहलू हैं जिन पर गहराई से विचार करने की ज़रूरत है।

हाल ही में RSS प्रमुख मोहन भागवत ने सावरकर को भारत रत्न देने की मांग की, जिस पर भाजपा समर्थक और अभिनेत्री कंगना रनौत ने खुलकर समर्थन किया, उनके अनुसार “भागवत की भावना ही देश का भाव है।” वहीं विपक्षी दल इस प्रस्ताव का विरोध कर रहे हैं कि सावरकर के इतिहास की कई बातें विवादास्पद हैं और उन पर खुलकर चर्चा होनी चाहिए।

 

नामांकन से इंकार: राजनीति या सिद्धांत?

शशि थरूर और कुछ अन्य नेताओं के इंकार ने एक बड़ा सवाल खड़ा किया है: क्या व्यक्ति को सम्मान देने से पहले उसकी सहमति लेना अनिवार्य नहीं होना चाहिए? इससे भी बड़ा सवाल यह उभरता है कि ऐसे पुरस्कारों को राजनीति की रणनीति बनाने से बचा जाना चाहिए, ताकि सम्मान की गरिमा बनी रहे।

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इस मुद्दे ने यह भी उजागर किया कि पुरस्कार केवल प्रशंसा का माध्यम नहीं हैं, बल्कि राजनीतिक और वैचारिक संदेश भी भेजते हैं, खासकर ऐसे नामों पर जो इतिहास और राजनीति में विभाजन पैदा करते हैं।

 

निष्कर्ष

वीर सावरकर पुरस्कार विवाद सिर्फ एक नामांकन का मामला नहीं रह गया है, यह अब भू political विमर्श बन चुका है।

यह पूरा विवाद यह संकेत देता है कि आज भी इतिहास, सम्मान और राजनीति की सीमाएँ एक दूसरे से जुड़ी हुई हैं, और ज़रूरत है कि इन विषयों पर विचारशील और पारदर्शी संवाद किया जाए।

सपन दास 

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