पश्चिम बंगाल में आगामी दो चरणों के मतदान से ठीक पहले जिस तरह का “चुनावी सन्नाटा” देखने को मिल रहा है, उसने राजनीतिक विश्लेषकों और आम जनता दोनों को चौंका दिया है। आमतौर पर यहां चुनाव का मतलब होता है हर गली, हर चौराहे पर झंडे, बैनर और जोरदार प्रचार अभियान। लेकिन इस बार न तो वामपंथी दलों और कांग्रेस के झंडे नजर आ रहे हैं और न ही सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस (TMC) का वैसा व्यापक प्रचार दिख रहा है।
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इस बदलाव के पीछे कई अहम कारण सामने आ रहे हैं। सबसे पहला कारण है Election Commission of India की सख्ती। चुनाव आयोग ने इस बार आचार संहिता के उल्लंघन पर कड़ी नजर रखी है, जिससे अनियंत्रित पोस्टर-बैनर लगाने पर रोक लगी है। इसके अलावा, पर्यावरण को ध्यान में रखते हुए भी कई स्थानों पर प्लास्टिक बैनरों पर प्रतिबंध लगाया गया है।
दूसरा बड़ा कारण है प्रचार के तरीकों में बदलाव। अब राजनीतिक दल पारंपरिक रैलियों और झंडों के बजाय डिजिटल और माइक्रो-लेवल कैंपेन पर ज्यादा ध्यान दे रहे हैं। सोशल मीडिया, व्हाट्सऐप ग्रुप और बूथ स्तर पर व्यक्तिगत संपर्क को प्राथमिकता दी जा रही है। उदाहरण के तौर पर, जहां पहले कोलकाता और ग्रामीण इलाकों में बड़े-बड़े होर्डिंग्स दिखते थे, वहीं अब उम्मीदवार घर-घर जाकर वोटरों से संपर्क कर रहे हैं।
तीसरा पहलू सुरक्षा और हिंसा की आशंका से जुड़ा है। पश्चिम बंगाल में चुनाव के दौरान हिंसा का इतिहास रहा है, इसलिए इस बार प्रशासन ने भीड़भाड़ वाले प्रचार से बचने और शांतिपूर्ण मतदान सुनिश्चित करने के लिए कड़े कदम उठाए हैं। इससे भी सार्वजनिक रूप से दिखने वाला चुनावी माहौल कम हुआ है।
यदि पिछले चुनावों से तुलना करें, तो 2016 या 2021 के विधानसभा चुनावों में वाम-कांग्रेस गठबंधन और TMC दोनों ने व्यापक स्तर पर प्रचार किया था। लेकिन इस बार वाम और कांग्रेस की जमीनी पकड़ कमजोर होती दिख रही है, जिससे उनके झंडे-बैनर भी कम दिखाई दे रहे हैं। वहीं TMC भी “लो-प्रोफाइल” रणनीति अपनाकर सीधे मतदाताओं तक पहुंचने की कोशिश कर रही है।
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कुल मिलाकर, पश्चिम बंगाल “भगवान भरोसे” नहीं है, बल्कि चुनावी रणनीति और प्रशासनिक सख्ती के कारण यह बदलाव देखने को मिल रहा है। अब असली तस्वीर मतदान के बाद ही साफ होगी कि यह सन्नाटा किसके पक्ष में जाता है।