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युवा देश, बूढ़ी संसद? भारत को चाहिए सोच में भी पीढ़ीगत बदलाव

By HO BUREAU 

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Generational contrast_ modern vs. traditional

21वीं सदी के सवाल, 20वीं सदी की मानसिकता

भारत दुनिया के सबसे युवा देशों में से एक है, लेकिन जब संसद की बहसें देखी जाती हैं, तो लगता है जैसे समय कहीं अटक गया हो। तकनीक, जलवायु संकट, रोज़गार, जेंडर समानता और डिजिटल भविष्य-इन मुद्दों पर चर्चा अक्सर पुरानी सोच और सीमित समझ में उलझकर रह जाती है।

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मुद्दा उम्र का नहीं, दृष्टि का है

यह बहस केवल “युवा बनाम बुज़ुर्ग” की नहीं है। सवाल यह है कि क्या हमारे नीति-निर्माता आज की दुनिया को समझते हैं? क्या वे डेटा, विज्ञान और आधुनिक शिक्षा को फैसलों का आधार बनाते हैं, या सिर्फ़ भाषण और भावनाओं पर राजनीति करते हैं?

 

जब बहस समाधान नहीं, शोर बन जाए

संसद का काम ताली बजवाना नहीं, रास्ता दिखाना है। लेकिन जब चर्चा नीतियों से हटकर व्यक्तिगत आरोपों और जुमलों में बदल जाए, तो लोकतंत्र कमज़ोर पड़ता है। देश को ऐसे प्रतिनिधि चाहिए जो सवालों से भागें नहीं, बल्कि उनका सामना करें।

 

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नई पीढ़ी क्या चाहती है?

आज का युवा सिर्फ़ नौकरी या योजनाएँ नहीं चाहता, वह निर्णय-प्रक्रिया में हिस्सेदारी चाहता है। वह संसद में ऐसे चेहरे देखना चाहता है जो भविष्य की भाषा बोलें, तकनीक को समझें और बदलाव से डरें नहीं।
अगर भारत को सच में आगे बढ़ना है, तो बदलाव सिर्फ़ सड़कों और इमारतों में नहीं, संसद की सोच में भी होना चाहिए। क्योंकि जब नेतृत्व आधुनिक होगा, तभी नीति भी समय के साथ चलेगी।

सपन दास  

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