CBI जांच का मतलब सिर्फ़ एजेंसी बदलना नहीं है। यह एक वादा है, निष्पक्षता का, पारदर्शिता का और डर-रहित जांच का। अब निगाहें इस पर टिकी हैं कि क्या हर कड़ी जोड़ी जाएगी और हर सवाल का जवाब मिलेगा।
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उत्तराखंड की अंकिता भंडारी की हत्या कोई साधारण आपराधिक मामला नहीं था, और न ही वह कभी सिर्फ़ एक फ़ाइल बनकर रह सकती थी। 2022 में हुई इस घटना ने पूरे देश को झकझोर दिया था। समय बीता, सज़ाएँ भी सुनाई गईं, लेकिन न्याय को लेकर बेचैनी बनी रही। अब अदालत के हस्तक्षेप के बाद इस केस की CBI जांच का आदेश उसी बेचैनी का औपचारिक जवाब बनकर सामने आया है।
हालाँकि निचली अदालत ने दोषियों को सज़ा दी, लेकिन “VIP एंगल”, गवाहों पर दबाव और जांच की सीमाओं को लेकर सवाल लगातार उठते रहे। अंकिता का परिवार और आम नागरिक बार-बार यही पूछते रहे—क्या सच की हर परत खोली गई?
यह फैसला अचानक नहीं आया। यह उस लगातार दबाव का नतीजा है जो जनता, सामाजिक संगठनों और पीड़ित परिवार ने बनाए रखा। यह मामला बताता है कि जब लोकतंत्र में नागरिक चुप नहीं रहते, तो व्यवस्था को सुनना ही पड़ता है।
CBI के कंधों पर अब बड़ी ज़िम्मेदारी
CBI जांच का मतलब सिर्फ़ एजेंसी बदलना नहीं है। यह एक वादा है, निष्पक्षता का, पारदर्शिता का और डर-रहित जांच का। अब निगाहें इस पर टिकी हैं कि क्या हर कड़ी जोड़ी जाएगी और हर सवाल का जवाब मिलेगा।
अंकिता आज एक नाम भर नहीं है। वह उस उम्मीद का प्रतीक है कि न्याय देर से सही, लेकिन दबाया नहीं जा सकता।