UP News : गोवंश के संरक्षण, संवर्धन और ग्रामीण अर्थव्यवस्था मजबूत करने को लेकर उत्तर प्रदेश सरकार ने गो-मूत्र खरीदने की महत्वाकांक्षी योजना शुरू करने का निर्णय लिया है। इसके लिए बुलंदशहर में स्याना के पास पायलट प्रोजेक्ट के तहत 15 गांवों को चयनित किया गया है। यूपी सरकार द्वारा 10 रुपये प्रति लीटर की दर से गोमूत्र खरीदने के इस निर्णय से गांव की चौपालों से लेकर राजनीतिक गलियारों में नई चर्चा होने लगी है।
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सरकार की ये कोशिश भले ही पारंपरिक या धार्मिक एजेंडे का हिस्सा दिखाई दे रहा हो, लेकिन यदि हम अलग दृष्टि से देखें तो सरकार के इस कदम से न सिर्फ ग्रामीण रोजगार को बढ़ावा मिलेगा, बल्कि ग्रामीण आर्थिक विकास को गति भी मिलेगी और बेसहारा गौवंशों एवं पशुओं से खेतों व चौक चौराहों को मुक्त भी किया जा सकेगा।
धरातल पर इस योजना की वास्तविकता को समझने के लिए हमें ग्रामीण भारत के वर्तमान संकट, विशेषकर लावारिस गोवंश की समस्या और खेती की बढ़ती लागत को भी समझना होगा। पारंपरिक रूप से देखें तो अब तक भारत में पशुपालन का पूरा आर्थिक ढांचा दुग्ध उत्पादन और उससे जुड़े उत्पादों पर टिका रहा है। कुछ हद तक पशुओं के गोबर से बनी खाद का भी उपयोग किया जाता रहा है।
प्रायः देखा गया है कि जैसे ही कोई पशु खासकर गाय अगर दूध देना बंद कर देती है तो पशुपालकों के लिए वो एक बोझ बन कर रह जाती है। जिसकी वजह से बीते कुछ वर्षों में उत्तर प्रदेश के ग्रामीण इलाकों में लावारिस और अनुत्पादक पशुओं की संख्या में बेतहाशा वृद्धि हुई है, जिससे न केवल फसलें बर्बाद हो रही हैं बल्कि व्यवस्था में भी तनाव पैदा हो रहा है। प्रदेश सरकार का यह पायलट प्रोजेक्ट यदि सफल होता है तो प्रदेश के किसानों और चौक चौराहों को भी इस संकट से बहुत हद तक निजात मिल सकेगा।
प्रदेश सरकार की इस पहल को लेकर यहाँ एक और बात समझने योग्य है यदि एक किसान को दूध न देने वाली गाय से रोजाना चार से पांच लीटर गोमूत्र प्राप्त होता है, तो 10 रूपये प्रति लीटर की दर से वह रोज एक गाय से 40 से 50 रुपए की अतिरिक्त आय अर्जित कर सकता है। योजना के प्रस्ताव के मुताबिक गोमूत्र खरीद की ये दर भविष्य में बढ़ाई जा सकती है, जिससे आमदनी दोगुनी हो सकती है। यूपी सरकार की ये नीति अनुत्पादक गोवंश को आर्थिक रूप से उत्पादक बनाने की है और इससे निरंतर सड़को पर बढ़ रहे लावारिश पशुओं से होने वाली परेशानी से छुटकारा मिलेगा।
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इस योजना का एक बड़ा लाभ है जैविक और प्राकृतिक खेती को मिलने वाला प्रोत्साहन। वर्तमान में रासायनिक खादों व कीटनाशकों पर सरकारी सब्सिडी का बोझ लगातार बढ़ रहा है और साथ ही खेतों की उर्वरा शक्ति भी कम हो रही है। योजना के मुताबिक एकत्र किए गए गोमूत्र का उपयोग विभिन्न स्थानीय जड़ी-बूटियों के साथ मिलाकर उच्च गुणवत्ता वाले जीवामृत जैसे जैविक कीटनाशक और फसल संवर्धक बनाने में किया जाना है। यदि ग्रामीण स्तर पर ही कीटनाशकों का निर्माण होने लगे तो किसानों को महंगे कॉपोरेट रसायनों पर निर्भर नहीं रहना पड़ेगा और ग्रामीण रोजगार के जरिए ग्रामीण अर्थव्यवस्था भी मजबूत होगी।
जिस प्रदेश में आए दिन गोकशी और गौशालाओं को लेकर राजनीति होती रही है उस प्रदेश में इस तरह की योजनाओं पर सवाल उठना लाज़िम है। अवारा पशुओं को पकड़ने और गोवंश प्रबंधन के नाम पर बजट के दुरुपयोग का आरोप विपक्ष हमेशा ही लगता रहा है, ये सरकार के लिए चुनौती बना रहेगा। प्रदेश और देश स्तर पर गोवंश संरक्षण व संवर्धन को लेकर वर्तमान सरकार के इस दृष्टिकोण की आलोचना सदन के भीतर और बाहर हमेशा होती रही है।
संसद में बहस के दौरान हल ही में कांग्रेस सांसद ने तंज भरे लहजे में ‘गोमूत्र विशेषज्ञ’ जैसे शब्दों का प्रयोग किया, जो कि राजनीतिक स्तर पर विरोध की वानगी दर्शाता है। विपक्ष का तर्क है कि ऐसी योजनाएं बढ़ती बेरोजगारी और महंगाई से जनता का ध्यान भटकाने का प्रयास मात्र हैं। गो सेवा आयोग उत्तर प्रदेश के उपाध्यक्ष महेश शुक्ला ने इस संबंध में बात करते हुए बताया कि यह प्रदेश सरकार की दूरदर्शी और महत्वाकांक्षी योजना है। इससे न सिर्फ ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूती मिलेगी बल्कि ग्रामीण रोजगार को भी बल मिलेगा और इसके जरिए सरकार की मंशा के अनुरूप महिला उद्यमियों के आगे आने से महिला सशक्तिकरण को भी मजबूती मिलेगी।
ढांचागत व्यवस्था और व्यापक रूपरेखा
वैसे तो गोमूत्र भारतीय पुरातन परम्परा में पहले से ही औषधि और अनुष्ठानों में प्रयोग लाया जाता रहा है, लेकिन यूपी सरकार द्वारा गांवों के विकास और गोवंशों के संरक्षण के लिए गोमूत्र खरीदने का यह निर्णय लीक से हटकर एक साहसिक कदम है। इस योजना के जरिए ग्रामीण अर्थव्यवस्था को आत्मनिर्भर बनाने, रासायनिक खेती के दुष्प्रभावों को कम करने और लावारिस पशुओं की समस्या का समाधान ढूंढने का सरकार का एक सराहनीय प्रयास है।
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ढांचागत व्यवस्था और इसकी व्यापक रूपरेखा को देखने से लगता है कि इस योजना की सफलता को लेकर प्रदेश सरकार की तैयारी सिर्फ़ कागजी नहीं अपितु ग्रामीण आर्थिक विकास एवं महिला उद्यम को बढ़ावा देने की सुनियोजित कार्य योजना है। गोमूत्र खरीद योजना को ग्रामीण विकास व आर्थिक क्रांति में बदलने के लिए सरकार को इसे केवल एक सरकारी योजना के रूप में देखने के बजाय एक स्टार्टअप की तरह लेना होगा और प्रोजेक्ट की सफलता के लिए हर संभव नीतिगत प्रयास के साथ ग्रामीण परिवेश में रहने वाले पशुपालकों और किसानों को निरंतर प्रोत्साहित भी करना होगा।
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अनिल शाही
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