ED का दावा है कि यह कार्रवाई कानून के तहत चल रही जांच का हिस्सा थी और किसी भी तरह की बाधा जांच की निष्पक्षता पर सवाल खड़े करती है। एजेंसी का कहना है कि सबूतों को हटाना या जब्ती प्रक्रिया में हस्तक्षेप गंभीर मामला है, जिसे अदालत के सामने उठाया गया है।
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कोलकाता में हालिया घटनाक्रम ने यह साफ़ कर दिया कि राजनीति अब बंद कमरों तक सीमित नहीं रही, वह सड़कों, कैमरों और फाइलों के बीच खुलकर लड़ी जा रही है। 8 जनवरी 2026 को जब प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने एक कथित धन शोधन मामले में छापा मारा, तब शायद किसी ने नहीं सोचा था कि यह कार्रवाई इतना बड़ा राजनीतिक तूफ़ान खड़ा कर देगी।
छापेमारी के दौरान पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी का अचानक मौके पर पहुँचना और कुछ दस्तावेज़ों को अपने साथ ले जाना, पूरे मामले का केंद्र बन गया। तस्वीरें और वीडियो सामने आए, जिनमें ममता एक फाइल हाथ में लेकर निकलती दिखाई दीं। विपक्ष ने इसे “जांच में दख़ल” करार दिया, जबकि तृणमूल कांग्रेस ने इसे “राजनीतिक षड्यंत्र से दस्तावेज़ों की रक्षा” बताया।
ED का दावा है कि यह कार्रवाई कानून के तहत चल रही जांच का हिस्सा थी और किसी भी तरह की बाधा जांच की निष्पक्षता पर सवाल खड़े करती है। एजेंसी का कहना है कि सबूतों को हटाना या जब्ती प्रक्रिया में हस्तक्षेप गंभीर मामला है, जिसे अदालत के सामने उठाया गया है।
वहीं ममता बनर्जी का तर्क है कि केंद्रीय एजेंसियों का इस्तेमाल विपक्षी दलों को डराने और चुनावी लाभ लेने के लिए किया जा रहा है। उनके अनुसार, जब जांच राजनीति में बदल जाए, तो विरोध करना लोकतांत्रिक अधिकार बन जाता है।
यह पूरा प्रकरण अब केवल एक छापे की कहानी नहीं रह गया है। यह केंद्र और राज्य के बीच बढ़ते अविश्वास, संस्थाओं की भूमिका और सत्ता संघर्ष की बड़ी तस्वीर दिखाता है। सवाल सिर्फ़ यह नहीं है कि फाइल में क्या था, सवाल यह है कि क्या भारत की राजनीति अब जांच एजेंसियों के इर्द-गिर्द घूमने लगी है?