Social Media : भारत में हुए 2014 के आम चुनाव में बड़े पैमाने पर पहली बार आधुनिक तकनीकी और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म का उपयोग किया गया, जो बहुत कारगर भी सिद्ध हुआ। इसका सबसे पहला प्रयोग भारतीय जनता पार्टी ने किया और सत्तासीन हो गयी। फिर 2019 के चुनाव में ये बात सबको माननी पड़ी कि चुनाव अब सिर्फ रैलियों और पोस्टरों से नहीं जीते जाते, बल्कि 3D तकनीकि, डेटा, व्हाट्सएप फॉरवर्ड और फेसबुक पेज से भी लोगों को प्रभावित कर चुनाव जीता जा सकता है।
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कांग्रेस नीति गठबंधन की सरकार को सत्ता से बाहर करने के लिए 2013 में बीजेपी ने आधुनिक तकनीक, फेसबुक और व्हाट्सएप का बड़े पैमाने पर उपयोग किया जिसका परिणाम रहा कि 2014 के आम चुनाव में बीजेपी ने दिल्ली की गद्दी हासिल कर ली। 2026 में अब वही तकनीकि और इकोसिस्टम उसके लिए सबसे जटिल चुनौती बनते जा रहे है।
वर्ष 2013-14 में बीजेपी ने आधुनिक तकनीक के जरिए चुनाव जीतने के लिए जो तकनीक अपनाई वो बाकी दलों से अलग थी। बीजेपी आईटी सेल ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म का इस्तेमाल कर खुद और एजेंसियो के माध्यम से बीजेपी की नितियों को खूब प्रचारित और प्रसारित किया। इन्हीं माध्यमों ने देखते ही देखते “अबकी बार मोदी सरकार” के नारे को जन जन तक पंहुचा दिया।
इन्हीं नेटवर्क व कंटेंट के बूते करोड़ों की संख्या में फॉलोअर्स बनाए जो चुनाव में पार्टी के लिए हथियार साबित हुए। लगभग 10 साल बाद अब वही हथियार बीजेपी के लिए न सिर्फ चुनौती बनते जा रहे हैं बल्कि यूं कहें कि सिरदर्द हो गए हैं।
बूथ-लेवल डिजिटल नेटवर्क
जिसके तहत नमो ऐप, मिस्ड कॉल अभियान, और हर बूथ पर व्हाट्सएप ग्रुप तैयार किया गया। जिससे बिना मीडिया के बिना फिल्टर किये संदेश सीधे कार्यकर्ता और मतदाताओं तक गया। दूसरा था कंटेंट:- सरल और सहज कंटेंट के जरिए बीजेपी IT सेल ने 24×7 मीम, 30 सेकंड से लेकर डेढ़ दो मिनिट के वीडियो और आसानी से समझे जा सकने वाले इंफोग्राफिक्स बनाए, जो मुद्दों को सरल नैरेटिव में बदलने में कामयाब हुए। जिससे विकास के साथ साथ राष्ट्रवाद और भ्रष्टाचार विरोध का नारा बुलंद हुआ।
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प्रमुख नेतृत्व का सीधा जुड़ाव
उस दौर में बीजेपी आइटी सेल तो अपना काम कर रही रहा था, प्रधानमंत्री पद के दावेदार/उम्मीदवार बीजेपी के प्रमुख नेता नरेंद्र मोदी का सोशल मीडिया हैंडल खुद एक मीडिया हाउस बन गया था। ट्विटर पर लाइव संवाद, यूट्यूब पर “मन की बात” के क्लिप और तमाम संदेश जो करोड़ों लोगों को सीधे जोड़ने में मददगार साबित हुआ, क्योंकि उस समय फेसबुक और व्हाट्सएप पर एक मैसेज लाखों तक मुफ्त में पहुंच जाता था।
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जो हथियार एक दशक से कारगर थे। अब उल्टा प्रभाव डालने लगे हैं, लगभग 10 सालों से बीजेपी के लिए आधुनिक तकनीक, इंटरनेट व सोशल मीडिया रूपी प्रमुख हथियार चुनाव प्रचार और नैरेटिव बनाने में कारगर साबित हो रहे थे, वही अब पलटने लगे हैं या यूं कहें कि काम करने के बजाय उल्टा प्रभाव डालने लगे हैं। उस दौर में यानि कि 2014 में फेसबुक किंग था और अब 2026 में रील्स, शॉर्ट्स और इंस्टाग्राम, यूट्यूब शॉर्ट्स का राज है। यहां ध्यान कुछ सेकंड में तय होता है।
सत्ता-विरोधी कंटेंट, व्यंग्य और मीम्स यहां ज्यादा वायरल होते हैं क्योंकि गुस्सा सबसे ज्यादा ध्यान खींचता है। जिस पर आज की युवा पीढ़ी का ज्यादा कमांड है, जिसको हम gen-z कहते हैं। ये मिनटों में ही छोटे छोटे कंटेंट्स को वायरल कर किसी भी माहौल बदलने का माद्दा रखते हैं। बीजेपी के लिए जेन z ही नहीं अब विपक्षी दल भी सिरदर्द बनते जा रहे हैं, क्योंकि उन्होंने भी सोशल मीडिया का वह हथियार चलाना सीख लिया है।
मुख्य विपक्ष कांग्रेस, देश भर के तमाम क्षेत्रीय दल और इन्फ्लुएंसर्स अब उसी स्केल पर काम करने लगे हैं पहले जिस पर बीजेपी आइटी सेल काम करता था। सभी दलों के प्रमुख और बड़े नेता व कार्यकर्ता इंस्टाग्राम, फेसबुक और X आदि सोशल मीडिया माध्यमों पर ज्वलंत मुद्दे उठाने लगे हैं।
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AI डीपफेक और नियंत्रित व्हाट्सएप भी है बड़ी वजह
बेरोजगारी, महंगाई, पेपर लीक जैसे मुद्दों पर 15 सेकंड के वीडियो रातोंरात ट्रेंड करते हैं। इन चुनौतियों का एक प्रमुख कारण व्हाट्सएप और AI का दोधारी असर भी है।व्हाट्सएप कभी बीजेपी का सबसे मजबूत टूल था। अब इनमें कई तरह की समस्याएं आ गयी हैं। व्हाट्सएप मैसेज फॉरवर्ड पर “Forwarded many times” और कम्युनिटी नोट्स लगने लगे हैं। जिसकी वजह से फैक्ट-चेकिंग की दिक्कत होती है। AI डीपफेक भी बड़ी वजह है। 2024 और 2025 के चुनावों में AI से बने फर्जी वीडियो नेताओं के दोनों तरफ से आए। अब हर वायरल क्लिप पर शक किया जाता है, इसलिए भी भरोसा कम हुआ है।
एंटी-इनकंबेंसी के डिजिटल होने से भी बढ़ी दिक्कतें
एंटी-इनकंबेंसी फैक्टर भी डिजिटल माध्यमों पर छाने लगी है। ये भी बहुत ठोस वजह है। सत्ता में 10 साल से अधिक रहने के कारण जनता की नाराजगी सोशल मीडिया पर ही ज्यादा ही निकलने लगी है, क्योंकि सरकार जनता से सीधा संवाद स्थापित करने में विफल रही है। पहले जनता की नाराजगी को कार्यकर्ता दबा देता था पर अब एक छात्र, किसान, दुकानदार और मजदूर भी अपना वीडियो संदेश डालकर मिनटों में लाखों का व्यूज ले लेता है। ऐसे में सरकार के लिए हर छोटी घटना नेशनल नैरेटिव बन जाती है।
आईटी रूल्स व रेगुलेशन ने भी बढ़ाई परेशानी
आईटी के रूल्स व रेगुलेशन में किए गए बदलावों से पारदर्शिता का दबाव भी अब आड़े आने लगा है। IT Rules 2021 और 2023 के बाद प्लेटफॉर्म्स को राजनीतिक विज्ञापनों और फर्जी खबरों पर कार्रवाई करनी पड़ रही है। पेड प्रमोशन टैग, अकाउंट सस्पेंशन, और चुनाव आयोग की मॉनिटरिंग से पहले जैसा फ्री-व्हीलिंग कैंपेन मुश्किल होने लगा है।
इसके अलावा बीजेपी के सामने भाषा और लोकल कंटेंट भी चुनौती है। हिंदी-अंग्रेजी कंटेंट से आगे बढ़कर तमिल, मराठी, बंगाली रील्स में विपक्ष ज्यादा तेज हो गया है। सरकार के प्रति जेन-Z का अविश्वास इन सबमें सबसे बड़ी समस्या बन कर उभरी है, जो कि हाल ही में पेपर लीक को लेकर हुए प्रदर्शन में खूब देखने को मिला। हमारी नई पीढ़ी जो 18-25 साल के बीच हैं वो ट्रेडिशनल नैरेटिव से बोर हो चुके हैं। उन्हें अब डेटा, रोजगार और कल्चर के साथ विचारों की आजादी भी चाहिए।
इंटरनेट और सोशल मीडिया अब सबके लिए चुनौती
आधुनिक तकनीकि, इंटरनेट और सोशल मीडिया की चुनौती अब सिर्फ बीजेपी की नहीं बल्कि सभी दलों की है, लेकिन पिछले एक दशक से सत्ता में रहने के बाद इसका कोपभाजन ज्यादा भारतीय जनता पार्टी और उसके गठबंधन को ही होना पड़ेगा, इसलिए हम कह सकते हैं कि जिस हथियार के सहारे बीजेपी ने अपना ग्राफ बढ़ाया था अब वही हथियार उसके खिलाफ ज्यादा चलने लगे हैं।
चाहे वो पेपर लीक का मुद्दा हो या CAA अथवा SIR या फिर महंगाई, सभी मुद्दों पर क्या विपक्ष क्या जेन-Z सभी सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म के जरिए आक्रामक हो गए हैं? इंटरनेट की दुनियां अब किसी एक की नहीं रही। सोशल मीडिया और इंटरनेट एक ऐसा मंच है जहां फायदा और नुकसान लगभग बराबर है।
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