साल 2026 भारत के सांस्कृतिक इतिहास में एक गहरी छाप छोड़ने वाला वर्ष है। यही वह समय है जब सोमनाथ मंदिर पर हुए पहले ऐतिहासिक आक्रमण को पूरे हज़ार वर्ष पूरे हो रहे हैं। 1026 में हुआ वह हमला केवल पत्थरों और दीवारों पर नहीं था, बल्कि भारतीय चेतना और विश्वास को तोड़ने का प्रयास था। लेकिन समय ने साबित किया कि आस्था को न तो तलवार झुका सकती है और न ही विध्वंस मिटा सकता है।
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गुजरात के प्रभास पाटन में स्थित सोमनाथ केवल एक ज्योतिर्लिंग नहीं है, बल्कि यह भारत की उस सभ्यतागत शक्ति का प्रतीक है, जो हर बार टूटकर भी खुद को फिर से गढ़ लेती है। इतिहास गवाह है कि इस मंदिर को कई बार नष्ट किया गया, लेकिन हर युग में समाज ने इसे दोबारा खड़ा किया, पहले विश्वास से, फिर संकल्प से।
इस ऐतिहासिक अवसर पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सोमनाथ यात्रा केवल एक औपचारिक कार्यक्रम नहीं मानी जा रही, बल्कि इसे एक सांस्कृतिक और राष्ट्रीय संदेश के रूप में देखा जा रहा है। प्रधानमंत्री ने हाल के वक्त में अपने वक्तव्यों और लेखों के माध्यम से सोमनाथ को भारतीय सभ्यता की “अडिग आत्मा” बताया है, एक ऐसी आत्मा जो हार नहीं मानती, बल्कि हर आघात के बाद और सशक्त होकर खड़ी होती है।
आजादी के बाद 1951 में हुआ मंदिर का पुनर्निर्माण भी इसी निरंतरता की कड़ी था। यह सिर्फ़ एक धार्मिक ढांचा नहीं था, बल्कि एक नवस्वतंत्र राष्ट्र का आत्मसम्मान था, जिसे फिर से आकार दिया गया। सोमनाथ का आधुनिक स्वरूप उसी दौर की राष्ट्रीय चेतना का प्रतिबिंब है।
2026 में हज़ार वर्षों की यह स्मृति हमें यह याद दिलाती है कि भारत का इतिहास केवल आक्रमणों की सूची नहीं है, बल्कि पुनर्निर्माण, सहनशीलता और आत्मबल की यात्रा है। सोमनाथ आज भी समुद्र की लहरों के बीच खड़ा होकर यही कहता है, कि समय बदलता है, शासक बदलते हैं, लेकिन सभ्यता की जड़ें तब तक जीवित रहती हैं, जब तक लोगों का विश्वास जीवित रहता है।
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सोमनाथ की यह सहस्राब्दी केवल अतीत को देखने का अवसर नहीं, बल्कि भविष्य के लिए एक संदेश भी है, कि भारत की पहचान न तो कमजोर है और न ही क्षणिक। यह पहचान सदियों की परीक्षा में तपकर बनी है।