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काग़ज़ों की धर्मनिरपेक्षता बनाम बांग्लादेश की जमीनी हक़ीक़त

यह भी चिंता का विषय है कि हिंसा के बाद न्यायिक प्रक्रिया और प्रशासनिक प्रतिक्रिया अक्सर धीमी या अस्पष्ट रहती है। दोषियों के विरुद्ध त्वरित और निष्पक्ष....

By HO BUREAU 

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संविधान में दर्ज शब्द किसी राष्ट्र की आत्मा का दावा करते हैं, पर उस आत्मा की वास्तविक परीक्षा समाज के व्यवहार से होती है। बांग्लादेश स्वयं को एक धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र के रूप में प्रस्तुत करता है, किंतु हाल की घटनाएँ इस दावे और ज़मीनी सच्चाई के बीच बढ़ती खाई को उजागर करती हैं। धर्मनिरपेक्षता का अर्थ केवल सरकारी दस्तावेज़ों में समानता का उल्लेख नहीं, बल्कि सार्वजनिक जीवन में भय-मुक्त सहअस्तित्व की गारंटी है, जो आज बांग्लादेश में प्रश्नों के घेरे में है।

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हाल ही में सामने आई एक अत्यंत विचलित करने वाली घटना में, सार्वजनिक स्थान पर एक हिंदू व्यक्ति को भीड़ द्वारा पीटे जाने और अंततः मार दिए जाने की खबरें आईं। इस घटना का सबसे भयावह पक्ष केवल हिंसा नहीं था, बल्कि वह सामूहिक मौन था जिसने इसे संभव बनाया। आसपास खड़े लोगों ने हस्तक्षेप करने के बजाय अपने मोबाइल फ़ोन निकाले और दृश्य रिकॉर्ड करते रहे। किसी ने रोकने की कोशिश नहीं की, किसी ने आवाज़ नहीं उठाई। यह दृश्य बताता है कि असहिष्णुता केवल उग्र तत्वों तक सीमित नहीं, बल्कि सामाजिक उदासीनता के रूप में भी मौजूद है।

यदि कोई देश सचमुच धर्मनिरपेक्ष है, तो वहाँ अल्पसंख्यक की सुरक्षा स्वाभाविक होनी चाहिए। परंतु बार-बार सामने आने वाली ऐसी घटनाएँ यह संकेत देती हैं कि अल्पसंख्यकों के लिए सुरक्षा एक अपवाद बनती जा रही है, नियम नहीं। जब कानून का भय कमज़ोर पड़े और सामाजिक नैतिकता मौन साध ले, तब संविधान के शब्द खोखले प्रतीत होने लगते हैं।

यह भी चिंता का विषय है कि हिंसा के बाद न्यायिक प्रक्रिया और प्रशासनिक प्रतिक्रिया अक्सर धीमी या अस्पष्ट रहती है। दोषियों के विरुद्ध त्वरित और निष्पक्ष कार्रवाई न होने पर संदेश साफ़ होता है, हिंसा का दंड अनिश्चित है। यही अनिश्चितता आगे की घटनाओं को जन्म देती है। धर्मनिरपेक्षता तब तक जीवित नहीं रह सकती, जब तक राज्य अपने नागरिकों को उनकी आस्था के आधार पर अलग-अलग स्तर की सुरक्षा देता प्रतीत हो।

धर्मनिरपेक्षता केवल अल्पसंख्यकों का मुद्दा नहीं; यह बहुसंख्यक समाज की नैतिक ज़िम्मेदारी भी है। सार्वजनिक स्थानों पर होने वाली हिंसा के समय चुप्पी साध लेना, या उसे तमाशे की तरह रिकॉर्ड करना, सामाजिक पतन का संकेत है। एक स्वस्थ लोकतंत्र में नागरिक अन्याय के सामने खड़े होते हैं, न कि उसे वायरल सामग्री बना देते हैं।

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आज बांग्लादेश के सामने आत्ममंथन का क्षण है। काग़ज़ों पर लिखी धर्मनिरपेक्षता को जीवन में उतारने के लिए केवल घोषणाएँ पर्याप्त नहीं होंगी। इसके लिए मज़बूत कानून-व्यवस्था, निष्पक्ष न्याय, और सबसे बढ़कर सामाजिक साहस की आवश्यकता है, वह साहस जो अन्याय के क्षण में आवाज़ बनता है। जब तक यह साहस नहीं जागता, तब तक धर्मनिरपेक्षता का दावा दस्तावेज़ों तक सीमित रहेगा, और वास्तविक जीवन में उसकी अनुपस्थिति बार-बार उजागर होती रहेगी।

 

✍️सपन दास

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