ट्रंप युग की विदेश नीति और एक पुराना पैटर्न
डोनाल्ड ट्रंप के नेतृत्व में अमेरिका की विदेश नीति कई बार आक्रामक और टकरावपूर्ण रही है। वेनेज़ुएला इसका सबसे बड़ा उदाहरण बनकर उभरा, जहाँ राजनीतिक अस्थिरता के नाम पर दबाव, प्रतिबंध और सैन्य धमकियों की नीति अपनाई गई।
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आलोचकों का मानना है कि यह हस्तक्षेप लोकतंत्र के समर्थन से अधिक अमेरिका के रणनीतिक हितों से जुड़ा था।
डॉक्ट्रिन का नया इस्तेमाल, पुरानी सोच
ट्रंप प्रशासन ने मुनरो सिद्धांत को फिर से सामने लाकर यह संकेत दिया कि अमेरिका पश्चिमी गोलार्ध में अपना प्रभाव बनाए रखना चाहता है। लेकिन सवाल यह है कि क्या यह सुरक्षा की चिंता थी, या प्रभुत्व बनाए रखने की रणनीति?
वेनेज़ुएला जैसे देशों के लिए यह नीति बाहरी दख़ल और संप्रभुता पर सीधा प्रहार बनकर सामने आई।
आलोचना के प्रमुख बिंदु
वेनेज़ुएला के तेल भंडार हमेशा अमेरिकी हितों के केंद्र में रहे हैं।
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संवाद और अंतरराष्ट्रीय मंचों की बजाय प्रतिबंध और सैन्य भाषा को प्राथमिकता दी गई।
इन नीतियों का सबसे बड़ा असर आम नागरिकों पर पड़ा~ महंगाई, अस्थिरता और मानवीय संकट के रूप में।
अंतिम सवाल: शक्ति का प्रदर्शन या नैतिक विफलता?
अमेरिका और ट्रंप की वेनेज़ुएला नीति ने एक बड़ा सवाल खड़ा किया है—क्या वैश्विक नेतृत्व का मतलब सैन्य ताक़त दिखाना है, या संवाद और सहयोग से समाधान निकालना?
जब बड़े देश अपने हितों के लिए छोटे देशों की स्थिरता दांव पर लगाते हैं, तब अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था की नैतिकता पर सवाल उठना स्वाभाविक है।
यह बहस सिर्फ़ अमेरिका या वेनेज़ुएला तक सीमित नहीं, यह पूरी दुनिया के लिए चेतावनी है कि सत्ता जब स्वार्थ से जुड़ती है, तो उसके परिणाम सीमाओं से परे जाते हैं।