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केजरीवाल का कोर्ट बहिष्कार, गांधीवादी सत्याग्रह का ऐलान

By HO BUREAU 

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नई दिल्ली: आम आदमी पार्टी (AAP) के राष्ट्रीय संयोजक Arvind Kejriwal ने एक अहम कानूनी मामले में बड़ा कदम उठाते हुए न्यायमूर्ति Justice Swarnakanta Sharma की अदालत में चल रही कार्यवाही का बहिष्कार करने का फैसला किया है। केजरीवाल ने अपने इस निर्णय को ‘गांधीवादी सत्याग्रह’ की भावना से प्रेरित बताया और कहा कि उन्हें इस बेंच से निष्पक्ष न्याय की उम्मीद नहीं है।

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केजरीवाल ने अपने बयान में कहा कि लोकतंत्र में न्यायपालिका की भूमिका सर्वोपरि होती है, लेकिन जब किसी पक्ष को निष्पक्ष सुनवाई का भरोसा नहीं रह जाता, तब विरोध दर्ज कराना उसका अधिकार बन जाता है। उन्होंने कहा, “मैं अदालत का सम्मान करता हूं, लेकिन इस विशेष बेंच के समक्ष मुझे न्याय मिलने की उम्मीद नहीं दिखती। ऐसे में मैं गांधीवादी तरीके से सत्याग्रह कर रहा हूं।”

यह मामला पहले से ही राजनीतिक और कानूनी हलकों में चर्चा का विषय बना हुआ है। केजरीवाल के इस फैसले ने न केवल कानूनी प्रक्रिया पर सवाल खड़े किए हैं, बल्कि न्यायपालिका और कार्यपालिका के बीच संबंधों को लेकर भी नई बहस छेड़ दी है। AAP नेताओं का कहना है कि यह कदम मजबूरी में उठाया गया है और इसका उद्देश्य न्यायिक प्रक्रिया को प्रभावित करना नहीं, बल्कि निष्पक्षता की मांग करना है।

वहीं, विपक्षी दलों ने इस फैसले की कड़ी आलोचना की है। उनका कहना है कि अदालत की कार्यवाही का बहिष्कार करना न्याय व्यवस्था का अपमान है और इससे गलत परंपरा स्थापित हो सकती है। कुछ कानूनी विशेषज्ञों का भी मानना है कि यदि किसी पक्ष को अदालत पर आपत्ति है, तो उसके लिए उच्च न्यायालय में अपील या न्यायाधीश बदलने की मांग जैसे वैधानिक विकल्प मौजूद होते हैं, न कि कार्यवाही का बहिष्कार।

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विशेषज्ञों के अनुसार, ‘Gandhian Satyagraha’ मूल रूप से अन्याय के खिलाफ अहिंसक प्रतिरोध का प्रतीक है, जिसका प्रयोग स्वतंत्रता संग्राम के दौरान Mahatma Gandhi ने किया था। हालांकि, आधुनिक न्यायिक संदर्भ में इसका उपयोग कितना उपयुक्त है, इस पर मतभेद देखने को मिल रहे हैं।

इस घटनाक्रम का असर आने वाले दिनों में अदालत की कार्यवाही और राजनीतिक माहौल दोनों पर पड़ सकता है। यदि केजरीवाल अपने रुख पर कायम रहते हैं, तो यह मामला उच्च न्यायालय या सुप्रीम कोर्ट तक भी जा सकता है। साथ ही, यह देखना दिलचस्प होगा कि अदालत इस बहिष्कार को किस रूप में लेती है और आगे की प्रक्रिया कैसे तय होती है।

फिलहाल, यह मुद्दा न्यायिक पारदर्शिता, राजनीतिक जवाबदेही और लोकतांत्रिक मूल्यों के बीच संतुलन की एक महत्वपूर्ण परीक्षा बनकर उभरा है। आने वाले समय में इसके व्यापक प्रभाव देखने को मिल सकते हैं।

सपन दास 

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