पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने अपने सबसे हालिया विवाद को सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा दिया है और इस बार मामला मतदाता सूची (Special Intensive Revision – SIR) से जुड़ा है। 3 फ़रवरी 2026 को उन्होंने भारत के सर्वोच्च न्यायालय में चुनौतियाँ पेश कीं
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पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने अपने सबसे हालिया विवाद को सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा दिया है, और इस बार मामला मतदाता सूची (Special Intensive Revision – SIR) से जुड़ा है। 3 फ़रवरी 2026 को उन्होंने भारत के सर्वोच्च न्यायालय में चुनौतियाँ पेश कीं, जिसमें उन्होंने चुनाव आयोग और SIR प्रक्रिया पर आरोप लगाया कि यह राजनीतिक उत्पीड़न और मतदाता अधिकारों के हनन का उपकरण बन रहा है।
खुद मुख्यमंत्री ने कोर्ट में अपनी दलीलें पेश कीं, यह कहते हुए कि वोटर-लिस्ट संशोधन के तहत ज़िंदा मतदाताओं को ‘मृत’ दिखाया जा रहा है और यह आम नागरिकों के मौलिक अधिकारों को प्रभावित कर रहा है।
विशेष गहन मतदाता सूची संशोधन (SIR) वह प्रक्रिया है जिसमें चुनाव आयोग मतदान अधिकार वाले लोगों की सूची को नए सिरे से अपडेट कर रहा है। ममता का आरोप है कि इस प्रक्रिया में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के आधार पर पुराने डेटा को अनदेखा कर दिया जा रहा है, और बिना उचित सूचनाओं लोगों को अपनी पहचान दोबारा साबित करने के लिए कहा जा रहा है, जिससे लाखों मतदाताओं को त्रासदी का सामना करना पड़ रहा है।
उन्होंने यह भी दावा किया है कि इसी SIR प्रक्रिया के कारण 77 से ज़्यादा मौतें, 4 आत्महत्या के प्रयास और दर्जनों अस्पताल में भर्ती मामले सामने आए हैं — जिससे यह शामिल मतदाताओं के अधिकारों का मसला केवल तकनीकी नहीं, बल्कि मानवीय दहलाता मुद्दा है।
हाल में हुई सुनवाई में ममता बनर्जी खुद अदालत में मौजूद रहीं, खास बात यह है कि वे स्वयं पेशी देकर अपनी दलीलें दे रही हैं। उन्होंने SIR विवाद को न्यायालय के समक्ष न्याय का मुद्दा बताया और कहा कि मतदान सूची की गड़बड़ियों को ठीक किए बिना चुनावों में निष्पक्षता नहीं आ सकती।
दूसरी ओर, चुनाव आयोग और अन्य पक्ष ने कहा कि SIR प्रक्रिया मतदाता सूची को साफ़, अपडेट और न्यायपूर्ण बनाने का कानूनी प्रावधान है, और विवाद को राजनीतिक एजेण्डा के रूप में पेश नहीं किया जाना चाहिए।
कानूनी टकराव और तीसरी पार्टी की याचिका
8 फ़रवरी 2026 को एक तीसरी पार्टी (अखिल भारत हिंदू महासभा के नेता) ने सुप्रीम कोर्ट में आवेदन दायर किया कि ममता बनर्जी की व्यक्तिगत रूप से पेशी “कानूनी रूप से अनुचित” है, यह तर्क देते हुए कि मामला पहले से ही उनके वकीलों द्वारा प्रतिनिधित्व योग्य है। इससे कोर्ट में बहस और जटिल हो गई है कि एक sitting मुख्यमंत्री को खुद पेश होने की अनुमति होनी चाहिए या नहीं।
सिर्फ SIR ही नहीं — ममता लंबे समय से एन्फोर्समेंट निदेशालय (ED) के साथ संघर्ष में भी हैं। जनवरी 2026 में ED ने उनके सहयोगी संगठन I-PAC के कार्यालयों पर छापे डाले, और कोर्ट में इस पर भी बहस चल रही है कि क्या ED की कार्रवाई ने क़ानूनी सीमा लांघ दी। सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में कुछ निर्देश भी जारी किए हैं।
यह लड़ाई सिर्फ़ कोर्ट तक सीमित नहीं है , यह 2026 बंगाल विधानसभा चुनाव से सीधे जुड़ा हुआ है। SIR के मुद्दे को लेकर ममता ने चुनाव आयोग पर एनआरसी/हक़ हनन की साजिश तक आरोप लगाए हैं, जिससे यह मामला राजनीतिक और वैधानिक दोनों स्तरों पर उभर रहा है।
राजनीतिक समीक्षकों के अनुसार यह कदम ममता की फ़ाइटर इमेज को भी मजबूत करता है, क्योंकि वे इसे केंद्र पर कंट्रोल की कोशिश के रूप में पेश कर रही हैं।
अब तक (9 फरवरी 2026 तक) सुप्रीम कोर्ट ने कोई अंतिम फ़ैसला जारी नहीं किया है, लेकिन अनुमान यह है कि:
कोर्ट में चल रही बहस के अंदाज़ से यह स्पष्ट है कि निष्कर्ष राजनीतिक दबाव या जनता की धारणा से ज्यादा, संविधान और प्रक्रिया के आधार पर आएगा। कोई टाइमलाइन अभी घोषित नहीं हुई है, और अगली सुनवाई अभी तय होनी है।
ममता बनर्जी की यह कानूनी लड़ाई केवल एक राजनीतिक ब्लफ़ नहीं है — यह भारत के चुनावी तंत्र, मतदाता अधिकार, और संवैधानिक प्रक्रिया पर आधारित एक बड़ा परीक्षण है।
अब तक कोई अंतिम फ़ैसला 9 फ़रवरी 2026 तक जारी नहीं हुआ, लेकिन बहस की गूँज भविष्य की राजनीति और विधिक प्रक्रिया दोनों को प्रभावित करेगी।