प्रिय छात्रो…
अगर आज पढ़ाई में मन नहीं लग रहा तो एक बात हमेशा याद रखना। तुम्हें पढ़ाई छोड़ने और पढ़ाई से ब्रेक लेने का विकल्प चुनना चाहिए, ज़िंदगी छोड़ने का नहीं। SSC, UPSC नहीं करनी, मत करो। डॉक्टर, इंजीनियर, अफसर नहीं बनना, मत बनो, लेकिन जीवन का अंत मत करो। आज स्वरोज़गार करने वाला या उद्यमी भी सम्मान और संतुष्टि के साथ जीवन जीता है। Skills अब Degree से बड़ी अर्थव्यवस्था बन चुकी है।
पढ़ें :- नए पिक्सल 11 सीरीज के साथ भारत पर बड़ा दांव लगा रहा गूगल, स्थानीय विनिर्माण और AI पर बढ़ा फोकस
प्रिय माता-पिता…अगर आपका बच्चा कहे “मुझसे नहीं होगा” तो उसे Motivational Speech मत दीजिए। उसका स्कूल या कोचिंग मत बदलिए। दूसरे बच्चों से तुलना मत करिए…बस उसे गले लगा लीजिए,क्योंकि…..कई बार बच्चे पढ़ाई से नहीं, अकेलेपन और उम्मीदों के बोझ से हारते हैं। याद रखिए आपके बच्चे का Report Card उसकी Heart beat से कभी बड़ा नहीं हो सकता।अब सबसे कठिन सवाल, क्या हमारी प्रतियोगी परीक्षा व्यवस्था…युवाओं के प्रति संवेदनहीन हो चुकी है ?
लाखों फॉर्म, सालों का इंतज़ार, अधूरी भर्तियाँ, पेपर विवाद, अनिश्चित भविष्य और जब कोई बच्चा हार जाए तो दो मिनट का मौन, क्या बस इतना ही ? कड़वा है, लेकिन सच तो यही है….इस सिस्टम को आपकी तैयारी की परवाह है, आपकी ज़िंदगी की नहीं, अगर होती तो मानसिक स्वास्थ्य भी परीक्षा प्रणाली का हिस्सा होता।
अगर होती तो वर्षों तक भर्तियाँ अधर में नहीं लटकतीं। अगर होती तो हर असफल उम्मीदवार खुद को असफल इंसान महसूस नहीं करता।आज हमें बच्चों को यह जरूर सिखाना होगा कि परीक्षा में Fail होना और जीवन में Fail होना दो अलग बातें हैं। हर बच्चा Collector या Officer नहीं बनेगा, लेकिन हर बच्चा सम्मान के साथ जी सकता है अगर समाज उसे जीने दे।
प्रिय प्रियांश… काश किसी ने तुमसे कहा होता घर वापस आ जाओ बेटा, सरकारी नौकरी नहीं मिली तो क्या हुआ, हमें तुम्हारी नौकरी से नहीं, तुमसे प्यार है तो शायद आज वह जिंदा होता। अगर इस देश को सच में अपने युवाओं से प्यार है तो Coaching Institutes से ज़्यादा Courage Institutes बनाने होंगे।
जहाँ बच्चों को सिर्फ़ परीक्षा पास करना नहीं, ज़िंदगी जीना भी सिखाया जाए। क्योंकि सरकारी नौकरी शायद जीवन को सफल बना सकती है, लेकिन ज़िंदा रहना ही जीवन को संभव बनाता है। याद रखिए जिस व्यवस्था में बच्चे सपनों से पहले अपनी ज़िंदगी हारने लगें, समस्या बच्चों में नहीं, व्यवस्था में होती है।
Disclaimer
इस लेख में व्यक्त सभी विचार, मत एवं विश्लेषण मूल लेखक के हैं। इन्हें केवल वेब पोर्टल पर प्रकाशन हेतु संपादित एवं व्यवस्थित किया गया है। मूल भाव, आशय एवं तथ्यों में कोई परिवर्तन नहीं किया गया है। इस लेख में व्यक्त विचारों, मतों अथवा उनसे उत्पन्न होने वाले किसी भी प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष परिणाम के लिए वेब पोर्टल अथवा उसके प्रकाशक किसी भी प्रकार से उत्तरदायी नहीं होंगे।
देश और दुनिया की बाकी खबरों के लिए हमें फेसबुक, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फॉलो करें।