यूपी में नवंबर 2026 में 10 राज्यसभा सीटों का चुनाव होना है। बीजेपी और सपा की सीटों का गणित मजबूत, जबकि बसपा के सामने संसद से पूरी तरह बाहर होने का संकट। ✍️ अनिल शाही
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आगामी नवंबर माह में यूपी की 10 राज्यसभा सीटों के लिए चुनाव होना है। इन दस सीटों की गणित अगले एक दशक के लिए यूपी की राजनीति की दिशा तय करेगी। उत्तर प्रदेश के जिन राज्यसभा सांसदों का कार्यकाल 25 नवंबर 2026 को खत्म हो रहा है उनमें भाजपा के आठ, समाजवादी और बहुजन समाज पार्टी के एक-एक सदस्य हैं। इन सांसदों में भारतीय जनता पार्टी के हरदीप सिंह पुरी, अरुण सिंह, नीरज शेखर, सीमा द्विवेदी, गीता शाक्य/चंद्रप्रभा, बृजलाल, डॉ दिनेश शर्मा और बीएल वर्मा हैं जबकि समाजवादी पार्टी से प्रोफेसर रामगोपाल यादव और बसपा के रामजी गौतम शामिल हैं। सदन में संख्या बल के हिसाब से बीजेपी और सपा तो अपनी सीटें बरकरार रखने में कामयाब हो जाएगी लेकिन सबसे बड़ा संकट बीएसपी के सामने होगा वो होगा यूपी से किसी भी सदन में प्रतिनिधित्व शून्य होने का!
राज्यसभा सांसदों के चुनाव का अंकगणित बिल्कुल साफ है। एक राज्यसभा सीट जीतने के लिए करीब 37 विधायकों का समर्थन चाहिए। विधानसभा में भाजपा गठबंधन के पास 287 (255 बीजेपी, 12 अपना दल, 8 आरएलडी, 6 निषाद पार्टी, 6 सुभासपा) और सपा के पास 111 सदस्य हैं। जबकि कांग्रेस और जनसत्ता दल लोकतांत्रिक के 2-2 सदस्य हैं। बीएसपी विधायक उमाशंकर सिंह की हाल ही में हुई मौत के बाद एक सीट रिक्त है। उनकी मौत के बाद बहुजन समाज पार्टी यूपी के दोनों सदनों में शून्य हो गई है। संख्या बल के हिसाब से भाजपा सात से आठ सीटें आराम से निकाल सकती है। और सपा को दो सीटें मिलना तय माना जा रहा है। इस गणित में सबसे बड़ी खबर बसपा के लिए है और कांग्रेस तो यूपी में अभी भी जमीन तलाशने में जुटी है। बता दें कि बसपा का लोकसभा में पहले से ही खाता शून्य है और यूपी विधानसभा में उसके पास जो एक विधायक थे उनकी मौत के बाद विधानसभा में भी बीएसपी शून्य हो गई है। राज्यसभा से रामजी गौतम के रिटायर होते ही 1989 के बाद पहली बार ऐसा होगा जब संसद के दोनों सदनों में बसपा का कोई प्रतिनिधि नहीं होगा, यानी 36 साल बाद पार्टी संसद से पूरी तरह बाहर हो जाएगी। कांग्रेस की स्थिति भी यूपी में ऐसी नहीं कि वह अपने दम पर कोई सीट निकाल सके, इसलिए उसकी भी इस चुनाव में कोई सीट नहीं बनती दिख रही।
अब बात उन चेहरों की जिनको लेकर चर्चा का बाजार गर्म है। माना जा रहा है कि प्रोफेसर रामगोपाल यादव का सपा से राज्यसभा जाना तय है, लेकिन अगर पार्टी उन्हें मौका नहीं देती तो यह यादव परिवार के अंदर और बाहर दोनों जगह बड़ा संदेश होगा। राजनीतिक गलियारे में इसकी काफी चर्चा है। भाजपा के अंदर कल्याण सिंह के पुत्र पूर्व सांसद राजवीर सिंह राजू को राज्यसभा में लाने का दबाव लगातार बढ़ रहा है। इसका सबसे बड़ा कारण है लोध वोट बैंक। बीजेपी के उत्थान में खुद के व्यक्तित्व और संघर्ष के बल पर देश और पार्टी के भीतर बड़ा कद हासिल करने वाले उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री और राज्यपाल रहे स्वर्गीय कल्याण सिंह की विरासत को साधने के लिए भाजपा राजबीर सिंह के नाम पर गंभीरता से विचार कर रही है। इससे विरासत के साथ बड़े लोध वोट बैंक को सहेजने में बीजेपी के लिए बहुत आसानी होगी।
समाजवादी पार्टी की रणनीति सामाजिक समीकरण के इर्द-गिर्द ही घूमती दिख रही है। पार्टी के रणनीतिकार एक सीट पर मुस्लिम चेहरे को लाने और दूसरी सीट पर क्षत्रिय समाज से किसी प्रभावशाली व्यक्ति को सदन में भेजने की तैयारी कर रहे हैं। हालांकि पार्टी में इस पर अभी अंतिम सहमति नहीं बनी है और संशय बरकरार है। कुल मिलाकर नवंबर 2026 में होने वाले इस चुनाव में एक तरफ जहां भाजपा के लिए अपनी संख्या को 103 से आगे ले जाने का मौका है वहीं दूसरी तरफ सपा के लिए अपनी दो सीटें बचाकर विपक्ष में अपनी मौजूदगी बनाए रखने की लड़ाई है और बसपा के लिए अपना अस्तित्व बचाने की सबसे बड़ी चुनौती है।
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✍️ अनिल शाही
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