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प्याज की तरह अब चीनी तो नहीं बनेगी सत्ता परिवर्तन की वजह

भारतीय राजनीति में प्याज को सत्ता परिवर्तन का प्रतीक माना जाता रहा है। अब चीनी इसका सबसे बड़ा कारक बनने की ओर अग्रसर है।✍️Anil Shahi

By HO BUREAU 

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Sugar : भारतीय राजनीति में प्याज को सत्ता परिवर्तन का प्रतीक माना जाता रहा है। अब चीनी इसका सबसे बड़ा कारक बनने की ओर अग्रसर है। वर्ष 1980 में प्याज की कीमत 6 रुपये किलो गई थी। तब इंदिरा गांधी ने प्याज की माला पहनकर प्रचार किया और जनता पार्टी की सरकार को महंगाई पर घेरा। जिसकी वजह से चुनाव परिणाम उनके पक्ष में गया।

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ये अलग बात है कि चुनाव परिणाम आने के सप्ताह भर के भीतर ही प्याज के दाम खुद ही धड़ाम से गिर गए थे। साल 1998 में दिवाली से पहले दिल्ली में प्याज की कीमतों में भारी उछाल आया। उस समय प्याज 90 रुपये किलो तक बिके। दिल्ली के तत्कालीन मुख्यमंत्री साहिब सिंह वर्मा का ये बयान ‘गरीब प्याज कहां खाते हैं’ विवाद का विषय बना और चुनाव से ठीक 40 दिन पहले सुषमा स्वराज को मुख्यमंत्री बनाया गया, फिर भी भाजपा को दिल्ली में हार मिली।

उसी साल राजस्थान में भैरों सिंह शेखावत की सरकार भी प्याज की महंगाई के कारण सत्ता से बाहर चली गयी थी। उस समय उनका ये बयान काफी चर्चित हुआ था ‘हमारे पीछे तो प्याज लगी थी’। अब 2026 में चीनी की बढ़ती कीमत सत्ता के लिए सबब बनती जा रही है।

अस्सी और नब्बे के दशक में जो सवाल प्याज की मंहगाई को लेकर उठे थे अब 2026 में वही सवाल चीनी को लेकर उठने लगा है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार खुदरा चीनी 20 जुलाई को 48.18 रुपये थी, जो बढ़कर 20 अगस्त को 55.70 रुपये प्रति किलो हो गई। लेकिन इसके परे बाजार में आम उपभोक्ताओं को चीनी 70 रूपए तक बेची जा रही रही है।

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यानि कि एक महीने में 10 से 20 प्रतिशत की बढ़ोतरी है। उत्पादन 343 लाख टन के अनुमान से घटकर 306 लाख टन रह गया है। देश का चीनी स्टॉक 9 साल के सबसे निचले स्तर पर बताया जा रहा है। इसी कारण सरकार ने लगभग एक दशक बाद 10 लाख टन कच्ची चीनी के ड्यूटी-फ्री आयात की अनुमति दी है और 1 सितंबर से 30 नवंबर तक बड़े व्यापारियों और बिस्किट, मिठाई, कोल्ड ड्रिंक बनाने वाले बल्क उपभोक्ताओं के लिए स्टॉक लिमिट 15 दिन कर दिया गया है।

‘इथेनॉल नीति इसका कारण नहीं…’

सरकार का कहना है कि कीमत बढ़ने के पीछे त्योहारों से पहले मांग, वैश्विक सप्लाई में कमी, अंतरराष्ट्रीय कीमत 474 से 552 डॉलर प्रति टन होना और जमाखोरी है, इथेनॉल नीति इसका कारण नहीं है। विपक्ष का आरोप है कि पहले चीनी और गन्ने को इथेनॉल में डायवर्ट किया गया, निर्यात किया गया और अब उसी विदेशी मुद्रा से चीनी आयात करनी पड़ रही है।

चीनी और प्याज में थोड़ा सा अंतर है। प्याज रोज की खरीद में शामिल है जबकि चीनी महीने दो महीने में भी खरीद कर काम चलाया जा सकता है। प्याज जल्दी खराब हो जाता है इसलिए उसका गुस्सा तुरंत वोट में बदलता है।

जबकि चीनी के मामले में ऐसा नहीं है। सरकार उसे एमएसपी, स्टॉक लिमिट और आयात-निर्यात से ज्यादा नियंत्रित कर सकती है। गन्ना किसानों का संगठित वोट बैंक है। इसलिए चीनी अकेले प्याज की तरह तुरंत सत्ता पलटने में कारगर नहीं होगी। हां मगर त्योहारी सीजन में चीनी के साथ में आटा, चावल, तेल की कीमतें बढ़ती रहीं तो महंगाई की मार से त्रस्त जनता सत्ता परिवर्तन का सबसे बड़ा कारण बन सकती है।

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इस लेख में व्यक्त सभी विचार, मत एवं विश्लेषण मूल लेखक के हैं। इन्हें केवल वेब पोर्टल पर प्रकाशन हेतु संपादित एवं व्यवस्थित किया गया है। मूल भाव, आशय एवं तथ्यों में कोई परिवर्तन नहीं किया गया है। इस लेख में व्यक्त विचारों, मतों अथवा उनसे उत्पन्न होने वाले किसी भी प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष परिणाम के लिए वेब पोर्टल अथवा उसके प्रकाशक किसी भी प्रकार से उत्तरदायी नहीं होंगे।

✍️Anil Shahi

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