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‘स्कूल यूनिफॉर्म अनुशासन, बच्चों के बीच समानता…’, स्कूल में हिजाब पहनने की मांग पर बोला हाईकोर्ट, याचिका खारिज

High Court : इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अपने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्कूल में हिजाब पहनने की मांग को लेकर दाखिल नाबालिग मुस्लिम छात्रा सुकैना रिजवी की याचिका खारिज कर दी है।✍️शोएब रिज़वी

By HO BUREAU 

Updated Date

High Court : इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अपने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्कूल में हिजाब पहनने की मांग को लेकर दाखिल नाबालिग मुस्लिम छात्रा सुकैना रिजवी की याचिका खारिज कर दी है। प्रयागराज के अतरसुइया स्थित टैगोर पब्लिक स्कूल की छात्रा है। याची ने स्कूल की तय ड्रेस कोड के साथ अतिरिक्त रूप से स्कार्फ यानी हिजाब पहनकर कक्षा में बैठने की अनुमति मांगी थी। जस्टिस जे.जे. मुनीर और जस्टिस इंद्रजीत शुक्ला की डिवीजन बेंच ने दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद याचिका खारिज कर दी है।

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याचिकाकर्ता छात्रा सुकैना रिजवी ने हाईस्कूल यानी कक्षा-10 की परीक्षा टैगोर पब्लिक स्कूल से पास किया था और कक्षा-11 में प्रवेश लेना चाहती थी। उसका कहना था कि वह कक्षा-6 से ही स्कूल यूनिफॉर्म के साथ सिर पर स्कार्फ पहनकर आती रही है और इस पर कभी कोई आपत्ति नहीं जताई गई। इसके समर्थन में उसने आईडी कार्ड और कक्षा 8, 9 व 10 की ग्रुप फोटोग्राफ्स भी अदालत में पेश की, लेकिन कक्षा-11 में दाखिले के समय स्कूल प्रबंधन ने कहा कि स्कार्फ पहनकर आना ड्रेस कोड का उल्लंघन है, इसलिए उसे प्रवेश नहीं दिया जा सकता है।

छात्रा ने इसके खिलाफ डीएम प्रयागराज को दो शिकायती पत्र 14 मई और 10 जून 2026 को दिए डीएम ने ज़िला विद्यालय निरीक्षक से रिपोर्ट मांगी। जिस पर सहायक डीआईओएस ने दोनों पक्षों को बुलाकर सुनवाई की। जिसमें स्कूल की प्रधानाचार्या ने स्पष्ट किया कि स्कूल एक सह-शिक्षा संस्था है। जहां सभी समुदायों के बच्चे पढ़ते हैं और सभी के लिए एक समान ड्रेस कोड लागू है। उन्होंने कहा कि किसी एक छात्रा को विशेष छूट देने से स्कूल की व्यवस्था प्रभावित हो सकती है।

“यूनिफॉर्म तय करना स्कूल प्रशासन की नीति का विषय”

छात्रा के वकील ने अदालत में तर्क दिया कि स्कार्फ पहनना संविधान के अनुच्छेद 19(1)(ए) के तहत अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का हिस्सा है और यह उसकी गरिमा व शारीरिक स्वायत्तता से भी जुड़ा है। यह भी कहा गया कि स्कार्फ पहनना उसके धार्मिक आचरण का हिस्सा है। और इससे रोकना अनुच्छेद 14 व 19(1)(ए) के तहत मिले मौलिक अधिकारों का उल्लंघन है।

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वहीं याचिका पर राज्य सरकार और CBSE की ओर से पेश वकील ने कहा कि स्कूल एक निजी गैर-सहायता प्राप्त संस्था है। जो राज्य के प्रत्यक्ष नियंत्रण के अधीन नहीं आती है। यूनिफॉर्म तय करना स्कूल प्रशासन की नीति का विषय है। जिसका मकसद छात्रों के बीच एकरूपता बनाए रखना है। इसमें धार्मिक स्वतंत्रता के मौलिक अधिकार का कोई उल्लंघन नहीं है।

हाईकोर्ट ने कहा कि जब तक कोई ड्रेस कोड एक समान (यूनिफॉर्म), नेक नीयती से बना, गैर- भेदभावपूर्ण हो और अनुशासन व संस्थागत पहचान बनाए रखने के उद्देश्य से हो, तब तक तय यूनिफॉर्म का निर्धारण मुख्यतः स्कूल के अधिकार क्षेत्र में आता है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि छात्रा भले ही निचली कक्षाओं में बिना रोक-टोक के स्कार्फ पहनती रही हो, लेकिन इससे उसे यह स्थायी या प्रवर्तनीय अधिकार नहीं मिल जाता कि स्कूल अपनी यूनिफॉर्म नीति में बदलाव करने के लिए बाध्य हो।

कोर्ट ने कहा कि पहले आपत्ति न जताया जाना ढिलाई, लापरवाही, इच्छाशक्ति की कमी या शालीनता के कारण भी हो सकता है, लेकिन इससे विबंध यानी रोक का सिद्धांत लागू नहीं होता, जब स्कूल बाद में अपना नियम सख्ती से लागू करे।

अदालत ने यह भी कहा कि स्कूल यूनिफॉर्म अनुशासन, बच्चों के बीच समानता, संस्थागत पहचान और धर्म-निरपेक्ष माहौल को बढ़ावा देता है। क्योंकि यह सभी धर्मों के छात्रों पर समान रूप से लागू होता है। हाईकोर्ट ने कहा था कि स्कूल का ड्रेस कोड तय करना पूरी तरह उचित है और इसमें बदलाव की मांग करने वालों की सोच में बदलाव होना चाहिए।

‘उसी धार्मिक समुदाय की अन्य छात्राएं स्कार्फ नहीं पहनती दिखीं…’

हाईकोर्ट ने कहा कि याचिकाकर्ता ने सिर्फ यह दावा किया कि वह बचपन से स्कार्फ पहनती आई है, लेकिन यह साबित करने के लिए कोई धार्मिक ग्रंथ या सामग्री पेश नहीं की गई कि स्कार्फ पहनना उसके धर्म का अनिवार्य हिस्सा है। जिसके बिना उसकी आस्था प्रभावित होती हो। कोर्ट ने यह भी नोट किया कि तस्वीरों में याचिकाकर्ता को छोड़कर उसी धार्मिक समुदाय की अन्य छात्राएं स्कार्फ नहीं पहनती दिखीं।

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कोर्ट ने स्पष्ट किया कि स्कूल छात्रा की आस्था की स्वतंत्रता में कोई कटौती नहीं कर रहा है। बल्कि केवल संस्थागत अनुशासन की मांग कर रहा है। जिसका यूनिफॉर्म एक अनिवार्य हिस्सा है। अगर व्यक्तिगत छात्रों को अपनी मर्ज़ी से यूनिफॉर्म में बदलाव की छूट दी जाने लगे तो इससे यूनिफॉर्म की अवधारणा ही खत्म हो जाएगी,वहीं याचिकाकर्ता के अधिवक्ताओं ने कहा है कि वह हाईकोर्ट के फैसले का सम्मान करते हैं। फिलहाल हाईकोर्ट के फैसले का अध्ययन कर रहे हैं।

बच्ची के परिवार से सलाह मशविरे के बाद इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में भी चुनौती दे सकते हैं। वहीं याचिका दाखिल करने वाली छात्रा
ने 11वीं क्लास में एडमिशन ले लिया है। वह कोर्ट के आदेश का पालन करेगी और स्कूल द्वारा निर्धारित ड्रेस कोड में ही स्कूल पढ़ने जाएगी।

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✍️शोएब रिज़वी

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