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देस में दस लाख जनसंख्या पर मात्र 15 जज: न्याय व्यवस्था पर गंभीर संकट

भारत की न्यायिक व्यवस्था को लेकर 2025 इंडिया जस्टिस रिपोर्ट ने एक चौंकाने वाला खुलासा किया है: देश में हर 10 लाख (1 मिलियन) नागरिकों पर केवल 15 जज हैं, जो कि अनुमोदित मानक से बेहद कम है। कानून आयोग ने 1987 में सुझाया था कि हर दस लाख आबादी पर कम से कम 50 न्यायाधीश होने चाहिए

By HO BUREAU 

Updated Date

आंकड़ा नहीं, न्याय का अलार्म

भारत की न्यायिक व्यवस्था को लेकर 2025 इंडिया जस्टिस रिपोर्ट ने एक चौंकाने वाला खुलासा किया है: देश में हर 10 लाख (1 मिलियन) नागरिकों पर केवल 15 जज हैं, जो कि अनुमोदित मानक से बेहद कम है। कानून आयोग ने 1987 में सुझाया था कि हर दस लाख आबादी पर कम से कम 50 न्यायाधीश होने चाहिए, लेकिन वास्तविकता इससे काफी दूर है।

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21,285 जज प्रति पूरे देश में सक्रिय हैं और जब इनका अनुपात जनसंख्या के साथ जोड़ा जाता है, तो यह केवल 15 जज प्रति 10 लाख लोग बनता है, यह न्याय के तक़ाज़े से बहुत कम है।

न्यायिक बोझ: संख्या कम, काम भारी

  • केस बैकलॉग और लम्बित मामलों की समस्या उस कमी का सीधा नतीजा है।
  • जिला अदालतों में एक जज के पास औसतन 2,200 से ज़्यादा मामले हैं।
  • कुछ हाई कोर्ट जैसे इलाहाबाद और मध्य प्रदेश में एक जज पर लगभग 15,000 मामले लंबित हैं।

देश के न्यायदिक विभाग के ब्रेडथा को देखते हुए — जहां लोग वर्षों तक इंसाफ़ का इंतज़ार करते हैं, जजों की इतनी कम संख्या सिर्फ एक समस्या का बिंदु नहीं, बल्कि समग्र प्रणाली की गंभीर बीमारी है।

 

सिफ़ारिश बनाम वास्तविकता

1987 के लॉ कमीशन ने कहा था कि प्रति दस लाख लोग पर कम से कम 50 न्यायाधीश होने चाहिए। लेकिन आज हम केवल 15 के स्तर पर हैं, यानी ज़रूरत से लगभग तीन गुना कम।

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यह अंतर:

  • मामलों के लंबित रहने का कारण
  • न्याय में देरी और समय-बद्ध निर्णय में बाधा
  • जीवन की प्रतिस्पर्धा एवं रोजगार विवादों में न्यायिक निष्पादन की धीमी प्रक्रिया

जैसे बड़े मुद्दों को जन्म देता है।

 

विविध सामाजिक चुनौतियाँ और प्रतिनिधित्व की कमी

रिपोर्ट में यह भी सामने आया कि सिर्फ़ जजों की संख्या कम होना ही समस्या नहीं है, न्यायपालिका के सामाजिक प्रतिनिधित्व में भी भारी कमी है।

  • जिला न्यायालयों में महिला जजों का हिस्सा अब 38% तक पहुंचा, लेकिन उच्च न्यायालयों में यह केवल 14% है।
  • अनुसूचित जनजातियों (ST) के जज सिर्फ़ 5% हैं और अनुसूचित जातियों (SC) सिर्फ़ 14% यह प्रतिनिधित्व भी न्यायिक समावेशन का प्रश्न खड़ा करता है।

इससे यह भी स्पष्ट होता है कि न्यायपालिका में जनसंख्या के विविध वर्गों की वास्तविक भागीदारी अभी भी कमजोर है।

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लंबित मामले और देर से न्याय मिलता है

भारत में अक्सर देखा जाता है कि न्याय मिलने में सालों लग जाते हैं. रिपोर्ट में कहा गया है कि

  • ऊँच न्यायालयों में लगभग हर दूसरा मामला तीन साल से अधिक समय से लंबित है।
  • दिल्ली और कुछ राज्यों में लंबित मामलों की संख्या यह इंगित करती है कि इंसान को इंसाफ़ मिलने में दशकों तक का समय लग सकता है।

यह देरी आम नागरिक के जीवन पर गहरा प्रभाव डालती है, चाहे रोजगार विवाद हो, संपत्ति विवाद हो या मन­मुटाव का मामला।

 

केंद्र और राज्य की ज़िम्मेदारी

केंद्र सरकार और राज्यों दोनों ने जजों की नियुक्ति और न्यायालयीन ढाँचों में सुधार की कोशिशें की हैं, लेकिन यह पर्याप्त नहीं रही है।

  • उच्च न्यायालयों में 33% पद खाली रहे हैं, जबकि
  • अनुमोदित संख्या से भी न्यायाधीश वास्तविक संख्या बहुत कम है।

इसके कारण न्यायालयों पर दबाव और लंबित मामलों की संख्या बढ़ती जा रही है — जिससे न्याय प्रणाली पर समग्र भरोसा भी प्रभावित हो रहा है।

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निष्कर्ष: कम जज, धीमा न्याय, बड़ी चुनौती

आज भारत की न्यायिक व्यवस्था इसे साफ़ संदेश दे रही है:

  • जजों की संख्या गंभीर रूप से अपर्याप्त है
  • केसों की लम्बित सूची देश भर में न्याय देने की क्षमता से कहीं आगे है
  • सामाजिक प्रतिनिधित्व और न्यायिक समावेशन में गंभीर कमी है

ये सिर्फ सांख्यिकीय मतभेद नहीं, बल्कि लाखों लोगों के भविष्य और जीवन से जुड़ा जीवन-तराजा मुद्दा हैं। तत्काल आवश्यकता है कि सरकार और न्यायपालिका मिलकर

  • जजों की संख्या बढ़ाएँ
  • नियुक्तियों को पारदर्शी और समय-बद्ध बनाएँ
  • और तकनीकी उपायों के साथ अन्याय का बोझ कम करें।

क्योंकि जब न्याय ही देर से मिलता हो, तो समाज में निष्पक्षता और भरोसे की गहराई कमज़ोर होती है, और वह हालात कहीं से भी स्वीकार्य नहीं हैं।

✍️सपन दास  

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