भारत में चुनाव केवल मतदान का दिन नहीं होते, बल्कि उससे पहले की हर प्रक्रिया लोकतंत्र की मज़बूती तय करती है। इन्हीं प्रक्रियाओं में से एक है SIR यानी स्पेशल इंटेंसिव रिविज़न, जो इन दिनों देशभर में बहस का विषय बन चुका है। चुनाव आयोग इसे मतदाता सूची को दुरुस्त करने की कवायद बता रहा है
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भारत में चुनाव केवल मतदान का दिन नहीं होते, बल्कि उससे पहले की हर प्रक्रिया लोकतंत्र की मज़बूती तय करती है। इन्हीं प्रक्रियाओं में से एक है SIR यानी स्पेशल इंटेंसिव रिविज़न, जो इन दिनों देशभर में बहस का विषय बन चुका है। चुनाव आयोग इसे मतदाता सूची को दुरुस्त करने की कवायद बता रहा है, लेकिन इसके असर और समय को लेकर सवाल भी उतने ही तेज़ हैं।
SIR का उद्देश्य साफ़ शब्दों में बताया गया है, मतदाता सूची से मृत लोगों के नाम हटाना, डुप्लिकेट एंट्री को समाप्त करना और उन मतदाताओं की पहचान करना जो स्थान बदल चुके हैं। साथ ही, जो नए नागरिक मतदान के योग्य हुए हैं, उन्हें सूची में जोड़ना भी इस प्रक्रिया का हिस्सा है। काग़ज़ पर यह पूरी तरह तार्किक और ज़रूरी कदम लगता है।
लेकिन ज़मीनी सच्चाई इतनी सरल नहीं है। SIR सामान्य वार्षिक संशोधन से अलग है। इसमें घर-घर जाकर सत्यापन, नोटिस, सुनवाई और आपत्तियों की प्रक्रिया शामिल है। यही कारण है कि जब लाखों नामों के हटने की संभावनाएँ सामने आईं, तो लोगों में चिंता बढ़ना स्वाभाविक था। मताधिकार छिनने का डर लोकतंत्र में सबसे संवेदनशील मुद्दों में से एक है।
कुछ राज्यों में यह प्रक्रिया राजनीतिक टकराव का कारण बन गई है। विपक्षी दलों का आरोप है कि SIR का इस्तेमाल चुनाव से ठीक पहले मतदाता संतुलन बदलने के लिए किया जा सकता है। वहीं चुनाव आयोग का कहना है कि प्रक्रिया पारदर्शी है और हर नागरिक को दावा-आपत्ति दर्ज कराने का पूरा अवसर दिया जा रहा है।
दिलचस्प बात यह है कि SIR की जद में केवल आम नागरिक ही नहीं आए, बल्कि सार्वजनिक जीवन से जुड़े नाम भी शामिल हुए हैं। इससे यह संकेत मिलता है कि प्रक्रिया समान रूप से लागू की जा रही है, लेकिन इससे असहजता कम नहीं होती। क्योंकि सवाल प्रक्रिया से ज़्यादा भरोसे का है।
लोकतंत्र में मतदाता सूची केवल डेटा नहीं होती, वह नागरिक की आवाज़ का दस्तावेज़ होती है। यदि कोई नाम गलती से हटता है, तो वह सिर्फ़ तकनीकी चूक नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक अधिकार पर सीधा असर होता है।
SIR इसलिए महत्वपूर्ण भी है और विवादास्पद भी। यह तय करेगा कि आने वाले समय में भारत चुनावी शुचिता और नागरिक अधिकारों के बीच संतुलन कैसे बनाता है। यह प्रक्रिया लोकतंत्र को मजबूत कर सकती है लेकिन तभी, जब हर नाम के पीछे इंसान को देखा जाए, सिर्फ़ संख्या को नहीं।