Muslim OBC Reservation : देश के कई राज्यों में मुस्लिम समुदाय की तमाम जातियों को ओबीसी बनाकर आरक्षण देने का प्रयास किया जाता रहा है। सरकार के ऐसे फैसलों को कभी कोर्ट ने रद्द किया तो कभी चुनी हुई नई सरकारों ने पलटने का काम किया। ऐसे तीन बड़े मामले हैं जिसकी अंतिम परीक्षा सुप्रीम कोर्ट में होनी है। इस पूरे विवाद को समझने के लिए संविधान के दो पहलुओं को एक साथ देखना होगा।
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पहला है अनुच्छेद 15 और 16, जो कहता है कि केवल धर्म के आधार पर आरक्षण नहीं दिया जा सकता है। दूसरा है इंदिरा साहनी बनाम भारत संघ का 1992 का फैसला जिसमें नौ जजों की संविधान पीठ ने साफ कहा था कि पिछड़े वर्ग का अर्थ केवल हिंदू जाति नहीं है। मुसलमानों, ईसाइयों और सिखों आदि में भी पेशे और सामाजिक स्थिति के कारण ऐसे समूह हैं, जो शैक्षणिक और सामाजिक रूप से पिछड़े हैं और उन्हें पिछड़ेपन के आधार पर ओबीसी सूची में शामिल किया जा सकता है, धर्म के आधार पर नहीं। अब देखना है सुप्रीम कोर्ट की कसौटी पर मुस्लिम ओबीसी आरक्षण मामले का हश्र? क्या होगा।
मुस्लिम आरक्षण को लेकर अब तक जो बड़े मामले आए हैं। उनमें से तीन राज्यों की कहानी लगभग एक जैसी है। पहला मामला कर्नाटक का है जहां 1994 से मुसलमानों को 2बी कैटेगरी में 4 प्रतिशत ओबीसी आरक्षण मिल रहा था। मार्च 2023 में बसवराज बोम्मई की बीजेपी सरकार ने इसे खत्म कर दिया और उस 4 प्रतिशत को 2 प्रतिशत वोक्कालिगा और 2 प्रतिशत लिंगायतों में बांट दिया जबकि मुसलमानों को ईडब्ल्यूएस में डाल दिया। सरकार का तर्क था कि धर्म आधारित कोटा असंवैधानिक है।
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जब यह मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा तो 13 अप्रैल 2023 को जस्टिस के एम जोसेफ की बेंच ने कहा कि सरकार का यह कदम प्रथम दृष्टया सही नहीं लग रहा और बिना किसी ठोस अध्ययन के 30 साल पुरानी व्यवस्था को खत्म नहीं किया जा सकता। कोर्ट की इस टिप्पणी के बाद सरकार को आश्वासन देना पड़ा कि इस नए फॉर्मूले से कोई नियुक्ति नहीं होगी।
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दूसरा मामला आंध्र प्रदेश का रहा मुस्लिम आरक्षण के सरकार के फैसले को हाईकोर्ट ने रद्द कर दिया फिर सरकार ने संशोधन के साथ पुनः पारित किया उसके बाद सुप्रीम कोर्ट के अंतरिम आदेश पर जारी है। यह मामला आज भी संविधान पीठ के सामने लंबित है। हाईकोर्ट ने सरकार के उस फैसले को रद्द कर दिया था जिसमें सरकार ने मुसलमानों को 5 प्रतिशत का आरक्षण दे दिया था, उसके बाद सरकार ने पिछड़ा वर्ग आयोग बनाया, मुसलमानों के भीतर से कुछ विशिष्ट पिछड़े समूहों की पहचान कराई और 2007 में उन्हें 4 प्रतिशत आरक्षण दे दिया। सुप्रीम कोर्ट ने 2010 में अंतरिम आदेश में इसे इसलिए चलने दिया गया क्योंकि इसमें धर्म नहीं बल्कि पिछड़ेपन को आधार बनाया गया था। मामला अभी सर्वोच्च अदालत में लंबित है।
कलकत्ता हाईकोर्ट ने सरकार का यह फैसला कर दिया था रद्द
तीसरा और सबसे नया मामला पश्चिम बंगाल का है। पिछली सरकार ने 77 जातियों को ओबीसी में जोड़ा था, जिनमें 75 मुस्लिम समुदाय से थीं। मामले की सुनवाई करते हुए कलकत्ता हाईकोर्ट ने इसे इस आधार पर रद्द कर दिया कि बिना पिछड़ा वर्ग आयोग की सिफारिश के यह राजनीतिक तुष्टिकरण के लिए किया गया फैसला लगता है। हाईकार्ट के इस फैसले के खिलाफ तत्कालीन राज्य सरकार सुप्रीम कोर्ट गई थी, लेकिन गत 14 जुलाई 2026 को नई बीजेपी सरकार ने सुप्रीम कोर्ट से अपनी याचिका ही वापस ले ली।
सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता के अनुरोध पर कोर्ट ने याचिका वापस लिए जाने की अनुमति दे दी। जिससे हाईकोर्ट का फैसला प्रभावी हो गया। मतलब ममता सरकार के अधिसंख्य मुस्लिम समुदाय को ओबीसी में शामिल करने के मंसूबे पर फिलहाल पानी फिर गया है।
सुप्रीम कोर्ट में फरवरी 2026 में पसमांदा मुसलमानों को भी पिछड़ा मानते हुए ओबीसी में शामिल किए जाने की याचिका दाखिल हुई है, जिस पर भी सुनवाई होनी है, जो कि माननीय मुख्य न्यायाधीश की कोर्ट में है। अब इन मामलों में दो सवाल तय होंगे। पहला कि क्या बीजेपी सरकारों द्वारा कोटा खत्म करने से पहले कोई विशेष सर्वे कराया या फिर किसी आयोग की रिपोर्ट मंगायी।
यदि नहीं तो कोर्ट इसे मनमाना मान सकता है। दूसरा कि क्या मुस्लिम समुदायों को ओबीसी में शामिल किया जाना धर्म के आधार पर था या फिर उनकी सामाजिक और शैक्षिक पिछड़ेपन के आंकड़ों को आधार माना गया था। यहां एक बात स्पष्ट है कि जहां आयोग की रिपोर्ट और डेटा होगा, वहां आरक्षण टिकने की संभावना ज्यादा है और जहां बिना डेटा के पूरे समुदाय को लाभ दिया गया होगा।
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वहां सरकार के उस फैसले को कोर्ट द्वारा रद्द किए जाने की संभावना ज्यादा होगी। इसी वजह से आंध्र वाला मॉडल अभी तक सुप्रीम कोर्ट में टिका हुआ है जबकि बिना आयोग की सिफारिशों के विभिन्न राज्यों की सरकारों के फैसले रद्द होते जा रहे हैं।
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