वेनेज़ुएला प्रकरण के बाद वैश्विक राजनीति में एक बेचैन सवाल तैर रहा है, क्या अमेरिका की आक्रामक रणनीति यहीं रुकेगी, या कोई नया देश अगली सुर्ख़ी बनेगा? 2026 की शुरुआत में अंतरराष्ट्रीय विश्लेषकों और रणनीतिक हलकों में इस सवाल पर खुलकर चर्चा हो रही है।
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वेनेज़ुएला प्रकरण के बाद वैश्विक राजनीति में एक बेचैन सवाल तैर रहा है, क्या अमेरिका की आक्रामक रणनीति यहीं रुकेगी, या कोई नया देश अगली सुर्ख़ी बनेगा? 2026 की शुरुआत में अंतरराष्ट्रीय विश्लेषकों और रणनीतिक हलकों में इस सवाल पर खुलकर चर्चा हो रही है।
हाल के घटनाक्रमों ने यह संकेत दिया है कि अमेरिका अब केवल कूटनीतिक दबाव तक सीमित नहीं रहना चाहता। इतिहास बताता है कि जब वॉशिंगटन किसी क्षेत्र को रणनीतिक रूप से अहम मानता है, तो वहां उसकी दिलचस्पी अचानक तेज़ हो जाती है। इसी संदर्भ में कुछ नाम बार-बार उभर रहे हैं, क्यूबा और कोलंबिया।
क्यूबा के साथ अमेरिका का रिश्ता दशकों से तनावपूर्ण रहा है। वहीं कोलंबिया, आंतरिक सुरक्षा, ड्रग नेटवर्क और क्षेत्रीय अस्थिरता के कारण हमेशा अमेरिकी नीतियों की परिधि में रहा है। हालांकि फिलहाल कोई आधिकारिक घोषणा नहीं है, लेकिन रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि संकेतों को नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता।
इस बार फर्क सिर्फ़ इतना है कि अमेरिका के भीतर भी विरोध की आवाज़ें तेज़ हो रही हैं। कांग्रेस और जनता, दोनों सैन्य हस्तक्षेप पर सवाल उठा रहे हैं। इससे यह साफ़ होता है कि अगला कदम लेना अब पहले जितना आसान नहीं रहा।
फिर भी, वैश्विक राजनीति में “कयास” अक्सर भविष्य की पटकथा बन जाते हैं। इसलिए जब दुनिया यह पूछ रही है कि अगला निशाना कौन होगा, तो असली चिंता यह है कि क्या सैन्य ताक़त अब भी अंतरराष्ट्रीय समस्याओं का समाधान मानी जाएगी या यह केवल नए संकटों को जन्म देगी?