Delhi : दिल्ली के सत्य निकेतन में पांच मंजिला पीजी इमारत का ढहना सिर्फ एक दर्दनाक हादसा नहीं है, बल्कि राजधानी में छात्रों की सुरक्षा और उन्हें उपलब्ध कराए जा रहे आवास की व्यवस्था पर बड़ा सवाल है। 6 सितंबर को हुए इस हादसे में सात लोगों की मौत हुई और पांच लोग घायल हुए। करीब 27 घंटे तक चले राहत एवं बचाव अभियान के बाद मलबे से लोगों को बाहर निकाला जा सका।
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हादसे के बाद पीजी संचालक और संपत्ति से जुड़े परिवार के तीन लोगों को गिरफ्तार किया गया है। वहीं एमसीडी ने दक्षिणी जोन के पांच अधिकारियों को निलंबित किया है। दिल्ली हाईकोर्ट ने भी मामले में एमसीडी से उच्चस्तरीय जांच और पीजी इमारतों की सुरक्षा व्यवस्था को लेकर जवाब मांगा है।
सवाल सिर्फ यह नहीं है कि हादसे के बाद किसे गिरफ्तार किया गया और किस अधिकारी को निलंबित किया गया। असली सवाल यह है कि अगर इमारत में नियमों का उल्लंघन था, अगर संरचना कमजोर थी या निर्माण से जुड़े बदलाव किए जा रहे थे, तो हादसे से पहले किसी की नजर क्यों नहीं पड़ी?
पीजी चुनते समय छात्र किराया और दूरी देखता है, सुरक्षा कौन देखता है?
दिल्ली में देशभर से छात्र पढ़ाई के लिए आते हैं। दक्षिणी दिल्ली में दिल्ली विश्वविद्यालय के साउथ कैंपस के आसपास सत्य निकेतन जैसे इलाकों में बड़ी संख्या में छात्र पीजी और किराये के कमरों में रहते हैं।
एक छात्र के लिए पीजी चुनने का सबसे बड़ा आधार आमतौर पर कॉलेज से दूरी, किराया, कमरा, बिजली, पानी, खाना और दूसरी सुविधाएं होती हैं, लेकिन क्या कोई छात्र यह भी जांच सकता है कि जिस इमारत में वह रहने जा रहा है, वह संरचनात्मक रूप से सुरक्षित है या नहीं?
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क्या उसके पास यह पता लगाने का कोई आसान तरीका है कि इमारत का नक्शा स्वीकृत है या नहीं? कितनी मंजिलों की अनुमति है? इमारत पर कोई कार्रवाई लंबित है या नहीं? हाल में उसमें कोई ऐसा निर्माण या बदलाव तो नहीं हुआ, जिससे उसकी मजबूती प्रभावित हो सकती है?
यही वजह है कि छात्र और उनके माता-पिता पीजी संचालक और सरकारी व्यवस्था पर भरोसा करते हैं। सत्य निकेतन की घटना ने इसी भरोसे को सबसे बड़ा झटका दिया है।
पीजी मालिकों की जिम्मेदारी क्या है?
पीजी संचालक छात्रों से हर महीने मोटी रकम किराये के रूप में लेते हैं। बदले में उन्हें सिर्फ एक कमरा उपलब्ध कराना ही जिम्मेदारी नहीं होनी चाहिए। जिस इमारत में दर्जनों छात्र रह रहे हैं, उसकी सुरक्षा भी संचालक की प्राथमिक जिम्मेदारी होनी चाहिए।
इमारत की हालत खराब है तो उसमें छात्रों को नहीं रखा जाना चाहिए। निर्माण या मरम्मत का काम चल रहा है तो वहां रहने वाले छात्रों की सुरक्षा सुनिश्चित होनी चाहिए। बिजली, पानी, आग से बचाव, आपातकालीन रास्ते और भवन की संरचनात्मक स्थिति जैसी बुनियादी सुरक्षा व्यवस्था की नियमित जांच होनी चाहिए।
सत्य निकेतन हादसे की जांच में इमारत की उम्र, मरम्मत और बेसमेंट में पानी जमा होने जैसे पहलुओं की जांच की जा रही है। इसलिए अभी किसी एक वजह को हादसे का अंतिम कारण मानना जल्दबाजी होगी।
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लेकिन जांच पूरी होने के बाद यह भी सामने आना चाहिए कि जिस इमारत में छात्र रह रहे थे, उसकी सुरक्षा की जिम्मेदारी किसकी थी और उस जिम्मेदारी को कितना निभाया गया।
एमसीडी की निगरानी व्यवस्था पर भी सवाल
हादसे के बाद एमसीडी के पांच अधिकारियों का निलंबन इस सवाल को और गंभीर बनाता है कि आखिर इमारतों की निगरानी व्यवस्था कितनी प्रभावी है। एमसीडी ने दक्षिणी जोन के डिप्टी कमिश्नर समेत पांच अधिकारियों को निलंबित किया है। हाईकोर्ट ने भी पूछा है कि क्या इमारत वैध अनुमति के तहत बनी थी और अगर नियमों का उल्लंघन हुआ था तो उस पर समय रहते कार्रवाई क्यों नहीं हुई। यह सवाल केवल सत्य निकेतन तक सीमित नहीं रहना चाहिए।
अगर किसी इलाके में अवैध मंजिलें बन रही हैं, पुराने भवनों में लगातार बदलाव हो रहे हैं या खतरनाक इमारतों में व्यावसायिक गतिविधियां चल रही हैं, तो उन्हें हादसे का इंतजार किए बिना चिन्हित करना जरूरी है।
किसी इमारत के गिरने के बाद अधिकारियों को निलंबित करना कार्रवाई हो सकती है, लेकिन असली प्रशासनिक सफलता तब होगी जब अगली इमारत गिरने से पहले खतरे की पहचान कर ली जाए।
दिल्ली सरकार की जिम्मेदारी भी कम नहीं
पीजी की निगरानी की जिम्मेदारी सिर्फ मकान मालिक या एमसीडी पर डालकर सरकार अपनी जिम्मेदारी से पीछे नहीं हट सकती। दिल्ली देश के सबसे बड़े शिक्षा केंद्रों में से एक है। यहां हर साल देश के अलग-अलग राज्यों से हजारों छात्र पढ़ने आते हैं, लेकिन सुरक्षित और किफायती छात्र आवास की पर्याप्त व्यवस्था नहीं होने के कारण बड़ी संख्या में छात्र निजी पीजी और किराये के मकानों पर निर्भर हैं।
दिल्ली हाईकोर्ट ने भी इसी समस्या की ओर ध्यान दिलाते हुए छात्रावासों की संख्या बढ़ाने और पीजी व्यवस्था को विनियमित करने की जरूरत बताई है। सरकार को अब यह तय करना होगा कि छात्रों को सुरक्षित आवास उपलब्ध कराने के लिए केवल हादसे के बाद जांच होगी या स्थायी व्यवस्था भी बनाई जाएगी।
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अगर पीजी असुरक्षित हैं तो छात्र जाएंगे कहां?
यह सवाल सबसे महत्वपूर्ण है। अगर सरकार बड़े पैमाने पर पीजी की जांच करती है और कई इमारतें असुरक्षित पाई जाती हैं, तो उन्हें सील करना जरूरी हो सकता है, लेकिन उन इमारतों में रहने वाले छात्रों का क्या होगा? क्या उन्हें अचानक कमरा खाली करने के बाद सुरक्षित और किफायती आवास उपलब्ध कराया जाएगा? क्योंकि किसी असुरक्षित इमारत को सील करना समस्या का एक हिस्सा हल करता है। असली समाधान तब होगा जब छात्रों के पास सुरक्षित विकल्प भी मौजूद हों।
सरकार और विश्वविद्यालयों को मिलकर नए छात्रावासों की क्षमता बढ़ाने, खाली सरकारी भवनों के इस्तेमाल और सुरक्षित छात्र आवास की दीर्घकालिक योजना पर काम करना होगा। हाईकोर्ट की सुनवाई में भी छात्र आवास की कमी और अधिक छात्रावासों की जरूरत पर जोर दिया गया है।
छोटे प्लॉट, बड़े पीजी और बढ़ता छात्र दबाव
सत्य निकेतन जैसे इलाकों में जमीन और आवास की मांग लगातार बढ़ी है। छोटे भूखंडों पर बने पुराने मकानों में समय के साथ मंजिलें बढ़ती गईं और कई जगह आवासीय उपयोग का स्वरूप भी बदलता गया। ऐसे इलाकों में जब एक मकान में बड़ी संख्या में छात्र रहने लगते हैं, तो वह सिर्फ एक निजी घर नहीं रह जाता। वहां दर्जनों लोगों की जिंदगी जुड़ जाती है। यहीं से सवाल उठता है कि क्या भवन के इस्तेमाल में बदलाव के साथ सुरक्षा मानकों की भी नियमित समीक्षा होती है? अगर किसी मकान का इस्तेमाल बड़ी संख्या में छात्रों के रहने के लिए किया जा रहा है तो उसकी सुरक्षा व्यवस्था सामान्य मकान से अलग और अधिक सख्त होनी चाहिए।
दिल्ली प्रशासन ने अब प्रमुख छात्र इलाकों में पीजी इमारतों के संरचनात्मक ऑडिट की दिशा में कदम उठाए हैं। उपराज्यपाल की अध्यक्षता में हुई समीक्षा बैठक में पीजी हब में निरीक्षण और एक सप्ताह के भीतर संरचनात्मक ऑडिट कराने के निर्देश भी दिए गए हैं।
मलबे में सिर्फ सात जिंदगियां नहीं, सात परिवारों के सपने दबे
सत्य निकेतन के मलबे से निकली सात लाशें सिर्फ हादसे का आंकड़ा नहीं हैं। इनमें ऐसे छात्र थे जो अपने परिवार से दूर दिल्ली पढ़ने आए थे। किसी परिवार ने बेटे को बेहतर भविष्य के लिए दिल्ली भेजा था, किसी ने उसकी फीस और रहने का खर्च जुटाया था, तो किसी ने उसके सपनों के लिए अपनी पूरी उम्मीद लगा रखी थी।
माता-पिता अपने बच्चों सरकार, कानून व्यवस्था को यह सोचकर दिल्ली भेजते हैं कि पढ़ाई पूरी करके वह अपने पैरों पर खड़ा होगा। लेकिन अगर रहने की जगह ही सुरक्षित नहीं है, सरकार हादसे के बाद जागती है तो उस सपने की सुरक्षा कौन करेगा? यह हादसा उन सभी परिवारों के लिए चेतावनी है जो अपने बच्चों को दिल्ली जैसे शहरों में पढ़ने भेजते हैं। अब जवाबदेही सिर्फ हादसे के बाद नहीं, पहले तय करनी होगी।
सत्य निकेतन हादसे के बाद गिरफ्तारियां हुईं, अधिकारियों पर कार्रवाई हुई और जांच के आदेश दिए गए। लेकिन यह कार्रवाई तभी सार्थक होगी जब इससे दिल्ली की पीजी व्यवस्था में स्थायी बदलाव आए।
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दिल्ली हाईकोर्ट ने पीजी इमारतों के ऑडिट और उनके नियमन की जरूरत पर सवाल उठाए हैं। सुप्रीम कोर्ट की ओर से नियुक्त अमिकस क्यूरी ने भी दिल्ली के छात्र आवासों, पीजी, निजी छात्रावास और कॉलेजों के आसपास मौजूद अन्य छात्र आवासों का व्यापक सुरक्षा ऑडिट कराने की मांग की है।
अब जरूरत ऐसी व्यवस्था की है, जिसमें किसी छात्र को पीजी लेने से पहले उसकी सुरक्षा की जानकारी मिल सके। हर पीजी का रिकॉर्ड हो, भवन की स्वीकृति और संरचनात्मक सुरक्षा की स्थिति स्पष्ट हो और नियम तोड़ने वालों पर हादसे का इंतजार किए बिना कार्रवाई हो, क्योंकि सुरक्षित छत कोई सुविधा नहीं, छात्र का बुनियादी अधिकार है।
दिल्ली आने वाला हर छात्र अपने साथ एक सपना लेकर आता है। कोई डॉक्टर बनना चाहता है, कोई वकील, कोई अधिकारी, कोई कारोबारी। लेकिन इन सपनों की पहली जरूरत एक सुरक्षित जगह है, जहां वह चैन से रह सके और पढ़ सके। सत्य निकेतन में सिर्फ एक इमारत नहीं गिरी। इस हादसे ने उस भरोसे को भी हिला दिया है कि दिल्ली में पढ़ने आया छात्र अपने रहने की जगह को सुरक्षित मान सकता है। अब सवाल यह नहीं होना चाहिए कि हादसे के बाद किस पर कार्रवाई हुई। सवाल यह होना चाहिए कि अगली इमारत गिरने से पहले जिम्मेदार कौन जागेगा?
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