महाराष्ट्र का यह फ्लाईओवर अब विकास का प्रतीक नहीं, बल्कि चेतावनी बन चुका है। यहां सड़क अचानक चार लेन से दो लेन में सिमट जाती है, बिना किसी बोर्ड, संकेत या पूर्व सूचना के। जो ड्राइवर पहली बार इस रास्ते से गुजरता है, उसके लिए यह सीधा हादसे का न्योता है।
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महाराष्ट्र का यह फ्लाईओवर अब विकास का प्रतीक नहीं, बल्कि चेतावनी बन चुका है। यहां सड़क अचानक चार लेन से दो लेन में सिमट जाती है, बिना किसी बोर्ड, संकेत या पूर्व सूचना के। जो ड्राइवर पहली बार इस रास्ते से गुजरता है, उसके लिए यह सीधा हादसे का न्योता है।
दस्तावेज़ों में यह प्रोजेक्ट चार लेन का है, बजट भी उसी हिसाब से पास हुआ। लेकिन ज़मीनी हकीकत कुछ और ही कहानी कहती है। सवाल उठता है—अगर सड़क दो लेन की ही बननी थी, तो चार लेन दिखाकर पैसा क्यों निकाला गया?
सबसे गंभीर बात यह है कि जहां लेन कम होती है, वहां:
रात के समय यह जगह और भी जानलेवा बन जाती है। यह लापरवाही नहीं, सुरक्षा के साथ खुला खिलवाड़ है।
प्रशासन का दावा है कि डिज़ाइन “योजनाबद्ध” है, लेकिन सड़क सुरक्षा विशेषज्ञ इसे खतरनाक मानते हैं। अचानक लेन कम होना तेज़ रफ्तार वाहनों के लिए सबसे बड़ा जोखिम होता है—ब्रेकिंग, टक्कर और चेन एक्सीडेंट की पूरी संभावना।
यहां सवाल सिर्फ डिज़ाइन का नहीं, नियत का भी है।
आरोप यह भी है कि चार लेन दिखाकर बड़ा बजट निकाला गया और काम आधा किया गया। अगर यह सच है, तो यह सिर्फ भ्रष्टाचार नहीं, बल्कि आम जनता की जान से धोखा है।
जब विकास का मतलब काग़ज़ों में मोटा और ज़मीन पर पतला हो जाए, तो नतीजा यही होता है।
अब तक न किसी इंजीनियर पर कार्रवाई, न ठेकेदार से जवाब। यह खामोशी बताती है कि मामला सिर्फ सड़क का नहीं, पूरे सिस्टम की मिलीभगत का है।
यह फ्लाईओवर सिर्फ एक संरचना नहीं, बल्कि एक सवाल है, क्या हमारी जान की कीमत सिर्फ टेंडर फाइल तक सीमित है?
जब तक सड़कें इंसानों के लिए नहीं, बल्कि कमीशन के लिए बनेंगी, तब तक हर पुल, हर फ्लाईओवर एक संभावित हादसा बना रहेगा।