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बांकीपुर में प्रशांत किशोर का बड़ा धमाका, बीजेपी का अभेद्य किला कैसे ढहा? जानिए जीत के 5 सबसे बड़े फैक्टर

By HO BUREAU 

Updated Date

Prashant Kishor (PK) won the Bankipur India Voice

बिहार की सबसे चर्चित बांकीपुर विधानसभा सीट पर हुए उपचुनाव में प्रशांत किशोर ने 19,324 वोटों के बड़े अंतर से जीत दर्ज की। जन सुराज उम्मीदवार के तौर पर उन्हें 63,539 वोट यानी करीब 49 प्रतिशत मत मिले, जबकि बीजेपी को अपने मजबूत गढ़ में 50,570 वोट हासिल हुए। वहीं राजद 14,274 वोट और करीब 11 प्रतिशत मतों के साथ तीसरे स्थान पर रही। इस नतीजे ने साफ संकेत दिया है कि बांकीपुर की राजनीति में इस बार मतदाताओं ने बदलाव का संदेश दिया है।

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सवर्ण वोट बैंक में सेंध

बांकीपुर में सवर्ण मतदाता हमेशा से चुनावी नतीजों को प्रभावित करते रहे हैं। इस बार माना जा रहा है कि इस वर्ग के एक हिस्से ने बीजेपी से दूरी बनाकर प्रशांत किशोर का साथ दिया। कई स्थानीय और राष्ट्रीय मुद्दों को लेकर नाराजगी का असर मतदान में दिखाई दिया।

युवाओं ने बदला चुनावी माहौल

रोजगार, पेपर लीक और प्रतियोगी परीक्षाओं से जुड़े मुद्दे पूरे चुनाव के दौरान चर्चा में रहे। पहली बार वोट देने वाले युवाओं और छात्र वर्ग ने इन सवालों को प्राथमिकता दी, जिसका फायदा जन सुराज को मिलता दिखाई दिया।

बीजेपी की रणनीति रही कमजोर

उम्मीदवार चयन को लेकर बनी असमंजस की स्थिति और चुनाव प्रचार के दौरान कुछ राजनीतिक घटनाओं ने बीजेपी की मुश्किलें बढ़ाईं। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि पार्टी अपने पारंपरिक वोटरों को पूरी तरह सक्रिय नहीं कर सकी।

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बूथ मैनेजमेंट ने दिलाई बढ़त

चुनावी रणनीतिकार के तौर पर वर्षों का अनुभव प्रशांत किशोर के काम आया। बूथ स्तर पर मजबूत टीम, लगातार संपर्क अभियान और मतदान के दिन प्रभावी प्रबंधन ने जन सुराज को निर्णायक बढ़त दिलाने में अहम भूमिका निभाई।

साइलेंट वोटरों ने बदल दिया खेल

कम मतदान के बावजूद बड़ी संख्या में ऐसे मतदाता सामने आए जिन्होंने अंतिम समय में अपना रुख बदला। महिलाओं, दलितों, अति पिछड़ा वर्ग और मुस्लिम मतदाताओं के एक हिस्से का समर्थन भी जीत का अहम आधार बना।

बांकीपुर का यह परिणाम सिर्फ एक सीट की जीत नहीं माना जा रहा, बल्कि इसे बिहार की बदलती राजनीति का संकेत भी माना जा रहा है। विधानसभा चुनाव से पहले मिली इस सफलता ने प्रशांत किशोर और जन सुराज का मनोबल बढ़ाया है, वहीं बीजेपी और महागठबंधन दोनों के सामने अपनी रणनीति की समीक्षा करने की चुनौती खड़ी कर दी है।

अरविंद कुमार

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