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Sohrabuddin encounter case : 22 आरोपियों के बरी होने के खिलाफ भाई की याचिका पर SC का नोटिस

By HO BUREAU 

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Sohrabuddin Encounter Case : Sohrabuddin encounter case : 22 आरोपियों के बरी होने के खिलाफ भाई की याचिका पर SC का नोटिस

Sohrabuddin Encounter Case : सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को सोहराबुद्दीन शेख, उनकी पत्नी कौसर बी और सहयोगी तुलसीराम प्रजापति की कथित फर्जी मुठभेड़ में हुई हत्याओं के मामले में 21 पुलिसकर्मियों समेत 22 आरोपियों को बरी किए जाने के बॉम्बे हाईकोर्ट के फैसले को चुनौती देने वाली याचिका पर CBI और सभी 22 आरोपियों को नोटिस जारी किया।

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मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची तथा न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ ने सोहराबुद्दीन के छोटे भाई रुबाबुद्दीन शेख की ओर से दायर विशेष अनुमति याचिका (SLP) पर यह नोटिस जारी किया। याचिका में बॉम्बे हाईकोर्ट के उस फैसले को चुनौती दी गई है, जिसमें दिसंबर 2018 में विशेष CBI अदालत द्वारा सभी 22 आरोपियों को बरी किए जाने के फैसले के खिलाफ मृतक के भाइयों की अपील खारिज कर दी गई थी।

मामले की अगली सुनवाई 28 अक्टूबर को होगी, और…

रुबाबुद्दीन की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता दामा शेषाद्री नायडू ने CJI सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ को बताया कि मृतक के एक अन्य भाई नायबुद्दीन शेख ने भी हाईकोर्ट के फैसले को चुनौती देते हुए याचिका दायर की है। उन्होंने दोनों मामलों को एक साथ जोड़कर सुनवाई करने का अनुरोध किया।

सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने इस तथ्य पर चिंता जताई कि मुकदमे के दौरान 92 गवाह अपने बयानों से मुकर गए थे। अदालत ने कहा कि वह कुछ गवाहों के बयानों की जांच करना चाहती है।

पीठ ने कहा, “92 गवाहों का मुकर जाना गंभीर चिंता का विषय है। हालांकि यह बरी किए जाने का समानांतर निष्कर्ष (concurrent finding) है, लेकिन यह देखना होगा कि मुकदमा निष्पक्ष और न्यायसंगत तरीके से चला या नहीं। हम कुछ गवाहों के बयान देखना चाहते हैं और खुद संतुष्ट होना चाहते हैं।”

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कुछ बरी किए गए आरोपियों की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता के. परमेश्वर ने कहा कि मामले में दोनों अदालतों ने विस्तृत और तर्कसंगत फैसलों के आधार पर आरोपियों को बरी किया है। उन्होंने जल्द सुनवाई का अनुरोध करते हुए कहा कि आरोपी नहीं चाहते कि मामला लंबे समय तक लंबित रहे।

हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि वह मौजूदा केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह को मामले से डिस्चार्ज किए जाने को चुनौती देने वाले किसी मुद्दे पर सुनवाई नहीं करेगा।

CJI सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने कहा कि वह बॉम्बे हाईकोर्ट के फैसले के पैरा 43 में नहीं जाएगी, जिसमें दिसंबर 2014 में अमित शाह को डिस्चार्ज किए जाने को चुनौती देने के मामले का उल्लेख था।

बॉम्बे हाईकोर्ट ने इस मुद्दे पर कहा था कि शाह के डिस्चार्ज को चुनौती देने वाली याचिकाएं पहले हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट दोनों द्वारा खारिज की जा चुकी थीं। हाईकोर्ट ने यह भी दर्ज किया था कि बाद में दायर की गई याचिका में इन तथ्यों को छिपाया गया था। बॉम्बे हाईकोर्ट ने 7 मई को दिए अपने फैसले में सभी 22 आरोपियों को बरी किए जाने के फैसले को बरकरार रखा था और सोहराबुद्दीन के भाइयों की अपील खारिज कर दी थी।

इन अपीलों में ट्रायल कोर्ट के फैसले को रद्द करने या दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 386(a) के तहत दोबारा मुकदमा चलाने की मांग की गई थी। याचिकाकर्ताओं ने दावा किया था कि मुकदमे में गंभीर खामियां थीं। इनमें उन मजिस्ट्रेटों को गवाही के लिए नहीं बुलाना भी शामिल था, जिनके सामने कुछ गवाहों ने पहले अपने बयान दर्ज कराए थे और बाद में वे गवाह अपने बयानों से मुकर गए।

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उन्होंने यह भी दावा किया था कि कई गवाहों ने बाद में कहा था कि मुकदमे के दौरान उनके बयान सही तरीके से दर्ज नहीं किए गए थे। हालांकि, बॉम्बे हाईकोर्ट ने आरोपियों के बरी किए जाने के फैसले में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया।

CBI ने बॉम्बे हाईकोर्ट को बताया था कि उसने दिसंबर 2018 के बरी किए जाने के फैसले को स्वीकार कर लिया है और उसके खिलाफ अपील करने का कोई निर्णय नहीं लिया है। यह मामला 22-23 नवंबर 2005 की रात हैदराबाद से सांगली जा रही एक लग्जरी बस से सोहराबुद्दीन शेख, कौसर बी और तुलसीराम प्रजापति के कथित अपहरण से जुड़ा है।

अभियोजन पक्ष के अनुसार, नवंबर 2005 में गुजरात और राजस्थान पुलिस की संयुक्त टीम ने सोहराबुद्दीन को अहमदाबाद के पास कथित फर्जी मुठभेड़ में मार दिया था। कुछ दिनों बाद कौसर बी की भी कथित तौर पर हत्या कर दी गई और उनके शव को गुप्त रूप से ठिकाने लगा दिया गया। इस मामले में प्रमुख प्रत्यक्षदर्शी माने जाने वाले तुलसीराम प्रजापति की दिसंबर 2006 में गुजरात-राजस्थान सीमा पर एक अन्य कथित फर्जी मुठभेड़ में हत्या कर दी गई।

मामले की जांच शुरुआत में गुजरात पुलिस ने की थी। बाद में सुप्रीम कोर्ट ने जांच CBI को सौंप दी और 2012 में मुकदमे को गुजरात से मुंबई स्थानांतरित कर दिया। मुकदमे में गुजरात, राजस्थान और आंध्र प्रदेश के सेवारत और सेवानिवृत्त पुलिसकर्मियों के अलावा एक फार्महाउस मालिक भी आरोपी था, जिस पर पीड़ितों को अवैध रूप से बंधक बनाने का आरोप था।

मामले की सुनवाई के दौरान 2014 में विशेष CBI जज बी.एच. लोया की मृत्यु भी हुई थी। उस समय मुकदमा चल रहा था। इसके बाद जज एम.बी. गोसावी ने दिसंबर 2014 में अमित शाह को मामले से डिस्चार्ज कर दिया था।

21 दिसंबर 2018 को विशेष CBI जज एस.जे. शर्मा ने सभी 22 आरोपियों को बरी कर दिया था। अदालत ने कहा था कि अभियोजन पक्ष साजिश और हत्या के आरोपों को उचित संदेह से परे साबित करने में विफल रहा।

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ट्रायल कोर्ट के अनुसार, मुकदमे के दौरान कुल 210 गवाहों से पूछताछ की गई, जिनमें से 92 गवाह अपने बयानों से मुकर गए थे। अदालत ने कहा था कि ठोस सबूतों के अभाव में केवल नैतिक आधार या संदेह के आधार पर आरोपियों को दोषी नहीं ठहराया जा सकता। अभियोजन पक्ष को कथित साजिश और हत्याओं में आरोपियों की संलिप्तता साबित करने के लिए ठोस और विश्वसनीय साक्ष्य प्रस्तुत करना जरूरी था।

(आईएएनएस)

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