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62 साल पहले बसा गांव, न सड़क, न शौचालय, बांदा के मवई बुजुर्ग में 200 दलित परिवारों की ‘नरकीय’ जिंदगी

UP News : चित्रकूट धाम मंडल मुख्यालय बांदा से बिल्कुल सटा गांव है। 1962 में बसाए गए इस गांव का आधा हिस्सा तो पक्की सड़कों और आधुनिकता की तस्वीर दिखाता है।✍️Sandeep

By HO BUREAU 

Updated Date

UP News : चित्रकूट धाम मंडल मुख्यालय बांदा से बिल्कुल सटा गांव है। 1962 में बसाए गए इस गांव का आधा हिस्सा तो पक्की सड़कों और आधुनिकता की तस्वीर दिखाता है, लेकिन जैसे ही आप यहां की दलित बस्ती में कदम रखते हैं, विकास के तमाम सरकारी दावों की पोल खुल जाती है। लगभग 200 दलित परिवारों की आबादी वाली यह बस्ती पिछले छह दशकों से बुनियादी सुविधाओं के लिए तरस रही है।

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बारिश आते ही बस्ती बन जाती है दलदल

गांव में न तो पानी की निकासी के लिए नालियां हैं और न ही चलने लायक पक्की सड़क। बारिश के दिनों में पूरी बस्ती दलदल का रूप ले लेती है। इंसान तो दूर, जानवरों तक का निकलना दूभर हो जाता है। घरों के चारों तरफ गंदा पानी जमा होने से बस्ती में लगातार संक्रामक बीमारियों का खतरा बना रहता है।

सरकारी योजनाओं का हाल: दावों से कोसों दूर हकीकत

हर घर जल योजना: बुंदेलखंड में पानी पहुंचाने का दावा यहां दम तोड़ चुका है; बस्ती के लोग आज भी दूर-दराज से पानी ढोने को मजबूर हैं।
स्वच्छ भारत मिशन: खुले में शौच से मुक्ति का नारा हवा-हवाई है। ग्राम पंचायत स्तर से शौचालयों की कोई पुख्ता व्यवस्था नहीं की गई। पीएम आवास योजना: पक्के मकान का सपना इन 200 परिवारों के लिए अब भी ख्वाब है; लोग टूटी-फूटी झोपड़ियों और कच्चे छप्परों में जीवन गुजार रहे हैं।

बेटी की बारात आनी है, सड़क पर कीचड़ भरा 

गांव की बदहाली का दर्द सिर्फ चलने-फिरने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह इनके सामाजिक जीवन पर भी भारी पड़ रहा है। बस्ती की बदतर स्थिति के कारण यहां शादियों के रिश्ते तय होना तक मुश्किल हो जाता है। बस्ती की निवासी आशा देवी अपनी पीड़ा बताते हुए रो पड़ती हैं। वे कहती हैं, मेरी बेटी की बारात आनी है। रास्ते में इतना कीचड़ और दलदल है कि गाड़ियां तो क्या, पैदल चलना भी नामुमकिन है। कई बार अधिकारियों के सामने गिड़गिड़ाए, रो-रोकर फरियाद की, लेकिन किसी ने हमारी सुध नहीं ली।

कलेक्ट्रेट के चक्कर काटे, लेकिन मिला सिर्फ आश्वासन

ग्रामीणों का कहना है कि वे नाली और सड़क की मांग को लेकर दर्जनों बार जिलाधिकारी कार्यालय का घेराव कर चुके हैं और शिकायती पत्र दे चुके हैं। हर बार सिर्फ जांच और आश्वासन का भरोसा मिलता है, लेकिन जमीनी स्तर पर नतीजा शून्य ही रहता है। मुख्यालय की नाक के नीचे 60 सालों से नारकीय जीवन जी रहे इन ग्रामीणों का अब सिस्टम से भरोसा उठने लगा है। सवाल यह है कि स्मार्ट होती व्यवस्था की नजर इस उपेक्षित बस्ती तक कब पहुंचेगी?

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✍️Sandeep

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