स्वस्थ एवं मजबूत लोकतंत्र के लिए सरकारी कर्मचारियों और अधिकारियों की तरह वेतनभोगी जनप्रतिनिधियों की भी जवाबदेही तय होनी चाहिए। सत्ता जनता के लिए होती है, जनता सत्ता के लिए नहीं। जनता ही चुनाव में वोट देती है और हर महीने टैक्स भी भरती है। इसके बदले में जनता उम्मीद करती है कि उनके बच्चों को अच्छी शिक्षा मिले, बीमार होने पर इलाज हो, सड़कें ठीक हों और सरकारी दफ्तरों में काम काज समय से होता रहे।
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इस पूरी व्यवस्था को चलाने की जिम्मेदारी उन लोगों पर है, जिन्हें जनता चुनकर भेजती है। प्रजातंत्र में जनता केवल वोट देने वाली भीड़ नहीं, बल्कि शासन की वास्तविक नियामक होती है, इसलिए यह अपेक्षा स्वाभाविक है कि सभी वेतनभोगी जनप्रतिनिधि जिसमें मंत्री, सांसद, विधायक सभी शामिल हैं, अपने दायित्वों के प्रति उतने ही जवाबदेह हों जितने कि सरकारी अधिकारी और कर्मचारी होते हैं।
जब उनकी लापरवाही पर अनुशासनात्मक कार्रवाई, वेतन रोकने या निलंबन जैसे कदम उठाए जा सकते हैं तो जनप्रतिनिधियों की कार्यप्रणाली का भी स्पष्ट मूल्यांकन होना चाहिए। उन्हें भी सरकारी अधिकारियों व कर्मचारियों की तरह वेतन, भत्ते, आवास, यात्रा और पेंशन जैसी सुविधाएं मिलती हैं। ऐसे में जब एक सरकारी कर्मी से काम का हिसाब मांगा जा सकता है तो जनता के पैसे से वेतन लेने वाले जनप्रतिनिधियों से उनके काम का हिसाब क्यों नहीं मांगा जाना चाहिए ? लोकतंत्र की मजबूती के लिए ये जरूरी है।
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पिछले कुछ समय में शिक्षा, स्वास्थ्य और प्रशासन से जुड़े कई मुद्दों पर संसद और सड़क दोनों जगह बहस हुई है। केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान को लेकर उठे प्रश्नों ने राजनीतिक जवाबदेही पर नई बहस छेड़ दी है। यदि किसी मंत्रालय में लगातार प्रशासनिक चुनौतियाँ, विवाद या कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े होते हैं तो लोकतांत्रिक व्यवस्था में संबंधित मंत्री से नैतिक और प्रशासनिक जिम्मेदारी की अपेक्षा की जाती है। हालांकि किसी भी व्यक्ति को दोषी ठहराना न्यायिक प्रक्रिया का विषय है, लेकिन शासन की सफलता या विफलता के लिए राजनीतिक जवाबदेही सरकार की जिम्मेदारी होती है।
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हालांकि किसी एक व्यक्ति पर तुरंत आरोप लगाना उचित नहीं है क्योंकि दोष तय करना अदालत का काम है, लेकिन इससे बड़ा सवाल यह है कि जब किसी मंत्रालय या विभाग में बार-बार पेपर लीक, भर्ती में देरी, नीतियों को लागू करने में चूक या विवाद सामने आते हैं, तो राजनीतिक स्तर पर नैतिक जिम्मेदारी कौन लेगा। लोकतांत्रिक व्यवस्था में सरकार की सफलता और असफलता दोनों की जिम्मेदारी मंत्रिमंडल की सामूहिक जिम्मेदारी मानी जाती है। अगर इस सिद्धांत को केवल कागज पर रहने दिया जाए और व्यवहार में लागू न किया जाए तो जनता का भरोसा धीरे-धीरे टूटता है।
जनप्रतिनिधियों को मिलने वाली सुविधाएं सीधे जनता के कर से आती हैं। ऐसे में यह स्वाभाविक मांग है कि उनके काम का नियमित और सार्वजनिक मूल्यांकन हो। इसके लिए कुछ ठोस कदम उठाए जा सकते हैं। संसद और विधानसभाओं में उपस्थिति, प्रश्न पूछना, बहस में भाग लेना, इन सबका त्रैमासिक रिकॉर्ड सार्वजनिक किया जाए। हर सांसद और विधायक साल में दो बार अपने क्षेत्र में किए गए काम, खर्च की गई निधि और अधूरे पड़े वादों की रिपोर्ट अपनी वेबसाइट या सरकारी पोर्टल पर डाले।
हर महीने एक तय दिन क्षेत्र में जन सुनवाई हो और उसमें आए मुद्दों और उनके समाधान का ब्योरा भी सार्वजनिक हो। वेतन, भत्ते, यात्रा और अन्य खर्चों का पूरा हिसाब हर साल एक जगह उपलब्ध हो ताकि कोई भी नागरिक देख सके कि उसके पैसे का उपयोग कैसे हुआ। इसके साथ एक स्वतंत्र आचार समिति हो जो शिकायतों की निष्पक्ष जांच कर सके और जरूरत पड़ने पर कार्रवाई की सिफारिश कर सके।
दुनिया के कई देशों में सांसदों के वोट, हाजिरी और बहस में भागीदारी का पूरा डेटा ऑनलाइन मिल जाता है। कुछ जगह जनता को बीच कार्यकाल में प्रतिनिधि को वापस बुलाने का अधिकार भी है। भारत में भी बड़े घोटालों या विफलताओं के बाद जांच और इस्तीफे हुए हैं, लेकिन यह प्रक्रिया लगातार नहीं है। इसे अपवाद से नियम बनाना होगा।
जवाबदेही का मतलब यह नहीं कि हर नीतिगत मतभेद पर हंगामा किया जाए। राजनीति में असहमति स्वाभाविक है। असली कसौटी यह है कि प्रतिनिधि कितनी ईमानदारी से प्रयास कर रहा है, कितना पारदर्शी है और नतीजा क्या दे रहा है। मेहनत करने वाले को जनता समझती है, लेकिन लापरवाही और उदासीनता को भी जनता लंबे समय तक बर्दाश्त नहीं करती।
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सत्ता सेवा के लिए है, रौब ग़ालिब करने के लिए नहीं
सत्ता सेवा का माध्यम है, आराम और रुतबे का जरिया नहीं। जब तक मंत्री, सांसद, विधायक और अधिकारी व कर्मचारी सभी के लिए कानून और उत्तरदायित्व का एक जैसा पैमाना नहीं होगा, तब तक लोकतंत्र पूरी तरह मजबूत नहीं हो सकता। इसके लिए जनता को भी दलगत सोच से ऊपर उठकर समान जवाबदेही की मांग करनी होगी। अगर ऐसा हुआ तो सरकारें अधिक पारदर्शी बनेंगी, काम की गति बढ़ेगी और सबसे जरूरी, आम आदमी का विश्वास फिर से लोकतंत्र में लौटेगा।
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