रांची, झारखंड : गुजरात में रजिस्टर्ड लेकिन अनरिकॉग्नाइज्ड राजनीतिक दलों को मिलने वाले कथित भारी-भरकम चंदे को लेकर अब गंभीर सवाल उठने लगे हैं। एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में इन पार्टियों की गतिविधियों, उनके कार्यालयों और बैंक खातों में मौजूद बड़ी रकम को लेकर चुनाव आयोग, आयकर विभाग और जांच एजेंसियों से जांच की मांग की गई है। ये मांग झामुमो के केंद्रीय महासचिव और प्रवक्ता विनोद पांडेय ने की है।
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10 पार्टियां, सैकड़ों करोड़ का चंदा और राजनीतिक गतिविधि नदारद!
विनोद पांडेय ने दावा किया कि गुजरात में करीब 10 ऐसी राजनीतिक पार्टियां हैं, जो चुनावी राजनीति में सक्रिय नजर नहीं आतीं, लेकिन 2023-24 के दौरान उन्हें करोड़ों रुपये का चंदा मिला। इनमें से छह पार्टियों के कार्यालय अहमदाबाद में हैं।
दफ्तर पर ताला, खाते में करोड़ों!
प्रेस कॉन्फ्रेंस में दावा किया गया कि कुछ पार्टियों के कार्यालय दुकानों या फ्लैट के एक कमरे में हैं और कई जगहों पर कार्यालय बंद मिले। आरोप है कि इन दलों की कोई खास राजनीतिक गतिविधि भी दिखाई नहीं देती। इसके बावजूद इनके बैंक खातों में करोड़ों रुपये हैं।
किसी के खाते में ₹1000 करोड़ तो किसी के पास ₹950 करोड़!
विनोद पांडेय ने दावा किया कि कुछ पार्टियों के बैंक खातों में करीब ₹1000 करोड़, ₹950 करोड़ और ₹620 करोड़ तक की रकम है। सबसे कम रकम वाली पार्टी के खाते में भी करीब ₹138 करोड़ होने का दावा किया।
₹1045 करोड़ का चंदा… और करीब ₹900 करोड़ खर्च!
लोकशाही सत्ता पार्टी का उदाहरण देते हुए दावा किया कि 2023-24 में उसे करीब ₹1045 करोड़ मिले। साथ ही पार्टी की ओर से करीब ₹900 करोड़ से ज्यादा खर्च दिखाए गए। इसी को लेकर सवाल उठाया कि इतनी बड़ी रकम कहां से आई और इसे कहां खर्च किया गया?
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‘इन पार्टियों को इतना चंदा कौन दे रहा है?’
सबसे बड़ा सवाल चंदा देने वालों को लेकर उठाया है। जब संबंधित पार्टियां चुनाव नहीं लड़ रही हैं और उनकी राजनीतिक गतिविधियां सार्वजनिक तौर पर नजर नहीं आतीं, तो उन्हें इतनी बड़ी रकम देने वाले लोग और संस्थाएं कौन हैं?
क्या ‘शेल कंपनियों’ की तरह ‘शेल पार्टियों’ का भी इस्तेमाल?
विनोद पांडेय ने राजनीतिक दलों की तुलना शेल कंपनियों से करते हुए आशंका जताई कि कहीं इन पार्टियों का इस्तेमाल बड़े पैमाने पर धन के लेन-देन के लिए तो नहीं किया जा रहा। हालांकि, इस आशंका की पुष्टि के लिए आधिकारिक जांच और दस्तावेजी सबूत जरूरी होंगे।
मनी लॉन्ड्रिंग का मामला है तो जांच क्यों नहीं?
प्रवक्ता ने सवाल उठाया कि अगर इन राजनीतिक दलों के जरिए संदिग्ध तरीके से धन का लेन-देन हो रहा है, तो क्या यह मनी लॉन्ड्रिंग का मामला हो सकता है? साथ ही प्रवर्तन निदेशालय, आयकर विभाग और अन्य जांच एजेंसियों से मामले को संज्ञान में लेने की मांग की।
क्या राजनीतिक खरीद-फरोख्त में इस्तेमाल हो रहा पैसा?
प्रेस कॉन्फ्रेंस में यह आशंका भी जताई कि कहीं इस तरह के धन का इस्तेमाल विधायक-सांसदों की खरीद-फरोख्त या राजनीतिक दलों को तोड़ने जैसी गतिविधियों में तो नहीं किया जा रहा है।
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चुनाव आयोग पर सीधा सवाल, ‘आयोग चुप क्यों?’
प्रवक्ता ने चुनाव आयोग की भूमिका पर सवाल उठाते हुए कहा कि राजनीतिक दलों को मिलने वाला चंदा और चुनावी खर्च आयोग के समक्ष प्रस्तुत किया जाता है। ऐसे में अगर किसी पार्टी की गतिविधियों और वित्तीय लेन-देन को लेकर सवाल सामने आ रहे हैं, तो जांच क्यों नहीं हो रही?
पार्टी अध्यक्ष और कोषाध्यक्ष का पता तक नहीं?
विनोद पांडेय ने दावा किया कि कुछ पार्टियों के अध्यक्ष, ट्रेजरर और कार्यालय को लेकर भी स्पष्ट जानकारी सामने नहीं आती। सवाल उठाया कि जब पार्टी का नेतृत्व और राजनीतिक गतिविधियां स्पष्ट नहीं हैं, तो उसे करोड़ों रुपये का चंदा कैसे मिल रहा है?
बिहार से गुजरात तक पहुंची एक पार्टी का भी जिक्र
प्रेस कॉन्फ्रेंस में एक ऐसी पार्टी का जिक्र किया, जिसका पहले बिहार में कार्यालय था। दावा किया कि पार्टी की पूर्व अध्यक्ष बाद में भारतीय जनता पार्टी से जुड़ गईं और बाद में नए नेतृत्व के आने के बाद पार्टी गुजरात में शिफ्ट हो गई।
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