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पुस्तक समीक्षा : प्रेम के मानकों को परिभाषित करती इस्मत चुगताई की ‘सौदाई’

इस अंश में हम उर्दू की मशहूर शायरा इस्मत चुग़ताई के लघु उपन्यास 'सौदाई' की बात करेंगे

By Tejaswita Upadhyay 
Updated Date

पागल , झक्की, सनकी या फिर कहें सौदाई। जी हाँ आज हम रोती,बिलखती लड़कियों को अपनी कहानियों का हिस्सा कभी ना बनाने वाली उर्दू की मशहूर शायरा इस्मत चुग़ताई की कहानी ‘सौदाई ’ की बात करेंगे।सौदाई को कई भाषाओं में अनुवाद किया गया है। ‘सौदाई’ का हिंदी अनुवादन शकील सिद्द्की ने किया है।

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इस्मत चुग़ताई की कहानियों ने हमेशा समाज को आईना दिखाने का काम किया है। ‘सौदाई’ इस्मत की एक लघु उपन्यास है जो दो भाइयों के इर्द गिर्द घूमती है। दोनों भाई अपने नामों के तरह ही एक दूजे से बिल्कुल अलग है, चंदर और सूरज। इस कहानी में एक और अहम् पात्र है, ‘चांदनी।’ चांदनी समाज के बनाये औरत के हर ढांचे को तोड़ती एक जिंदादिल लड़की है।

यह कहानी प्रेम और जुनूनी प्रेम के अंतर को बखूबी दर्शाती है। पागलपन, जुनूनियत के हर पहलू पर यह कहानी तीखा प्रहार करती है।कहानी में चुग़ताई यह समझाने में सफल रहीं हैं कि कैसे किसी मनुष्य को खुदा बना देना, उसके और उसके आसपास के लोगों के लिए घातक हो जाता है। बेहतर होता है इंसान को इंसान बने रहने देना। इस्मत के इस उपन्यास में मानसिक स्वास्थ्य की भी झलक कई जगह दिखती है। जब कहानी का एक पात्र अपने जुनूनियत को अंजाम देने के दौरान मदद की गुहार करता है। उदाहरण के लिए इस कहानी का यह अंश ही देखिये –

बड़े सरकार की नज़रें झुक गईं, उनके हाथ से पिस्तौल छूट पड़ा और दूसरे ही क्षण उसकी गोद में सिर डालकर बच्चों की तरह सिसकने लगे-
“ऊषा रानी हमें-हमें बचा लो। ऊषा हमसे शादी कर लो,अभी,इसी वक्त। ऊषा- वरना- मैं पागल हो जाऊंगा। मेरा दिमाग फट जायेगा, ऊषा मुझे बचा लो” 

जुनूनियत सही गलत, रिश्तों की मर्यादा, औरत की आबरू और खुद को दिखने वाले सारे आइनों पर पर्दा डाल देता है। यह उपन्यास दर्शाता है की कैसे रूतबा और ताकत के बांट में बंधा पुरूष अपने पागलपन का शिकार एक लड़की को बनाने की कोशिश करता है। जटिल सामंती जातिवाद से जकड़ा पुरुष औरत को पराजित कर पाता है या नहीं यह आपको उपन्यास पढ़ कर पता लगेगा। पर जो आपको अभी पता होना चाहिए वो यह है कि पूर्ण संभावना है कि कहानी का अंतिम पन्ना आपके आंसूओं से भीग जाएगा।

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इस्मत ने यह उपन्यास 1966 में लिखा था यह तब के समाज को दर्शाता है। आप उपन्यास पढ़ेंगे तो जानेगें की तबसे लेकर अब तक इस दमनकारी पुरूष प्रधान समाज जहाँ औरतों के आबरू से रोज खिलवाड़ होता है उसमें कुछ भी नहीं बदला। यह समाज आज भी वहीं का वहीं है।

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