Census 2027 : भारत की जनगणना 2027 केवल देश की आबादी गिनने की प्रक्रिया नहीं है। यह लंबे अंतराल के बाद भारत की बदलती जनसांख्यिकीय तस्वीर सामने लाने वाली एक महत्वपूर्ण राष्ट्रीय प्रक्रिया होगी।✍️Alok Agrhari
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Census 2027 : भारत की जनगणना 2027 केवल देश की आबादी गिनने की प्रक्रिया नहीं है। यह लंबे अंतराल के बाद भारत की बदलती जनसांख्यिकीय तस्वीर सामने लाने वाली एक महत्वपूर्ण राष्ट्रीय प्रक्रिया होगी। वर्ष 2021 में होने वाली जनगणना कोविड-19 महामारी के कारण टल गई थी। अब 2027 में होने वाली जनगणना वर्ष 2011 के बाद देश को नई व्यापक जनसंख्या संबंधी तस्वीर देगी।
डिजिटल जनगणना, स्वयं गणना और व्यापक जातिगत गणना जैसे महत्वपूर्ण बदलावों के कारण जनगणना 2027 का महत्व और बढ़ गया है। इसके आंकड़े आने वाले समय में सरकारी योजनाओं, संसाधनों के वितरण, सामाजिक नीतियों, चुनावी प्रतिनिधित्व और परिसीमन की बहस को प्रभावित कर सकते हैं।
किसी भी देश के लिए यह जानना जरूरी है कि उसकी आबादी कितनी है, लेकिन आधुनिक शासन में केवल आबादी की संख्या जानना पर्याप्त नहीं है। सरकार को यह भी जानना होता है कि उनकी शिक्षा का स्तर क्या है? वे किस प्रकार का काम करते हैं? एक स्थान से दूसरे स्थान पर कितना और क्यों जाते हैं? ग्रामीण और शहरी आबादी का अनुपात कैसे बदल रहा है? देश की सामाजिक और जनसांख्यिकीय संरचना किस दिशा में जा रही है? इन्हीं सवालों के जवाब देने में जनगणना की महत्वपूर्ण भूमिका होती है।
जनगणना का संबंध केवल आंकड़ों से नहीं है। इसका सीधा संबंध शासन, कल्याणकारी योजनाओं, आधारभूत ढांचे, सामाजिक न्याय, संघीय व्यवस्था, चुनावी प्रतिनिधित्व और परिसीमन से भी है।
भारत में आबादी और परिवारों से जुड़ी जानकारी जुटाने की परंपरा बहुत पुरानी है। प्राचीन प्रशासनिक ग्रंथों और मुगलकालीन दस्तावेजों में भी जनसंख्या, भूमि, राजस्व और परिवारों से जुड़ी सूचनाओं के उदाहरण मिलते हैं। हालांकि, इन्हें आधुनिक अर्थों में वैज्ञानिक और पूरे देश में एक साथ होने वाली जनगणना नहीं कहा जा सकता।
वर्ष 1872 में पहली बार भारत के बड़े हिस्से में जनगणना का प्रयास किया गया। हालांकि अलग-अलग क्षेत्रों में अलग-अलग समय पर लोगों की गणना हुई। इसलिए इसे भारत की पहली असमकालिक जनगणना पहल माना जाता है।
वर्ष 1881 भारत के जनगणना इतिहास में एक महत्वपूर्ण पड़ाव माना जाता है। पहली बार पूरे भारत में एक समान संदर्भ समय के आधार पर जनगणना की गई। इसके बाद हर दस वर्ष में जनगणना कराने की परंपरा स्थापित हुई। यही परंपरा आगे चलकर भारत की नियमित जनगणना व्यवस्था का आधार बनी।
भारत के जनसांख्यिकीय इतिहास में वर्ष 1921 को विशेष महत्व प्राप्त है। इस समय के आसपास देश की जनसंख्या वृद्धि के स्वरूप में महत्वपूर्ण बदलाव दिखाई दिया। इसी कारण 1921 को अक्सर भारतीय जनसांख्यिकी के महान विभाजन के रूप में संदर्भित किया जाता है।
भारत में जातिगत आंकड़ों को लेकर आज होने वाली चर्चा को समझने के लिए वर्ष 1931 की जनगणना महत्वपूर्ण ऐतिहासिक संदर्भ है।औपनिवेशिक काल की जनगणना में जाति और समुदाय से जुड़ी विस्तृत जानकारी दर्ज की जाती थी। स्वतंत्र भारत में अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों की गणना जारी रही, लेकिन सभी जातियों की व्यापक गणना नियमित जनगणना का हिस्सा नहीं रही। इसी ऐतिहासिक अंतर के कारण आज जातिगत आंकड़ों की मांग के संदर्भ में 1931 की जनगणना का उल्लेख बार-बार किया जाता है।

आजादी के बाद पहली जनगणना वर्ष 1951 में हुई। इसके साथ जनगणना स्वतंत्र भारत की प्रशासनिक और सांख्यिकीय व्यवस्था का नियमित हिस्सा बन गई। इसके बाद : 1951 → 1961 → 1971 → 1981 → 1991 → 2001 → 2011 तक हर दस वर्ष में जनगणना होती रही।
भारत में जनगणना व्यवस्था को धीरे-धीरे एक स्थायी संस्थागत ढांचे में विकसित किया गया। आज जनगणना का प्रमुख संस्थागत प्राधिकरण है:
भारत के महापंजीयक एवं जनगणना आयुक्त का कार्यालय
यह कार्यालय गृह मंत्रालय के प्रशासनिक ढांचे के अंतर्गत कार्य करता है।
स्वतंत्र भारत में जनगणना को कानूनी आधार जनगणना अधिनियम, 1948 से मिलता है। इसके साथ जनगणना नियम, 1990 भी महत्वपूर्ण हैं। जनगणना से जुड़े प्रश्न, लोगों की गणना और आधिकारिक प्रक्रिया इसी कानूनी व्यवस्था के अंतर्गत संचालित होती है।
भारतीय संविधान के अनुच्छेद 246 के तहत जनगणना का विषय सातवीं अनुसूची की संघ सूची की प्रविष्टि 69 में आता है। इसे सरल रूप में ऐसे समझ सकते हैं: अनुच्छेद 246 → सातवीं अनुसूची → संघ सूची → प्रविष्टि 69 → जनगणना
जनगणना अधिनियम के अंतर्गत जनगणना से संबंधित जानकारी देना केवल सामान्य नागरिक प्रक्रिया नहीं है। यह कानूनी व्यवस्था का हिस्सा है। इसलिए जनगणना को सामान्य राय या स्वैच्छिक सर्वेक्षण समझना सही नहीं होगा।
जनगणना में नागरिकों द्वारा दी गई व्यक्तिगत जानकारी के लिए कानूनी गोपनीयता व्यवस्था है। यह समझना जरूरी है कि व्यक्तिगत जनगणना अभिलेख और सरकार द्वारा प्रकाशित समेकित आंकड़े अलग-अलग होते हैं। सरकार आबादी, साक्षरता, लिंगानुपात जैसे समेकित आंकड़े प्रकाशित कर सकती है, जबकि व्यक्तिगत स्तर पर दर्ज जानकारी को कानूनी संरक्षण प्राप्त रहता है।
वर्ष 2011 भारत की अब तक की अंतिम पूर्ण राष्ट्रीय जनगणना है। वर्ष 2021 में अगली जनगणना होनी थी, लेकिन कोविड-19 महामारी के कारण इसे टालना पड़ा। इसका परिणाम यह हुआ कि भारत को 2011 → 2027 के बीच लगभग 16 वर्षों का बड़ा जनसांख्यिकीय अंतर देखने को मिला। इन वर्षों में :
इसलिए जनगणना 2027 भारत की नई जनसांख्यिकीय आधाररेखा तैयार करेगी।
उपलब्ध सामग्री के अनुसार जनगणना 2027 को वर्ष 2011 के बाद होने वाली 16वीं राष्ट्रीय जनगणना के रूप में प्रस्तुत किया गया है। इस बार जनगणना में कागजी प्रक्रिया के साथ डिजिटल व्यवस्था और स्वयं गणना जैसी सुविधाओं पर विशेष जोर होगा।
जनगणना 2027 को मुख्य रूप से दो चरणों में समझा जा सकता है।
इस चरण में घरों और आवासीय सुविधाओं से जुड़ी जानकारी एकत्र की जाएगी। समय: अप्रैल से सितंबर 2026
इस चरण में प्रत्येक परिवार में रहने वाले लोगों से जुड़ी जनसांख्यिकीय जानकारी दर्ज की जाएगी। समय : फरवरी 2027…इसे सरल भाषा में ऐसे समझें : पहले घरों की जानकारी, फिर लोगों की गणना।
सरकार को पहले यह जानना जरूरी है कि
इसके बाद यह दर्ज किया जाता है कि उन मकानों में कितने लोग रहते हैं।इसलिए मकान सूचीकरण केवल मकानों की गिनती नहीं है। यह आगे होने वाली जनसंख्या गणना की आधारभूत प्रक्रिया है।
उपलब्ध सामग्री के अनुसार आवास और परिवारों से जुड़ी कई महत्वपूर्ण जानकारियां दर्ज की जा सकती हैं। इनमें प्रमुख रूप से :
जैसी जानकारी शामिल है। इन आंकड़ों से सरकार को देश में आवास और मूलभूत सुविधाओं की स्थिति समझने में मदद मिलेगी।
दूसरे चरण में प्रत्येक व्यक्ति से जुड़ी जनसांख्यिकीय जानकारी दर्ज की जाएगी। इसमें प्रमुख रूप से:
जैसी जानकारी महत्वपूर्ण होगी। वर्ष 2027 की विस्तृत व्यवस्था में राष्ट्रीयता, माता-पिता, धर्म, डिजिटल साक्षरता और अन्य विशेषताओं से जुड़े विषयों का भी उल्लेख किया गया है।
यदि जनगणना 2027 को लेकर सबसे अधिक चर्चा किसी एक विषय पर हुई है, तो वह है, जातिगत जनगणना।
जनगणना 2027 में अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति तक सीमित गणना के बजाय व्यापक जातिगत जानकारी को शामिल करने की दिशा में महत्वपूर्ण बदलाव किया गया है।
भारत में सामाजिक न्याय और कल्याणकारी नीतियों के लिए सामाजिक तथा आर्थिक स्थिति से जुड़े विश्वसनीय आंकड़े महत्वपूर्ण हैं। जातिगत आंकड़ों से यह समझने में मदद मिल सकती है कि:
इसलिए जातिगत जनगणना को केवल राजनीतिक विषय के रूप में देखना पर्याप्त नहीं होगा। यह तथ्य आधारित सामाजिक नीति से भी जुड़ा विषय है।
जनगणना 2011 और सामाजिक-आर्थिक एवं जाति जनगणना 2011 एक ही प्रक्रिया नहीं थीं। सामाजिक-आर्थिक एवं जाति जनगणना का मुख्य उद्देश्य सामाजिक-आर्थिक स्थिति और वंचना की पहचान से जुड़ा था, जबकि जनसंख्या जनगणना की अपनी अलग कानूनी व्यवस्था है।
भारत की प्रशासनिक व्यवस्था तेजी से डिजिटल हो रही है। जनगणना भी इसी बदलाव से जुड़ रही है। डिजिटल व्यवस्था से संभावित लाभ हैं:
उपलब्ध सामग्री में जनगणना 2027 को डिजिटल और स्वयं गणना व्यवस्था से जोड़ा गया है।
स्वयं गणना का अर्थ है कि नागरिकों को डिजिटल माध्यम से अपनी जनगणना संबंधी जानकारी स्वयं दर्ज करने का विकल्प दिया जा सकता है। हालांकि इसका अर्थ यह नहीं है कि गणना करने वाले कर्मचारियों की भूमिका समाप्त हो जाएगी। बल्कि, डिजिटल स्वयं गणना + क्षेत्रीय गणना, दोनों जनगणना व्यवस्था का हिस्सा रहेंगे।
तकनीक कई समस्याओं का समाधान करती है, लेकिन इसके साथ नई चुनौतियां भी आती हैं।
डिजिटल अंतर: भारत में हर व्यक्ति समान रूप से डिजिटल सुविधाओं से जुड़ा नहीं है।
इंटरनेट और संपर्क: दूरदराज और दुर्गम क्षेत्रों में नेटवर्क की समस्या हो सकती है।
आंकड़ों की सुरक्षा: करोड़ों परिवारों की जानकारी को सुरक्षित रखना बड़ी जिम्मेदारी होगी।
आंकड़ों की शुद्धता: डिजिटल माध्यम अपने आप आंकड़ों को सही नहीं बनाता।
पलायन: किसी व्यक्ति का स्थायी निवास और वर्तमान कार्यस्थल अलग-अलग हो सकता है।
इसलिए जनगणना 2027 की वास्तविक सफलता केवल डिजिटल व्यवस्था बनाने में नहीं, बल्कि सटीक, सुरक्षित और समावेशी आंकड़े जुटाने में होगी।
जम्मू-कश्मीर, लद्दाख, हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड के कुछ बर्फीले क्षेत्रों में मौसम सामान्य जनगणना कार्यक्रम से अलग होता है। भारी बर्फबारी के कारण फरवरी में सामान्य गणना करना कठिन हो सकता है। इसलिए ऐसे क्षेत्रों में पहले गणना कराने की व्यवस्था रखी जाती है।
जनगणना 2027 के लिए आधिकारिक संदर्भ तिथि: 1 मार्च 2027, रात 12 बजे निर्धारित की गई है। इसका अर्थ है कि सामान्य जनसंख्या गणना के दौरान देश की आबादी की स्थिति को 1 मार्च 2027 की शुरुआत के समय के आधार पर दर्ज किया जाएगा। सामान्य जनसंख्या गणना फरवरी 2027 में होगी।
बर्फीले क्षेत्रों में मौसम और भौगोलिक परिस्थितियों को देखते हुए गणना पहले कराई जा सकती है। उपलब्ध सामग्री के अनुसार ऐसे क्षेत्रों में अग्रिम गणना सितंबर 2026 में होगी।महत्वपूर्ण बात यह है कि गणना पहले हो सकती है, लेकिन संदर्भ तिथि 1 मार्च 2027 ही रहेगी।
जनगणना की कहानी केवल आबादी गिनने तक सीमित नहीं है। जनगणना 2027 और परिसीमन का संबंध इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि नई जनसंख्या जानकारी भविष्य में निर्वाचन क्षेत्रों के पुनर्निर्धारण के लिए महत्वपूर्ण आधार बन सकती है।
सरल भाषा में, जनसंख्या के वितरण और संवैधानिक व्यवस्था के अनुसार लोकसभा और विधानसभा निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाओं का पुनर्निर्धारण परिसीमन कहलाता है। जैसे-जैसे अलग-अलग क्षेत्रों की आबादी बदलती है, चुनावी क्षेत्रों का संतुलन भी बदल सकता है, लेकिन भारत में परिसीमन केवल गणित का विषय नहीं है।
लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व + संघीय संतुलन + जनसंख्या नीति तीनों जुड़े हुए हैं।
मान लीजिए दो राज्यों की आबादी है:
राज्य A — 5 करोड़
राज्य B — 10 करोड़
यदि दोनों को समान प्रतिनिधित्व मिलता है, तो प्रत्येक निर्वाचित प्रतिनिधि के पीछे नागरिकों की संख्या अलग होगी। यहीं से समान प्रतिनिधित्व का सवाल उठता है, लेकिन दूसरी ओर यदि जो राज्य जनसंख्या नियंत्रण में बेहतर प्रदर्शन कर रहे हैं, उन्हें केवल आबादी बढ़ने के कारण राजनीतिक प्रतिनिधित्व में नुकसान होने लगे, तो इससे जनसंख्या स्थिरीकरण की नीति पर विपरीत असर पड़ सकता है। भारत ने इसी संतुलन को ध्यान में रखते हुए परिसीमन को लंबे समय तक स्थगित रखा।
1971 की जनगणना के बाद जनसंख्या के आधार पर राजनीतिक प्रतिनिधित्व में बदलाव को रोकने की संवैधानिक नीति सामने आई। इसका उद्देश्य था कि जो राज्य जनसंख्या स्थिरीकरण में बेहतर प्रदर्शन कर रहे हैं, उन्हें केवल आबादी बढ़ने के आधार पर राजनीतिक प्रतिनिधित्व में नुकसान न हो। जनसंख्या नियंत्रण बनाम राजनीतिक प्रतिनिधित्व का संवैधानिक संतुलन महत्वपूर्ण बन गया।
वर्ष 1976 में 42वें संविधान संशोधन के माध्यम से लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में जनसंख्या के आधार पर पुनर्समायोजन से जुड़े रोक को आगे बढ़ाया गया। इसके पीछे व्यापक उद्देश्य यह था कि जनसंख्या स्थिरीकरण की दिशा में अच्छा प्रदर्शन करने वाले राज्यों को राजनीतिक रूप से नुकसान न हो।
84वें संविधान संशोधन अधिनियम, 2001 ने परिसीमन और पुनर्समायोजन से जुड़े रोक को वर्ष 2026 के बाद होने वाली पहली जनगणना तक आगे बढ़ाने का संवैधानिक आधार बनाया। यही वह व्यवस्था है जो जनगणना 2027 को भविष्य के परिसीमन से सीधे जोड़ती है।
वर्ष 2003 का 87वां संविधान संशोधन भी महत्वपूर्ण है। इसके माध्यम से निर्वाचन क्षेत्रों के क्षेत्रीय पुनर्समायोजन से जुड़े संदर्भ में वर्ष 2001 की जनगणना के आंकड़ों के उपयोग की व्यवस्था की गई। इसे 84वें संशोधन में किए गए परिसीमन रोक से अलग समझना जरूरी है।
84वां संशोधन → 2026 के बाद पहली जनगणना तक रोक की व्यवस्था
87वां संशोधन → क्षेत्रीय पुनर्समायोजन में 2001 की जनसंख्या के आंकड़ों का उपयोग
यहां दो अलग बातें समझना जरूरी है।
पहली बात: 2021 की जनगणना हुई ही नहीं।
दूसरी बात: संवैधानिक रोक 2026 के बाद होने वाली पहली जनगणना से जुड़ी थी।
इसलिए यह कहना सही नहीं होगा कि 2021 की जनगणना हो जाती तो उसी वर्ष परिसीमन हो जाता। ऐसा नहीं था। प्रमुख पुनर्समायोजन की संवैधानिक व्यवस्था 2026 के बाद होने वाली पहली जनगणना से जुड़ी थी। कोविड-19 महामारी के कारण 2021 की जनगणना नहीं हो सकी। इस कारण 2027 की जनगणना अब इस संवैधानिक समय-सीमा के बाद होने वाली पहली राष्ट्रीय जनगणना बनती है।
यह अंतर समझना बहुत जरूरी है।
जनगणना → आबादी के आंकड़े तैयार करती है।
परिसीमन → अलग संवैधानिक और कानूनी प्रक्रिया है।
इसलिए जनगणना 2027 को भविष्य के परिसीमन का आंकड़ा आधार कहना अधिक सही होगा। पहले जनगणना के आंकड़े तैयार होंगे, फिर उनका प्रकाशन होगा और इसके बाद संबंधित संवैधानिक एवं कानूनी प्रक्रिया के अनुसार परिसीमन आगे बढ़ेगा।
नई जनगणना के बाद यदि कुछ राज्यों की आबादी तेजी से बढ़ी हुई दिखाई देती है और कुछ राज्यों ने जनसंख्या वृद्धि को काफी नियंत्रित किया है, तो राजनीतिक प्रतिनिधित्व के पुनर्संतुलन का सवाल उठेगा। इसमें तीन प्रमुख सिद्धांत सामने आ सकते हैं:
यही भविष्य के परिसीमन की सबसे महत्वपूर्ण बहसों में से एक हो सकती है।
भारत के कई दक्षिणी राज्यों ने लंबे समय से जनसंख्या स्थिरीकरण में बेहतर प्रदर्शन किया है। दूसरी ओर कुछ राज्यों में आबादी की वृद्धि अपेक्षाकृत अधिक रही है। यदि भविष्य में राजनीतिक प्रतिनिधित्व में जनसंख्या को अधिक महत्व मिलता है, तो राज्यों के बीच प्रतिनिधित्व का संतुलन बदल सकता है। इसी कारण परिसीमन केवल चुनावी क्षेत्रों की सीमाएं बदलने का विषय नहीं है। यह भारतीय संघीय व्यवस्था से भी जुड़ा महत्वपूर्ण प्रश्न है।
जनगणना सीधे संसद की सीटों का निर्धारण नहीं करती। लेकिन जनसंख्या के आंकड़े भविष्य में प्रतिनिधित्व और परिसीमन की संवैधानिक प्रक्रिया के लिए महत्वपूर्ण आधार बनते हैं। इसे इस क्रम में समझा जा सकता है:
जनगणना – जनसंख्या के आंकड़े – परिसीमन प्रक्रिया – निर्वाचन क्षेत्र – राजनीतिक प्रतिनिधित्व – संसद और विधानसभाएं
यही कारण है कि जनगणना 2027 का राजनीतिक महत्व बहुत बड़ा है।
भविष्य में महिला आरक्षण के क्रियान्वयन को भी परिसीमन और जनगणना से जुड़े संवैधानिक ढांचे के संदर्भ में समझना महत्वपूर्ण होगा। इसे सरल रूप में : जनगणना → परिसीमन → निर्वाचन क्षेत्र → प्रतिनिधित्व → महिला आरक्षण के क्रम में समझा जा सकता है। इसलिए जनगणना 2027 का प्रभाव केवल जनसंख्या आंकड़ों तक सीमित नहीं रह सकता।
सरकार को यह जानना जरूरी है कि
इसीलिए जनगणना तथ्य आधारित शासन व्यवस्था का महत्वपूर्ण आधार है।
जनगणना सरकारी सर्वेक्षणों के लिए भी महत्वपूर्ण है। देश में आबादी के वितरण और भौगोलिक इकाइयों की जानकारी सर्वेक्षणों की योजना और नमूना चयन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। इसीलिए जनगणना को भारत की सांख्यिकीय व्यवस्था का आधारभूत आंकड़ा स्रोत माना जाता है। जनगणना में देरी का असर केवल जनगणना की तालिकाओं पर नहीं पड़ता, बल्कि सामाजिक और आर्थिक विश्लेषण की आधाररेखा पर भी पड़ सकता है।
जनसंख्या के आंकड़ों का महत्व वित्तीय संघवाद में भी है। वित्त आयोग राज्यों के बीच संसाधनों के वितरण के लिए कई मानकों का उपयोग करता है, जिनमें जनसंख्या से जुड़े मानक भी महत्वपूर्ण रहे हैं।
लेकिन यह कहना सही नहीं होगा कि वित्त आयोग केवल जनगणना की आबादी के आधार पर ही धन का वितरण करता है। संसाधनों के बंटवारे में कई अन्य मानक भी शामिल होते हैं।
भारत की बदलती जनसांख्यिकीय तस्वीर को समझने में पलायन और शहरीकरण बहुत महत्वपूर्ण हैं। लाखों लोग:
इसलिए जनगणना के सामने बड़ी चुनौती यह होगी कि लोगों के वास्तविक निवास और उनके आवागमन की स्थिति को कितनी सटीकता से दर्ज किया जाता है। ये आंकड़े शहरी नियोजन, परिवहन, आवास और श्रम नीति के लिए महत्वपूर्ण होंगे।
डिजिटल जनगणना के साथ नागरिकों की निजता का सवाल भी महत्वपूर्ण है। करोड़ों परिवारों और व्यक्तियों की जानकारी को:
जनगणना की गोपनीयता व्यवस्था केवल कानूनी आवश्यकता नहीं है। यह जनता के विश्वास की बुनियाद भी है।
जनगणना, राष्ट्रीय जनसंख्या रजिस्टर और राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर तीन अलग-अलग अवधारणाएं हैं।
जनगणना: आबादी की गणना से जुड़ी प्रक्रिया है और इसका कानूनी आधार जनगणना अधिनियम, 1948 है।
राष्ट्रीय जनसंख्या रजिस्टर: यह निवासियों से संबंधित अलग प्रशासनिक व्यवस्था है।
राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर: यह नागरिकों के रजिस्टर से जुड़ी अलग कानूनी अवधारणा है।
इसलिए: Census = NPR = NRC
मानना सही नहीं है। तीनों का उद्देश्य, कानूनी आधार और प्रशासनिक स्वरूप अलग-अलग हैं।
यदि जनगणना 2027 सफलतापूर्वक पूरी होती है तो भारत को लंबे समय के बाद एक नई व्यापक जनसांख्यिकीय तस्वीर मिलेगी।इससे पता चलेगा :
सबसे महत्वपूर्ण सवाल होगा: 2011 के बाद भारत की जनसांख्यिकीय संरचना कितनी बदल चुकी है?
जनगणना जितनी बड़ी होगी, उसका संचालन उतना ही जटिल होगा। करोड़ों परिवारों और विशाल भौगोलिक क्षेत्र में सही आंकड़े जुटाना अपने आप में बड़ी प्रशासनिक चुनौती है। इसके लिए जरूरी होंगे:
प्रशिक्षित गणनाकर्मी + तकनीक + परिवहन व्यवस्था + आंकड़ों की सुरक्षा + नागरिक सहयोग + गुणवत्ता नियंत्रण
जनगणना 2027 की सबसे बड़ी कहानी केवल यह नहीं होगी कि भारत की आबादी कितनी है। इससे कई बड़े सवालों के जवाब मिल सकते हैं:
और जब इन आंकड़ों को संवैधानिक व्यवस्था के साथ देखा जाएगा, तो सबसे बड़ा सवाल सामने आएगा:
यहीं से जनगणना 2027 और परिसीमन की पूरी कहानी जुड़ती है।
भारत की जनगणना यात्रा 1872 के शुरुआती प्रयासों से शुरू होकर 1881 की पहली समकालिक जनगणना और स्वतंत्र भारत की नियमित दस वर्षीय जनगणना व्यवस्था तक पहुंची। वर्ष 2011 तक यह प्रक्रिया लगातार चलती रही, लेकिन कोविड-19 महामारी के कारण 2021 की जनगणना टल गई। अब Census 2027 लंबे अंतराल के बाद भारत की नई जनसांख्यिकीय तस्वीर सामने लाने वाली महत्वपूर्ण प्रक्रिया होगी।
इस जनगणना की खासियत केवल नई आबादी के आंकड़े उपलब्ध कराना नहीं है। डिजिटल व्यवस्था, स्वयं गणना और जातिगत गणना जैसे महत्वपूर्ण बदलाव इसे पिछली जनगणना से अलग बनाते हैं। इसके आंकड़े भविष्य में:
सरकारी नीति → संसाधन वितरण → सामाजिक न्याय → चुनावी प्रतिनिधित्व → परिसीमन → संघीय संतुलन
जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्रों को प्रभावित कर सकते हैं। इसलिए जनगणना 2027 को केवल यह जानने की प्रक्रिया नहीं माना जाना चाहिए कि:
बल्कि यह समझने का अवसर भी है कि
अंततः: जनगणना → जनसांख्यिकी → नीति → परिसीमन → प्रतिनिधित्व → संघवाद की यह पूरी श्रृंखला आने वाले दशक के भारत की सामाजिक, राजनीतिक और प्रशासनिक दिशा को समझने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।
Disclaimer
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✍️Alok Agrhari
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