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SC-ST सब-क्लासिफिकेशन से बदल सकती है भारतीय राजनीति, जानिए सुप्रीम कोर्ट के फैसले का पूरा असर

By HO BUREAU 

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Reservation

Reservation : भारत की आरक्षण व्यवस्था एक बार फिर बड़े बदलाव के दौर से गुजर रही है। हाल के वर्षों में सुप्रीम कोर्ट के महत्वपूर्ण फैसलों ने न केवल आरक्षण की संवैधानिक व्याख्या को नया आयाम दिया है, बल्कि राज्यों को भी यह अवसर दिया है कि वे अनुसूचित जाति (SC) और अनुसूचित जनजाति (ST) के भीतर सबसे अधिक वंचित वर्गों की पहचान कर उन्हें प्राथमिकता दे सकें।

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राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह बदलाव आने वाले वर्षों में केवल सरकारी नौकरियों और शिक्षा तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि राज्यों की चुनावी राजनीति, सामाजिक समीकरण और आरक्षण की पूरी संरचना को प्रभावित कर सकता है।

भारत में आरक्षण व्यवस्था को आकार देने में सुप्रीम कोर्ट की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। संविधान संशोधनों, न्यायिक व्याख्याओं और ऐतिहासिक निर्णयों ने समय-समय पर आरक्षण नीति की दिशा और स्वरूप निर्धारित किया है। आइए जानते हैं आरक्षण से जुड़े प्रमुख फैसलों और वर्तमान कानूनी स्थिति के बारे में।

चंपकम दोरैराजन मामला (1951)

State of Madras v. Champakam Dorairajan (1951) भारत में आरक्षण से संबंधित पहला ऐतिहासिक मामला था।

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सुप्रीम कोर्ट ने तत्कालीन आरक्षण व्यवस्था को असंवैधानिक घोषित किया। इस निर्णय के बाद सरकार ने प्रथम संविधान संशोधन, 1951 के माध्यम से अनुच्छेद 15(4) जोड़ा, जिससे राज्य को सामाजिक एवं शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्गों तथा अनुसूचित जाति (SC) और अनुसूचित जनजाति (ST) के लिए विशेष प्रावधान करने का संवैधानिक अधिकार मिला।

इंद्रा साहनी बनाम भारत संघ (1992) – मंडल आयोग मामला

Indra Sawhney v. Union of India (1992) भारतीय आरक्षण व्यवस्था का सबसे महत्वपूर्ण निर्णय माना जाता है।

सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा—

यह निर्णय आज भी आरक्षण कानून का आधार माना जाता है।

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एम. नागराज बनाम भारत संघ (2006)

Nagaraj v. Union of India (2006) में सुप्रीम कोर्ट ने अनुसूचित जाति (SC) और अनुसूचित जनजाति (ST) के लिए पदोन्नति में आरक्षण को संवैधानिक माना, लेकिन कुछ शर्तें निर्धारित कीं।

राज्य सरकार को यह सिद्ध करना होगा कि :

जरनैल सिंह बनाम लक्ष्मी नारायण गुप्ता (2018)

Jarnail Singh v. Lachhmi Narain Gupta (2018) में सुप्रीम कोर्ट ने महत्वपूर्ण स्पष्टीकरण दिया।

न्यायालय ने कहा:

आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग (EWS) आरक्षण फैसला (2022)

Janhit Abhiyan v. Union of India (2022) में सुप्रीम कोर्ट ने 103वें संविधान संशोधन को संवैधानिक माना। इस निर्णय के प्रमुख बिंदु:

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सुप्रीम कोर्ट का नवीनतम बड़ा फैसला: SC/ST में उप-वर्गीकरण (Sub-classification)

आरक्षण व्यवस्था में हाल के वर्षों का सबसे महत्वपूर्ण निर्णय State of Punjab v. Davinder Singh (2024) माना जा रहा है।

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सुप्रीम कोर्ट की सात-न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने राज्यों को अनुसूचित जाति (SC) और अनुसूचित जनजाति (ST) के भीतर उप-वर्गीकरण (Reservation within Reservation) करने का अधिकार दिया, ताकि आरक्षण का लाभ उन समुदायों तक अधिक प्रभावी ढंग से पहुँच सके जो वास्तव में सबसे अधिक वंचित हैं।इस निर्णय के प्रमुख निष्कर्ष :

यह फैसला SC/ST समुदायों को एक समान मानने की पारंपरिक सोच में महत्वपूर्ण बदलाव का संकेत देता है।

क्रीमी लेयर पर बढ़ती बहस

अब क्रीमी लेयर की चर्चा केवल OBC तक सीमित नहीं रही है। नीतिगत और कानूनी स्तर पर निम्नलिखित प्रश्नों पर लगातार बहस हो रही है –

इन प्रश्नों पर अभी राष्ट्रीय स्तर पर अंतिम नीति नहीं बनी है और भविष्य में न्यायिक निर्णय तथा सरकारी नीतियाँ इस दिशा को निर्धारित करेंगी।

मेरिट बनाम सामाजिक न्याय की बहस

आरक्षण के विषय में सबसे बड़ी बहस मेरिट (योग्यता) और सामाजिक न्याय के बीच संतुलन को लेकर होती रही है। संवैधानिक विशेषज्ञों का मानना है कि केवल परीक्षा के अंकों या प्रतिस्पर्धा के आधार पर योग्यता का मूल्यांकन पर्याप्त नहीं है। जिन लोगों को शिक्षा, संसाधनों और अवसरों तक समान पहुँच नहीं मिली, उनकी प्रतिस्पर्धा स्वाभाविक रूप से असमान होती है। दूसरी ओर यह भी तर्क दिया जाता है कि आरक्षण का वास्तविक लाभ उन समुदायों तक पहुँचना चाहिए जो अब भी सामाजिक और आर्थिक रूप से सबसे अधिक वंचित हैं।

आज भी आरक्षण क्यों आवश्यक माना जाता है?

आरक्षण के समर्थकों के अनुसार यह व्यवस्था इसलिए आवश्यक है, क्योंकि इससे—

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आरक्षण के विरोध में प्रमुख तर्क

आरक्षण के आलोचकों का मानना है कि:

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भविष्य की दिशा

अधिकांश संवैधानिक विशेषज्ञों के अनुसार आने वाले समय में आरक्षण व्यवस्था का फोकस निम्नलिखित बिंदुओं पर होना चाहिए—

भारत की आरक्षण व्यवस्था संविधान संशोधनों, संसद द्वारा बनाए गए कानूनों और सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक निर्णयों के माध्यम से लगातार विकसित होती रही है। आज भी यह सामाजिक न्याय सुनिश्चित करने का एक महत्वपूर्ण संवैधानिक माध्यम है।

हालिया न्यायिक निर्णयों से यह स्पष्ट संकेत मिलता है कि भविष्य की आरक्षण नीति का उद्देश्य केवल आरक्षण देना नहीं, बल्कि यह सुनिश्चित करना होगा कि उसका लाभ वास्तव में सबसे अधिक वंचित और जरूरतमंद समुदायों तक पहुँचे।

आज बहस केवल आरक्षण बनाम मेरिट” तक सीमित नहीं है, बल्कि यह इस बात पर केंद्रित है कि आरक्षण व्यवस्था निष्पक्ष, लक्षित, संवैधानिक और प्रभावी कैसे बने, ताकि बदलते सामाजिक परिवेश में वास्तविक समानता और सामाजिक न्याय सुनिश्चित किया जा सके।

Written by Aloka Agrahari

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