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सपा के लिए टास्क बनी ऊंचाहार विधानसभा सीट, जानिए क्या कहते हैं जातीय समीकरण ?

रायबरेली की ऊंचाहार विधानसभा सीट समाजवादी पार्टी के अगड़े-पिछड़े नेताओं के बीच ही फंस गई है। अब इसे सुलझाना पार्टी नेतृत्व के लिए एक मुश्किल टॉस्क होता जा रहा है। पढ़िए पूरा मामला।

By Ujjawal Mishra 
Updated Date

UP Assembly Election 2022 : कहा जाता है कि राजनीति अनिश्चताओं और सम्भावनाओं का खेल है। यूपी में पिछले कुछ दिनों से चल रही इसी राजनीतिक खेल का अगर सबसे ज्यादा असर कहीं हुआ है तो वह रायबरेली की ऊंचाहार विधानसभा सीट है। जो कि समाजवादी पार्टी के अगड़े-पिछड़े नेताओं के बीच ही फंस गई है। अब इसे सुलझाना पार्टी नेतृत्व के लिए एक मुश्किल टॉस्क के रूप में बनता जा रहा है।

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ऊंचाहार सीट पर सपा का रहा है कब्जा  

समाजवादी पार्टी के अगड़े-पिछड़े नेताओं के बीच फंसी इस सीट को लेकर अब भाजपा के भीतर भी आस दिखने लगी है। इन सबके बीच भाजपा भी भरसक कोशिश में है कि इस सीट को अपने पाले में कैसे लें ? दरअसल, ऊंचाहार विधानसभा सीट पर पूर्व मंत्री और विधायक मनोज पांडे 2007 और 2012 से जीत रहे हैं और वह इस बार हैट्रिक बनाने की जुगत में थे।

लेकिन कुछ दिन पहले ही राजनीति ने करवट ली और अब योगी सरकार में मंत्री व कद्दावर नेता रहे स्वामी प्रसाद मौर्य सपा में शामिल हो चुके हैं। मौर्य ने राजनीति की शुरुआत ही ऊंचाहार से की और 1996 और 2002 में वह विधायक भी बने। आज भी स्वामी प्रसाद मौर्य यहां बेहद सक्रिय हैं। 2012 में उन्होंने अपने बेटे उत्कृष्ट मौर्य को बसपा से चुनाव लड़वाया। 2017 से भाजपा में शामिल होने के बाद वह भाजपा से लड़े लेकिन दोंनो बार सपा से उन्हें हार मिली।

स्वामी प्रसाद मौर्य के लिए स्वाभिमान का प्रश्न बना ऊंचाहार सीट

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मीडिया में आई रिपोर्ट के अनुसार ऊंचाहार सीट मौर्य के लिए स्वाभिमान का प्रश्न बना हुआ है, जिससे वह शायद ही कोई समझौता करें। स्वामी प्रसाद मौर्य पिछड़े वर्ग के बड़े नेता माने जाते हैं। दूसरी तरफ़ मनोज पांडे हैं जिन्हें 2012 से ही अखिलेश अगड़े नेता खासकर ब्राह्मण चेहरे के रूप में आगे बढ़ा रहे हैं। जो कि सपा द्वारा सरकार को ब्राह्मण विरोधी घोषित करने के अभियान का अहम हिस्सा हैं।

इस सबके बीच इन दोनों नेताओं के लिए सपा में जो जातीय समीकरण है वह उनकी जीत के लिए ज्यादा उपयोगी है। ऐसे में इन दोनों नेताओं में से कोई भी इस सीट को छोड़ना नहीं चाहेगा। दूसरी ओर जिस तरह से लगातार राजनीति बदल रही है और समय भी बेहद कम है ऐसे में कहीं दूसरी जगह शिफ़्ट होने का ख़तरा भी ज्यादा है। ऊंचाहार में दोनों नेताओं के अपने आधार वोट हैं और राजनीतिक ज़मीन मजबूत है। ऐसे में कोई भी इसे बिल्कुल खोना नहीं चाहेगा।

भाजपा को भी अब दिखने लगी है आस

सपा के अगड़े-पिछड़े नेताओं के बीच फंसी इस सीट पर अब भाजपा को भी नई आस दिखाई दे रही है और वह पहली बार इसे जीतने की कोशिश में लग गई है। उल्लेखनीय है कि इस सीट पर कभी भाजपा नहीं जीत सकी है। हालांकि स्वामी के भाजपा छोड़ने के बाद अब बड़े चेहरे उसके पास नहीं है। लिहाज़ा वह दूसरे दलों के बड़े चेहरों को अपने पाले में करने की कोशिश में है, जिनकी अपनी मजबूत जमीन भी हो। इसके लिए अगले सप्ताह ही कुछ बड़े नेताओं के गुप्त दौरे होने वाले हैं।

जानकारी के मुताबिक कुछ पिछड़े वर्ग के ही नेताओं ने भाजपा से सम्पर्क साधा है। साथ ही पूर्व भाजपा उम्मीदवार भी इस दौड़ में हैं। मौर्य के जाने के बाद भाजपा को उम्मीद है कि सपा के टिकट देने के बाद उपजी नाराजगी और अपने कैडर वोट के भरोसे चुनावी वैतरणी पार की जा सकती है। राजनीतिक जानकार भी मानते हैं कि भाजपा से स्वामी के जाने के बाद की परिस्थिति का फायदा भाजपा उठाना चाह रही है लेकिन यह तभी सम्भव होगा, जब उसके पास यहां एक मजबूत चेहरा हो।

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