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बद्रीनाथ सीट पर क्यों टिकी रहती है प्रदेश भर की नजर ? जानने के लिए पढ़ें पूरी खबर  

यहां की सभी सीटों (तीन सीट) पर मुख्य मुकाबला भाजपा कांग्रेस के बीच ही है। दोनों दलों के सेनापति तय होते ही राजनीतिक सेनाएं सज गई हैं।

By Ujjawal Mishra 
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Uttarakhand Election 2022 : उत्तराखंड के सीमांत जनपद चमोली के अधिकतर ऊपरी इलाके बर्फ से ढके हुए हैं। ठिठुरन भरी सर्द हवा की गति तेज है, लेकिन यहां का राजनीतिक पारा बहुत चढ़ा हुआ है। नेताओं और उनके समर्थकों का जोश भी अधिक है। यहां की सभी सीटों (तीन सीट) पर मुख्य मुकाबला भाजपा कांग्रेस के बीच ही है। दोनों दलों के सेनापति तय होते ही राजनीतिक सेनाएं सज गई हैं। इसलिए मुकाबला बहुत दिलचस्प होने वाला है।

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बद्रीनाथ सीट पर टिकी रहती है प्रदेश भर की नजर 

जिले की तीन सीटों में से प्रदेश भर की नजर बद्रीनाथ सीट पर होती है। इसका सिर्फ राजनीतिक महत्व नहीं बल्कि आध्यात्मिक मान्यता भी है। आदि शंकराचार्य ने इस क्षेत्र में देश का पहला ज्योतिष पीठ (मठ) स्थापित किया था। यह मठ जोशीमठ में स्थित है। शंकराचार्य ने यहां भगवान विष्णु का प्राचीन बद्रीनाथ मंदिर भी बनाया था, इसलिए कहा जाता है बाबा बद्रीनाथ यहां जिनको आशीर्वाद देते हैं, उसका ही कल्याण होता है।

1991 से है ऐसी मान्यता 

इस सीट जुड़ा एक मिथक है। पिछले चार चुनावों से यह मिथक सही साबित होता रहा है। उत्तर प्रदेश के समय भी 1991 से यही मिथक बना हुआ है। 1991 के बाद अलग उत्तराखंड राज्य बनने तक हुए तीन विधानसभा चुनावों में भी बद्रीनाथ से जीतने वाली पार्टी की ही उत्तर-प्रदेश में सरकार बनी है।

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कांग्रेस की भी नजर बद्रीनाथ सीट पर 

शनिवार को देर रात कांग्रेस ने 53 सीटों पर अपने उम्मीदवार घोषित कर दिए हैं। भाजपा की तरह ही कांग्रेस से भी चमोली जिले के सभी तीनों सीटों पर उम्मीदवार तय होते ही यहां जनसंपर्क अभियान जोर पकड़ने वाला है। हालांकि इस बार कोरोना महामारी के बीच विधानसभा चुनाव हो रहे हैं। इस कारण राजनीतिक प्रचार-प्रसार का रंग ढ़ंग भी बदल गया है। उम्मीदवारों के समर्थक और कार्यकर्ता प्रचार-प्रसार के लिए सोशल मीडिया का जमकर उपयोग कर रहे हैं।

वर्तमान में जिले की तीनों विधानसभा सीट पर भाजपा का कब्जा है। पार्टी ने तीन में से दो वर्तमान विधायक का टिकट काटा है। कांग्रेस ने एक सीट पर नया उम्मीदवार को मैदान में उतारा है। बदरीनाथ सीट पर भाजपा ने सिटिंग विधायक महेंद्र भट्ट पर ही भरोसा जताया है। यहां कांग्रेस ने भी कोई बड़ा फेरबदल नहीं किया है। कांग्रेस ने पूर्व कैबिनेट मंत्री राजेंद्र भंडारी को ही टिकट दिया है।

प्रदेश की राजनीति में महत्वपूर्ण स्थान रखती है बद्रीनाथ

यह सीट प्रदेश की राजनीति में महत्वपूर्ण स्थान रखती है। उसका एक सबसे बड़ा कारण इस सीट से जुड़ा एक मिथक है। अभी तक इस सीट पर जिस पार्टी ने जीत दर्ज की प्रदेश में उसकी की सरकार बनती रही है। साल 2002 के चुनाव में सीट पर कांग्रेस के डॉ. अनसूया प्रसाद मैखुरी ने जीत दर्ज की थी। इन्होंने भाजपा के केदार सिंह फोनिया को चुनावी पटखनी दिया था। उस साल प्रदेश में कांग्रेस की एनडी तिवारी सरकार बनी थी।

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2007 में भाजपा तो 2012 में बनी कांग्रेस की सरकार 

इसके अगले चुनाव (2007) में इस सीट पर केदार सिंह फोनिया ने डॉ. अनसूया प्रसाद मैखुरी को हरा दिया था, तब भाजपा के फोनिया ने यहां कांग्रेस को चार हजार के करीब वोट से हराया था। उस साल प्रदेश में भाजपा की खंडूरी सरकार बनी। वर्ष 2012 के चुनाव में कांग्रेस ने इस सीट पर कब्जा जमाया, उस साल उत्तराखंड में कांग्रेस की विजय बहुगुणा सरकार बनी।

उस चुनाव में राजेन्द्र भंडारी कांग्रेस के टिकट पर चुनाव लड़े थे। भाजपा ने तब अपने वरिष्ठ नेता केदार सिंह फोनिया का टिकट काटकर महेंद्र भट्ट को टिकट दिया था तब फोनिया ने टीपीएस रावत की पार्टी उत्तराखंड रक्षा मोर्चा से चुनाव ताल ठोक दी। फोनिया को उस चुनाव में सात हजार से ज्यादा वोट मिला था। भाजपा के महेंद्र भट्ट को कांग्रेस के राजेन्द्र भंडारी ने करीब दस हजार वोटों से हराया था।

2017 में भी त्रिवेंद्र सिंह रावत के नेतृत्व में बनी भाजपा की सरकार 

विधानसभा चुनाव 2017 में इस सीट पर फिर से मुकाबला भाजपा और कांग्रेस के बीच हुआ। कांग्रेस ने अपने कैबिनेट मंत्री राजेन्द्र भंडारी को फिर से मैदान में उतारा तो भाजपा ने महेंद्र भट्ट पर दोबारा विश्वास जताया। इस बार महेंद्र भट्ट ने राजेन्द्र भंडारी को करीब पांच हजार वोटों से हरा दिया। इसके बाद 2017 में प्रदेश में भाजपा की त्रिवेंद्र सिंह रावत की सरकार बनी। वरिष्ठ पत्रकार संजय चौहान बताते हैं, ‘यह सही है अभी तक बद्रीनाथ सीट से जुड़ा यह मिथक सही साबित होता आ रहा है. इस चुनाव में भी यह बरकरार रह पाता है या नहीं यह देखना कम दिलचस्प नहीं होगा’।

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